सोमवार, 31 दिसंबर 2012

मप्र की नई पहचान पर काले धब्‍बे बन रही हैं घटिया सड़कें

          मध्‍यप्रदेश को नई पहचान देने का जुनून मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दिल और दिमाग पर छाया हुआ है,े इसके लिए दिन रात अपने भाषणों के जरिये न सिर्फ प्रदर्शन कर रहे हैं, बल्कि ऐसी-ऐसी योजनाएं बना रहे हैं जिससे राज्‍य को नई पहचान मिल रही है। यहां तक कि राज्‍य की योजनाओं को अन्‍य राज्‍य लागू भी कर रहे हैं। इससे मप्र का नाम रोशन हो रहा है। इसके साथ ही मप्र की पहचान पर कलंक के रूप में घटिया सड़कों का जाल राज्‍य पर काला धब्‍बा बन गया है। ऐसा कोई महीना नहीं गुजर रहा है, जब देश की जानी-मानी हस्तियां सड़कों पर छींटा-कसी न करती हों। नवंबर, 2012 में फिल्‍म अभिनेत्री और भाजपा नेत्री हेमा मालिनी ने दतिया में सड़कों की दुर्दशा पर नाराजगी जाहिर की थी, तो अब 30 दिसंबर, 2012 को हेमामालिनी के बाद फिल्‍म अभिनेत्री रवीना टंडन ने भी झांसी से ग्‍वालियर के बीच खराब सड़कों के कारण मिले दचकों की पीड़ा जाहिर कर ही दी। उन्‍होंने ने तो यहां तक कह दिया कि ''सड़क बहुत खराब है, जिससे मेरे शरीर का पुर्जा-पुर्जा हिल गया है।'' इन अभिनेत्रियों के साथ-साथ देश के अन्‍य शीर्षस्‍थ हस्तियां भी सड़कों पर समय-समय पर छींटा-कसी करती रही हैं। मप्र में राष्‍ट्रीय राजमार्ग को लेकर भारी विवाद है। मुख्‍यमंत्री बार-बार केंद्र के सामने गुहार लगा चुके हैं कि राष्‍ट्रीय राजमार्गों की मरम्‍मत की जाये पर केंद्र सरकार टस से मस नहीं हो रही है। इसके बाद ही राज्‍य सरकार ने राष्‍ट्रीय राजमार्गों की मरम्‍मत के लिए अपने खजाने से अभियान चलाया हुआ है। इसके बाद भी सड़कों की दशा और दिशा सुधर नहीं पा रही है और न ही गड्डो की शक्‍ल बदली है। यहां तक कि भाजपा नेताओं ने राष्‍ट्रीय राजमार्गों पर होर्डिंग्‍स भी लगा दिये हैं कि यह सड़के राष्‍ट्रीय राजमार्ग की हैं। भले ही सड़के राष्‍ट्रीय राजमार्ग की हों, लेकिन जब सड़कों पर आम आदमी से लेकर बड़ी हस्‍ती निकलती है और उसे सड़के खराब मिलती है, तो स्‍वाभाविक रूप से नाराजगी राज्‍य सरकार पर ही प्रकट होती है जिसका सिलसिला लगातार जारी है। राज्‍य सरकार को सड़कों की हालत अगर सुधारना है, तो इस पर राजनीति करने की बजाय उन पहलूओं पर गौर करना पड़ेगा कि सड़कों की उम्र आखिरकार कम क्‍यों हैं और इसको स्‍थाई आकार देने के लिए क्‍या किया जाये। इसके लिए विभाग में भी आमूल-चूल बदलाव करने की भी जरूरत हो, तो अवश्‍य करना चाहिए, तभी सड़के दुरूस्‍त होगी और प्रदेश पर लगा काला धब्‍बा मि पायेगा। 
                                    ''मप्र की जय हो''

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

रिश्‍ते हुए ध्‍वस्‍त, पिता ने बेटे को मारने की दी सुपारी

          रिश्‍ते-नाते पूरी तरह ध्‍वस्‍त हो रहे हैं। न तो मान-मर्यादा बची है और न ही सम्‍मान बचा है। हर तरफ रिश्‍ते तार-तार हो रहे हैं। परिवार बुरी तरह बिखर रहे हैं। पैसे की चकाचौंध में लोग इस कदर अंधे हो गये हैं कि उन्‍हें न तो भाई का ख्‍याल है और न ही बेटे का। इसके चलते हर तरफ रिश्‍ते टूटते ही जा रहे हैं। दुखद पहलू यह है कि इस दिशा में न तो समाज की कोई चिंता है और न ही कोई चिंतित हो रहा है। यहां तक कि समाज वैज्ञानिक भी चुप है। इसके चलते रिश्‍तों की अहमियत भी दिनों दिन खत्‍म हो रही है। यह स्थिति मध्‍यप्रदेश में और तेजी से पनपती जा रही है। पैसे की खातिर बाप-बेटे की हत्‍या कर रहा है, बेटा बाप की हत्‍या कर रहा है। जमीनों के लिए बेटा भाई को मार रहा है, बाप बेटी के साथ बलात्‍कार कर रहा है। पैसे की खातिर पति पत्‍नी की हत्‍या कर रहा है, तो पत्‍नी पति की हत्‍या करने में कोई कौर कसर नहीं कर रही है। ऐसे मामले लगातार बढ़ रह हैं। 24 दिसंबर, 2012 को भोपाल में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया। जब कपड़े के व्‍यापारी रमेश अग्रवाल ने अपने पुत्र की 2 लाख की सुपारी देकर हत्‍या करवा दी। यह हत्‍या भी उसने अपने मुनीम और नौकरों के जरिये करवाई थी। इस हत्‍या के पीछे कारण यह है कि पिता रमेश अग्रवाल को उसका पुत्र अजय बार-बार पैसे की मांग करता था और जब पैसा नहीं मिलता था, तो अपने पिता को सबके सामने मारपीट करता था। यहां तक कि घर पर और दुकान में मारने में भी देरी नहीं करता था। इसके चलते एक दिन तो हद हो गई, जब 16 दिसंबर को अजय ने अपने पिता के साथ पहले मारपीट की और धमकी दी कि भविष्‍य में उसकी हत्‍या कर देगा। बस इसके चलते ही पिता अग्रवाल को भीतर ही भीतर क्रोध आ गया और उसने अपने बेटे की हत्‍या करने के लिए दो लाख की सुपारी दे दी, जिसके फलस्‍वरूप 17 दिसंबर को मुनीम उत्‍तमचंद्र ने नौकर मानसिंह के जरिये अजय सिंह की हत्‍या करा दी। हत्‍या का रहस्‍य खुलने के बाद पिता अग्रवाल को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और उसके चेहरे पर कोई सिकन नहीं है। ऐसा लगता है कि उसको बेटे की मौत का अफसोस भी नहीं है, क्‍योंकि बेटा तो लगातार रिश्‍तों को तोड़ ही रहा था, तब पिता ने एक कदम आगे बढ़कर सारे रास्‍ते ही बंद कर दिये। इन घटनाओं से कोई सबक लेने को तैयार नहीं हैं। लगातार ऐसी वारदाते हो रही हैं। समाजशास्‍त्री इन पर अध्‍ययन कर रहे हैं या नहीं इसका भी खुलासा नहीं हो रहा है।

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

बढ़ते बलात्‍कारों पर भी हो रही है राजनीति मध्‍यप्रदेश में

      निश्चित रूप से मध्‍यप्रदेश के हर वाशिंदे के लिए यह शर्मनाक है कि राज्‍य में बलात्‍कार की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यहां तक कि गैंगरेप में भी इजाफा हुआ हैये घटनाएं न तो, इसको लेकर सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान ने थोड़ी सी सजता दिखाई है। दिल्‍ली गैंगरेप प्रसंग के बाद आनन-फानन में दो बार उच्‍च अधिकारियों की बैठक में इस पर मंथन हो चुका है। कई निर्णय भी लिये गये हैं। अब कांग्रेस इस पर भी राजनीति कर रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष कांतिलाल भूरिया ने बढ़ते बलात्‍कारों के खिलाफ आंदोलन करने का एलान कर दिया है। यहां तक कि वे जब पत्रकारों को मध्‍यप्रदेश में हुए गैंगरेपों की जानकारी दे रहे थे, तो वे फफक-फफक रो पड़े। वे यही तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री और गृहमंत्री से इस्‍तीफा तक मांग लिया। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह भी  कहने से नहीं चूके कि जब राजगढ़ जिले में दुष्‍कर्म पीडि़त महिला द्वारा आत्‍महत्‍या करने के बाद भी सरकार जागी नहीं है, तो फिर किस पर विश्‍वास करें। गैंगरेप और बलात्‍कार निश्चित रूप से जघन्‍य अपराध है, इसके लिए कड़े से कड़े कानून का प्रावधान होना चाहिए, लेकिन यह वाकई में शर्म का विषय है कि मध्‍यप्रदेश में लगातार महिलाओं पर अपराध बढ़ रहे हैं और पुलिस महकमा हाथ पर हाथ धरे बैठा है। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कन्‍यादान योजना और बेटी बचाओ योजना जैसे अभियान चला रहे हैं उस राज्‍य में अगर महिलाओं के साथ अत्‍याचार हो तो फिर निश्चित रूप से मामला गंभीर हो जाता है। अब मुख्‍यमंत्री ने अधिकारियों के साथ बैठकर तय कर लिया है कि नये साल में यानि 01 जनवरी, 2013 से महिला हैल्‍पलाइन चलाई जायेगी साथ ही सुरक्षा का भाव भी चलाया जायेगा। इन सब से हटकर पुलिस को ज्‍यादा सजग होने की जरूरत है। जहां-जहां महिलाओं के साथ छेड़खानी और बुरी नजर से देखने की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहां पर पुलिस को दबिश देने की जरूरत है। जब प्रदेश में बलात्‍कार की घटनाएं रोकने पर मंथन हो रहा है, तब सरकार के वरिष्‍ठ कैबिनेट मंत्री बाबूलाल गौर ने फिर से ड्रेस कोर्ड का मामला उठा दिया है। उनका कहना है कि युवतियां जो कपड़े पहने वह ऐसे हो कि उसमें शरीर का प्रदर्शन न हो। समझ से परे है कि गौर ऐसा सुझाव क्‍यों दे रहे हैं। कपड़ों के पहनने पर अभी तक कोई बलात्‍कार नहीं हुआ है। यह सच है कि अगर युवतियां कम कपड़े पहनती हैं, तो पुरूष वर्ग उन पर फब्तियां कसते हैं। इसे तो रोका जा सकता है, लेकिन बलात्‍कार और गैंगरेप परिस्थिति जन्‍य होता है। वह किसी के साथ भी हो सकता है। इसलिए इस पर ज्‍यादा राजनीति न हो तो बेहतर है, बल्कि इस मुद्दे पर खुली बातचीत हो। 
मुख्‍यमंत्री का एलान : 
  • दुष्‍कृत्‍य के प्रकरणों में आरोपियों को जल्‍द सजा दिलाने के लिए हर जिले में फास्‍ट-ट्रेक कोर्ट। 
  • चिकित्‍सकों को 24 घंटे के भीतर दुष्‍कृत्‍य की रिपोर्ट देना अनिवार्य होगा। 
  • पुलिस को आरोपी के विरूद्व चालान 15 दिवस के भीतर पेश करना होगा । 
  • महिलाओं में सुरक्षा का भाव जगाने के लिए अभियान चलेगा। 
  • स्‍कूल और कॉलेजों में ल‍ड़कियों को जूडो-कराटे और मार्शल आर्टस सिखाया जाएगा। 
  • पीडि़त महिलाओं को हर प्रकार की सामाजिक एवं आर्थिक मदद दी जायेगी। 
  • कोई भी घटना होने पर पुलिस अधीक्षक जिम्‍मेदार होंगे और कार्यवाही होगी। 
विपक्ष की जिम्‍मेदारी : 
  • बलात्‍कार की घटनाओं पर लगातार विरोध 
  • सामाजिक जागरूकता का अभियान चलाना होगा  
  • सरकार पर कार्यवाही के लिए दबाव डालना 
  • समय-समय पर सड़क की लड़ाई लड़ना
           मध्‍यप्रदेश में बलात्‍कार की घटनाएं बढ़ना चिंता जनक पहलू है। इस पर हर दृष्टि से विचार करने की जरूरत है। सरकार अपने कदम उठा रही है। पुलिस और सजग हो, समाज के पहरी भी लगातार निगाहें गढ़ाये रखे ताकि कोई अनहोनी न हो, तभी हम जो कलंक राज्‍य पर लग रहा है उससे निपट सकेंगे। 
                                       ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

रविवार, 23 दिसंबर 2012

महिला उत्‍पीड़नों पर सहम गया मध्‍यप्रदेश


 

              दिल्‍ली में हुए गैंगरेप के बाद अचानक मध्‍यप्रदेश में भी महिला उत्‍पीड़न, गैंगरेप, बलात्‍कार और बच्चियों का उत्‍पीड़न पर बहस शुरू हो गई है। यह राज्‍य इन उत्‍पीड़न के मामले में अव्‍वल माना जा रहा है। शर्मनाक घटनाएं नित-प्रति अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। शासन और सरकार मरहम लगाने की बजाय एक ही राग अलाप रहा है कि समाज को आगे आना होगा। आखिरकार पुलिस अपनी जिम्‍मेदारी से क्‍यों भाग रही है। महिला उत्‍पीड़न को लेकर मध्‍यप्रदेश में भी गुस्‍सा बढ़ता जा रहा है। जगह-जगह लोगों का आक्रोश सड़कों पर उतर रहा है। रोज हो रहे प्रदर्शनों ने मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नींद उड़ा दी है। उन्‍होंने 22 दिसंबर को चुनिंदा अधिकारियों की बैठक बुलाकर महिला उत्‍पीड़न रोकने पर मंथन चिंतन किया और यह तक कह दिया कि मप्र के माथे से यह कलंक हटाना है कि बलात्‍कार के मामले में प्रदेश देश में नंबर एक पर है। मुख्‍यमंत्री ने अफसरों से पूछा है कि क्‍या फास्‍ट ट्रेक कोर्ट की स्‍थापना करने से मामले जल्‍दी सुलझेंगे। इस पर फिलहाल तो कोई निर्णय नहीं हो सका है।
महिला अफसर भी अपनी जिम्‍मेदारी से बच रही :
        मध्‍यप्रदेश में महिला आईपीएस अफसर भी अगर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सारी जिम्‍मेदारी समाज पर डाल दे तो फिर महिलाओं की सुरक्षा की जिम्‍मेदारी समाज ही कर लेगा,तो फिर महिला पुलिस की आवश्‍यकता ही क्‍या है। इंदौर जोन के आईजी अनुराधा शंकर कहती हैं कि अगर महिलाओं के अपराध रोकना है, तो पारिवारि‍क सिस्‍टम और माहौल बदलना होगा। उनका मानना है कि महिलाओं के साथ होने वाले अपराध 94फीसदी लोग पारिवारिक और निकटवर्ती होते हैं। दूसरी ओर अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक श्रीमती अरूणा मोहन राव कहती हैं कि केवल पुलिस के दम पर महिला अपराध नहीं रोके जा सकते हैं। अगर महिलाओं को ही अपनी सुरक्षा स्‍वयं करनी है,तो फिर पुलिस की क्‍या भूमिका है यह एक बड़ा सवाल हर तरफ गूंज रहा है। पुलिस ने छेड़छाड़ रोकने के लिए कॉलेजो और स्‍कूलों में जूडो-कराटे प्रशिक्षण अनिवार्य करने का भी सुझाव दिया है।
हर रोज एक गैंगरेप :
      मध्‍यप्रदेश के लिए वाकई में यह कलंक की बात है कि प्रदेश में हर दिन सामूहिक बलात्‍कार की एक से अधिक घटनाएं हो रही हैं, जबकि बलात्‍कार की प्रतिदिन पांच घटनाएं हो रही हैं। बलात्‍कार में धार्मिक नगरीय होशंगाबाद अव्‍वल है। यह जानकारी मीडिया की नहीं,बल्कि राज्‍य के होम मिनिस्‍टर उमाशंकर गुप्‍ता ने विधानसभा में लिखित में जानकारी दी है। गुप्‍ता भी बार-बार पुलिस की भूमिका का बचाव करते हैं और समाज को अपराध रोकने के लिए आगे आने की बात करते हैं। यानि गृह मंत्री भी अपनी जिम्‍मेदारी से बचना चाहते हैं। बकौल उमाशंकर गुप्‍ता के अनुसार 01 जुलाई 2012 से 15 नवंबर, 2012 के बीच 108 दिनों के भीतर 121 सामूहिक बलात्‍कार के मामले दर्ज किये गये, जिसमें से 66 आरोपी अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। सामूहिक बलात्‍कार की सबसे अधिक घटनाएं ग्‍वालियर जिले में हुई हैं। दूसरे नंबर पर सागर जिला है,जहां पर 06 घटनाएं हुई हैं,जबकि बालाघाट, छतरपुर में पांच-पांच, शिवपुरी, सतना, भिंड और नरसिंहपुर में 04-04 और शाजापुर में 03घटनाएं हुई है। दुखद पहलू यह है कि बलात्‍कार की सबसे अधिक बारदाते धार्मिक नगरी होशंगाबाद में हुई है, जहां पर 58 बलात्‍कार की घटनाएं दर्ज की गई हैं। दूसरे नंबर पर भोपाल और तीसरे नंबर पर छिंदवाड़ा जिला है। होशंगाबाद,भोपाल और छिंदवाड़ा को छोड़कर बलात्‍कार के मामले में टॉन टेन जिलों में छिंदवाड़ा जिले में 49, सागर 49, जबलपुर 47, रीवा 42, सतना 37, इंदौर 29,ग्‍वालियर और शाजापुर में 28-28, खंडवा 27,रतलाम 24 शामिल हैं। इन घटनाओं से साफ जाहिर है कि महिला उत्‍पीड़न के मामले में सारे रिकार्ड टूट रहे हैं। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की अगुवाई में 22 दिसंबर को मुख्‍यमंत्री निवास पर प्रदर्शन कर गिरफ्तारी दी जा चुकी है,इसके अलावा भी महिला संगठन समय-समय पर अपराध विरोध दर्ज कर रही हैं। अब सरकार को अपनी भूमिका अदा करनी है।
                                    ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''


शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

मध्‍यप्रदेश में कलेक्‍टर-एसपी भी सुरक्षित नहीं

        मध्‍यप्रदेश में कलेक्‍टर और एसपी भी सुरक्षित नहीं है, तो फिरअगर आम आदमी की जानमाल का क्‍या होगा। यह एक गंभीर सवाल  है। यह सवाल कोई एक घटना से सामने नहीं आ रहा है, बल्कि बार-बार प्रशासन के मुखिया पर हमला होने की घटनाएं हो रही है, तो फिर विचार तो करना ही पड़ेगा। खनिज माफिया, वन माफिय, शराब  माफिया, परिवहन माफिया और शिक्षा माफिया के निशाने  पर अधिकारी/कर्मचारी आ रहे हैं। मार्च 2011 में आईपीएस अफसर नरेंद्र कुमार की मुरैना में त्‍या हो चुकी है। इसमें भू-माफिया की भूमिका देखी गई थी। सीबीआई पूरे मामले की जांच कर रही है। इसके बाद भी अधिकारी/कर्मचारियों पर माफिया बार-बार हमला कर रहा है और न तो सरकार की नींद खुली है और न ही इस पर गंभीरता से विचार हुआ है। इसके चलते माफिया लगातार दुस्‍साहस करने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहा है। 20 दिसंबर को मंडी चुनाव के दौरान मुरैना में फिर से कलेक्‍टर डीडी अग्रवाल और एसपी जयदेव पर हमला किया गया। वे जान बचाकर अगर नहीं भागते तो कोई भी अनहोनी घटना घट सकती थी। मुरैना-भिंड में दो दर्जन पोलिंग बूथ पर फायरिंग और लूटपाट की घटना हुई है। आश्‍चर्य तो यह होता है कि जिस मुरैना में एसपी नरेंद्र कुमार की हत्‍या हुई थी उसके बाद भी प्रशासन क्‍या सजग नहीं हुआ और क्‍या ऐसे लोगों को चिन्हित क्‍यों नहीं किया जा रहा है, जो बार-बार प्रशासन पर ही हमला कर रहे हैं। आखिरकार हम किसके इशारे पर हम मूकदर्शक बने बैठे हैं इसका खुलासा होना चाहिए। मुरैना में मंडी चुनाव के दौरान कलेक्‍टर अग्रवाल और एसपी जयदेव तथा पुलिस कर्मियों को घेरकर फायरिंग की गई। इन सभी को जान बचाकर भागना पड़ा फिर भले ही कलेक्‍टर ने चुनाव रद्द कर दिया है, लेकिन आखिरकार अपराधियों के हौंसले तो बुलंद हो ही रहे हैं कि वे किस स्‍तर पर उतर आये हैं। अगर प्रशासन के मुखिया असुरक्षित होंगे तो फिर कैसे काम होगा यह आसानी से समझा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि जिला प्रशासन के मुखिया पर पहली बार हमला हुआ हो, हल्‍की फुल्‍की घटनाएं तो खूब हो रही हैं। कई बार खनिज माफिया ने डिप्‍टी कलेक्‍टरों पर ट्रक भी चढ़ाकर मारने की कोशिश की है, तो जंगल माफिया ने लकड़ी काटने को लेकर मना करने पर रेंजरों पर प्राण घातक हमले किये हैं। माफिया धीरे-धीरे मप्र में पैर जमा रहा है और शासन प्रशासन मूकदर्शक बना बैठा है। इस समस्‍या पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत तो है, अन्‍यथा वह दिन दूर नहीं है, जब बिहार, यूपी के तरह कलेक्‍टर और एसपी भी सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो फिर आम आदमी का तो भगवान ही मालिक है।
                                      ''मप्र की जय हो''   


मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

खजुराहो मंदिरों पर मंडराता संकट

 
          मध्‍यप्रदेश में खजुराहो के मंदिरों का ऐतिहासिक महत्‍व है। इन मंदिरों को पर्यटक अपने-अपने नजरिये से देखने पहुंच रहे हैं। लगातार उन पर अध्‍ययन और रिसर्च हो रहा है। मंदिरों के ऊपर से विमानों की आवाजाही ने मंदिरों के अस्तित्‍व पर सवाल खड़े कर दिये हैं। जब विमान मंदिरों के ऊपर से उड़ते हैं तो मंदिरों में कंपन होती है जिसके चलते मंदिरों में दरारे भी पड़ गई है। पुरातत्‍व विशेषज्ञ बार-बार केंद्र सरकार और राज्‍य सरकार को इस संबंध में चिंता जाहिर कर चुके हैं। तब भी किसी को कोई परवाह नहीं है। यही आलम रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब खजुराहो के मंदिरों का अस्तित्‍व संकट में आ जायेगा। 1000 साल से भी अधिक पुराने इन मंदिरों में आई दरारे बताती है कि कंपन का असर कितना खतरनाक होता जा रहा है। भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण कई बार भारतीय विमानन प्राधिकरण से इसकी लिखित में शिकायत कर चुका है। इन शिकायतों में कहा गया है कि खजुराहो के मंदिरों में आई दरारों का मुख्‍य कारण वायुमंडलीय परिवर्तन के साथ-साथ हवाई उड़ानों का कंपन भी म‍ंदिरों को हानि पहुंचा रहा है। 30 सितंबर, 2006 में मंदिरों के ऊपर से विमान न उड़ाने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा गया, लेकिन किसी ने भी इस संबंध में ध्‍यान नहीं दिया। यहां तक कि खजुराहो हवाई अड्डे पर जब विमान उतरते हैं, तब भी मंदिरों पर कंपन का प्रतिकूल असर पड़ता है।
विशेषकर नंदी और विश्‍वनाथ मंदिर में इसका असर साफ तौर पर देखा जा सकता है। विश्‍वनाथ मंदिर के पत्‍थर में तो दरारें इस बात का सबूत भी हैं। तब भी हवाई उड़ानों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। अक्‍सर देखा गया है कि जब विमान चालक विमान को उतारते समय 200 से 250 मीटर तक नीचे ले आते हैं जिससे मंदिरों के जोड़ कंपन से दरारों का रूप ले लेते हैं। इस संबंध में नेशनल फिजिकल लेबोरिटी नई दिल्‍ली ने जारी अपनी रिपोर्ट में शंका जाहिर की है कि मंदिरों में दरार पड़ने और पत्‍थर खिसकने से कभी भी कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है। साथ ही ऐतिहासिक महत्‍व के मंदिर नष्‍ट भी हो सकते हैं। इस पर केंद्र सरकार को कोई चिंता नहीं है और न ही राज्‍य सरकार इस संबंध में केंद्र की तरफ ध्‍यान आकर्षित कराना चाहती है। दुर्भाग्‍यपूर्ण स्थिति यह है कि पुरातत्‍व विभाग और पर्यटन विभाग भी कोई ऐसी पहल नहीं कर रहा है जिससे मंदिरों के बजूद पर आ रहे संकटों को दूर किया जा सकें। राजनेताओं और मंत्रियों को इसकी परवाह इसलिए नहीं है कि वहां उनका कोई वोट बैंक नहीं है। पर्यटन विभाग अपनी आय बढ़ाने में लगा हुआ है उसे भी कोई चिंता नहीं है। सिर्फ खजुराहो के चुनिंदा पत्रकार समय-समय पर अखबारों के जरिये अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। अब इन मंदिरों का क्‍या होगा इसके लिए तो भगवान ही मालिक है। 
                               ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

दलित उद्योगपतियों को फिर दिखाया सपना

          यूं तो मप्र में दलित वर्ग पर उत्‍पीड़न की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है। किसी न किसी बहाने दलितों पर अत्‍याचार हो रहे हैं। अब एक बार फिर से दलितों को फांसने के लिए सपनों कजाल ेंका है। दलित वर्ग इस बहाने सरकार के निकट आ जाये। ऐसा होगा नहीं। बार-बार दलितों के साथ न्‍याय दिलाने की राजनेता कसमे खाते हैं पर उन्‍हें न्‍याय नहीं मिल रहा है। एक बार फिर से आदिम जाति कल्‍याण राज्‍यमंत्री हरिशंकर खटीक ने 16 दिसंबर को कहा है कि दलित उद्योगपतियों द्वारा बनाई जाने वाली सामग्री 30 फीसदी सामग्री शासन खरीदेगा। इस संबंध में शीघ्र आदेश जारी हो जायेंगे। वर्ष 2001-02 में तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी चुनावी वर्ष से पहले दलित एजेंडा का खूब शोर मचाया था। इस एजेंडे के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया था कि दलित उद्योगपति जो भी सामग्री तैयार करेंगे उसे लघु उद्योग निगम के माध्‍यम से खरीदा जायेगा। इस निर्णय की खूब प्रशंसा दलित वर्ग ने की थी। दलित वर्ग को लगा था कि अब उन्‍हें भी व्‍यवसाय करने का मौका मिलेगा, क्‍योंकि वर्षों से दलित वर्ग मध्‍यप्रदेश में अन्‍याय और शोषण का शिकार होता रहा है जिसके चलते वह शिक्षित तो हो नहीं पाया और अपने परपरागत व्‍यवसाय में लगा रहा। यह कहना भी गुनाह होगा कि दलित वर्ग शिक्षित नहीं हुआ। समाज का 10 प्रतिशत वर्ग जैसे-तैसे अपने बच्‍चों को पढ़ा लिखाकर मुख्‍यधारा में लाने की कोशिश कर रहा है। शिक्षित होने के बाद दलित वर्ग ने सरकारी नौकरी के साथ-साथ अपने व्‍यवसाय में भी हाथ पैर मारे हैं। कांग्रेस सरकार ने दलितों को व्‍यवसाय करने का एक मौका मुहैया कराया था, जिस पर भाजपा सरकार आते ही कुठाराघात हो गया। वर्ष 2003-04 के बीच राज्‍य शासन ने लघु उद्योग निगम द्वारा खरीदी जाने वाली सामग्री पर रोक लगा दी। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि दलित वर्ग के नाम पर सवर्ण उद्योगपति लाभ ले रहे थे। ऐसा कहीं कहीं हुआ भी है, लेकिन दलित वर्ग को भी लाभ हुआअब फिर से चुनाव की बेला के पहले दलित वर्ग को लुभाने के लिए जाल फेंका है। इसके साथ ही अजाक्‍स के कार्यवाहक प्रांताध्‍यक्ष और उच्‍च शिक्षा विभाग के सचिव जेएन कंसोटिया ने भी सम्‍मेलन में इस बात पर जोर दिया कि दलितों को आर्थिक तरक्‍की के लिए आगे आना होगा। तभी दलित वर्ग का उत्‍थान हो सकता है। इस सम्‍मेलन में दलितों के आर्थिक उत्‍थान पर विचार किया गया और उन्‍हें नये सिरे से स्‍थापित करने की संभावनाएं टटोली गई। इस सम्‍मेलन में कई लोगों ने शिरकत की। 
                                   ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''
  

रविवार, 16 दिसंबर 2012

भाजपा की नई पठकथा लिखेंगे नरेंद्र सिंह तोमर

 
          भाजपा को मध्‍यप्रदेश में इतिहास दर्ज करना है। तीसरी बार सत्‍ता हासिल करने के लिए भाजपा ने नई पठकथा लिखने का जिम्‍मा ठाकुर नेता नरेंद्र सिंह तोमर को सौंपा है। राह जटिल है। कदम-कदम पर चुनौतियां और गुटबाजी है। इससे पार पाने के रास्‍ते खोजने होंगे। भाजपा के इरादे और मंजिल जाहिर हो चुके हैं। इन्‍हें पाने के लिए तोमर नई कथा गढ़ने के लिए अपने अंदाज में पेश हो गये हैं। हर स्‍तर पर पार्टी में वह स्‍वीकार्य नेता हैं। इससे पहले भी 2008 से 2010 तक पार्टी की कमान संभाल चुके हैं। उन्‍हें मालूम है कि कहा-कहां और किस स्‍तर पर चुनौतियों से जूझना है। इसके लिए वे तैयार हैं पर फिर भी नेताओं की आपसी गुटबाजी को दूर करने में उन्‍हें पसीना आ जायेगा। इस बार मिशन 2013 को जितना आसान समझा जा रहा है उतना है नहीं। पार्टी ने यह मान लिया है कि सरकार बनना तो आसान है, लेकिन विपक्ष की चुनौती भी कम नहीं है। यह जरूर है कि हर स्‍तर पर पार्टी को यही फीडबैक मिल रहा है कि भाजपा की सरकार बनना तय है। आने वाला समय चुनौतियों से भरा हुआ है जहां पर हर कहीं से दबाव रहेगा, तब तोमर को अपनी राजनीतिक कुशलता का परिचय देकर एक नई राह बनानी पड़ेगी, तभी वे पार्टी को कामयाब कर पायेंगे। 
चुनाव और तोमर की अग्निपरीक्षा : 
     मिशन 2013 का चुनाव तोमर के लिए अग्निपरीक्षा है। इसके लिए उनका चयन किया गया है कि वह अपने राजनीतिक दूरदृष्टि से लोगों को जोड़कर फिर से सत्‍ता हासिल कर सकें। फिलहाल तो चुनाव में अभी 10 माह का समय बाकी है। भाजपा अपने दस साल के सत्‍ता के सिंहासन पर फिर से विराजमान होना चाहती है, इसके लिए सारे दाव-पेंच खेले जायेगे। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्‍व में यह चुनाव होगा और चौहान की बाजीगरी की भी परीक्षा होगी। उनक सोशल एजेंडा भी देखा जायेगा कि वह कितना कामयाब है। फिलहाल तो पार्टी ने अपनी तरफ से एक ऐसा दाव खेला है जिसके लिए पार्टी का एक बड़ा वर्ग भीतर ही भीतर नाराज भी हो सकता है। यह नाराजगी फिलहाल तो सामने नहीं आ रही है, लेकिन भविष्‍य में उसका खुलासा होने के आसार बढ़ गये हैं। पार्टी के निवर्तमान अध्‍यक्ष प्रभात झा भी अपनी नाराजगी भले सार्वजानिक न करें, लेकिन पर्दे के पीछे कोई खेल दिखाये तो आश्‍चर्य नहीं होगा। अब उनके निशाने पर तोमर नहीं, बल्कि चौहान होंगे। तोमर के बारे में यह कहा जा रहा है कि वह संगठन कुशलता के खिलाड़ी है, लेकिन 2003 की अपेक्षा 2008 में भाजपा को वोट और सीटे कम मिली हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में तो और भी स्थिति खराब हो गई थी। अब 2013 उनके सामने हैं। ऐसी स्थिति में तोमर को उन हजारों कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना है, जो कि घर बैठे हुए हैं। मंत्री, सांसद, विधायक और अलग-अलग मोर्चों पर जनप्रतिनिधि की भूमिका अदा कर रहे नेताओं को भी मनाना इतना आसान नहीं होगा, जितना कि समझा जा रहा है। 
                                ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

नेशनल हाईवे बनाम स्‍टेट हाईवे के बीच छिड़ी जंग


          मध्‍यप्रदेश में सड़के अपने-अपने स्‍थान पर आंसू बहा रही हैं। न तो उनकी मरम्‍मत हो रही है और न ही कोई देखरेख करने वाला है। सड़कों का नया निर्माण तो एक सपना ही है। राज्‍य में सड़के अब जंग का मैदान बन गई हैं। इन पर खूब राजनीति हो रही है। इसकी चिंता किसी को नहीं है कि सड़के क्‍यों नहीं सुधर पा रही हैं। सब अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। वर्ष 2002 में जो सड़कों लेकर हंगामा प्रदेश में मचा था, वही फिल्‍म फिर से दोहराई जा रही है। भाजपा के 9 साल के शासनकाल में भी सड़कों की दुर्दशा पर आंसू बहाये जा रहे हैं। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सड़कों की बदहाली पर पिछले छह महीने में कई बार लोक निर्माण के अफसरों पर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं पर ऐसा लगता है कि अब उनकी नाराजगी का भी कोई असर नहीं हो रहा है। यही वजह है कि सड़के जस की तस हैं और उन पर राजनीति करने के लिए राजनेता तैयार हैं। मध्‍यप्रदेश में नेशनल हाईवे और स्‍टेट हाईवे राजनीति के अखाड़े बन गये हैं। मुख्‍यमंत्री बार-बार नेशनल हाईवे की मरम्‍मत नहीं होने को लेकर नाराजगी जाहिर करते हैं। यहां तक कि वह दिल्‍ली में हल्‍ला मचाने का एलान भी करते हैं। पूरी मंत्रिपरिषद के साथ प्रधानमंत्री और भूतल परिवहन मंत्री से मिलने का एलान करते हैं, लेकिन जब दिल्‍ली में मंत्रियों से मिलने का समय नहीं मिलता है, तो वह मध्‍यप्रदेश में ही अखबारों के जरिये केंद्र सरकार के खिलाफ अपना गुस्‍सा जाहिर करते हैं। अब फिर से मुख्‍यमंत्री ने कहा है कि वे केंद्र सरकार से एक बार फिर नेशनल हाईवे को लेकर मिलेंगे। इससे पहले 13 दिसंबर, 2012 को मुख्‍यमंत्री ने नेशनल हाईवे के अधिकारियों को मं‍त्रालय बुलाकर समझाईश दी थी कि जल्‍द से जल्‍द कार्यवाही करें। लंबे समय बाद नेशनल हाईवे के अफसरों और मुख्‍यमंत्री के बीच चर्चाएं हुई थी। इसके दूसरे दिन ही मुख्‍यमंत्री ने आंदोलन का एलान कर दिया। इसी के साथ ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने भी अब स्‍टेट हाईवे को लेकर आंदोलन करने का एलान कर दिया है। वह लगातार कह रहे हैं कि मुख्‍यमंत्री को नेशनल हाईवे के साथ-साथ स्‍टेट हाईवे पर भी ध्‍यान देना चाहिए। कुल मिलाकर सड़के राजनीति का केंद्र बनती जा रही है ओर उनका मरम्‍मत पर किसी का ध्‍यान नहीं है। 
कोर्ट भी हुआ सड़कों पर खफा : 
     मध्‍यप्रदेश हाईकोर्ट भी समय-समय पर सड़कों के निर्माण नहीं होने पर नाराजगी जता चुका है। अब मध्‍यप्रदेश हाईकोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश शरद अरविंद बोबडे एवं जस्टिस एससी गर्ग की खंडपीठ ने कहा है कि राज्‍य मार्ग सुधारकर कोर्ट को रिपोर्ट पेश करें। अदालत ने जबलपुर, न‍रसिंहपुर और कटनी के एनएचएआई के प्रोजेक्‍ट डायरेक्‍टर को राजमार्ग सुधारकर 4 फरवरी, 2013 तक रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिये हैं। अधिकारियों ने अदालत से आग्रह किया है कि जबलपुर से लखनादौन के बीच का 80 किमी का पेंच 31 जनवरी, 2013 तक चलने लायक बना दिया जायेगा, जबकि जबलपुर-कटनी-रीवा मार्ग 15 जनवरी तक सुधार दिया जायेगा। इस मार्ग का 378 से 389 किमी का 12 किमी का पेंच पीडब्‍ल्‍यूडी के अंतर्गत आता है जिस पर कोर्ट ने एनएचएआई को उक्‍त पेंच में सुधार कर पीडब्‍ल्‍यूडी से पैसा वसूलने के निर्देश दिये हैं। बार-बार हाईकोर्ट की तरफ से नेशनल हाईवे की बिगड़ती दशा पर चिंता जाहिर की जाती रही है, लेकिन फिर भी लोक निर्माण विभाग और एनएचएआई के अधिकारी इन सड़कों की मरम्‍मत करने से बचते क्‍यों हैं। आखिरकार सड़कों को लेकर बार-बार सवाल उठते हैं और मरम्‍मत भी हो जाती है और फिर बारिश होते ही सड़के जस की तस हो जाती हैं। इस दिशा में कोई भी सोचने को तैयार नहीं है, क्‍योंकि सड़कों के निर्माण में जो धांधलियां हो रही है उस पर अगर इसी तरह से आंख बंद किये रहे तो हर साल मरम्‍मत के लिए लाखों रूपये खर्च होगा और आम आदमी फिर से सड़कों की बदहाली पर रोता रहेगा। न तो प्रदेश में कोई परिवर्तन होगा और न ही बदलाव की उम्‍मीद करना चाहिए। 
                                   ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

मध्‍यप्रदेश के आईएएस अफसर और तीन पी पर जोर

               यूं तो मध्‍यप्रदेश के आईएएस अफसरों की कार्यशैली अन्‍य राज्‍यों से इतर है। यहां पर अफसरों के खिलाफ विरोध के स्‍वर कभी-कभार ही उठते हैं। उनके विरूद्व आर्थिक अनियमितताओं की शिकायतों पर कार्यवाही में अक्‍सर देरी होती है। कई अफसरों के तो राजनेताओं से ऐसे गहरे निकट के संबंध हैं कि उनके खिलाफ तो पता भी नहीं खटकता। अब धीरे-धीरे आईएएस अफसरों के खिलाफ लोग मुखर हो रहे हैं। जनप्रतिनिधि के साथ-साथ मीडिया में भी तेजी से उन पर सवाल किये जाने लगे हैं। राज्‍य में दक्षिण भारत, पंजाबी लॉबी और उत्‍तर भारत की लॉबी के बीच अधिकारी बंटे हुए हैं जिसके फलस्‍वरूप सब अपने-अपने हिसाब से गुणा-भाग में लगे रहते हैं। यूं तो आईएएस अधिकारियों के बीच इस कदर आपसी तालमेल है कि एक-दूसरे के विरूद्व कम ही बोलते हैं। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जब भी आईएएस अफसरों के बीच होते हैं, तो उन्‍हें कोई न कोई सीख दे ही देते हैं। 14 दिसंबर को मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक बार फिर प्रदेशभर के आईएएस अफसरों के बीच पहुंचे और उन्‍हें अपनी कार्यशैली बदलने पर जोर दिया। मुख्‍यमंत्री ने अफसरों को ''तीन पी'' का मंत्र दिया। तीन पी का यूं पालन करें - 
  1. पब्लिक - हमेशा जनता से संवाद रखे 
  2. पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव - जनता के बीच घूमे 
  3. प्रेस - प्रेस के जरिये अपनी बात रखे। 
         ऐसा नहीं है कि मुख्‍यमंत्री पहली बार अधिकारियों को लोगों से संवाद करने की बात कर रहे हैं। इससे पहले भी कई बार अधिकारियों के व्‍यवहार में परिवर्तन पर जोर दे चुके हैं। ऐसी क्‍या वजह है कि अधिकारियों ने अभी भी अपनी कार्यशैली नहीं बदली है, वे लगातार अपने हिसाब से काम कर रहे हैं। मंत्रालय में ही कई अफसर ऐसे हैं, जो कि इन ''तीन पी'' का पालन नहीं करते हैं, वे न तो जनता से मिलते हैं और न ही मीडिया से। इसकी जानकारी मुख्‍यमंत्री को भी है फिर भी अधिकारियों पर कोई कार्यवाही नहीं होती। अधिकारियों की कार्यशैली पर मुख्‍यमंत्री ने तीखा व्‍यंग करते हुए कहा कि प्रदेश में कुछ आईएएस अफसर ऐसे हैं, जो कि खूब काम करते हैं और वे किसी से संबंध नहीं बनाते और कुछ ऐसे भी अफसर है जो कि वे केवल यश सर करते हैं और सबको खुश रखते हैं, आगे-पीछे भी घूमते हैं पर काम नहीं करते हैं, जबकि ऐसे अफसरों की संख्‍या भी काफी है, जो कि खूब काम करते हैं और सभी से संबंध बनाकर रखते हैं। इसलिए सबसे बेहतर रास्‍ता यही है कि खूब काम करों और सबको सम्‍मान भी दो पर साथ ही काम करने के अलावा गड़बड़ी न हो इसका भी ध्‍यान रखा जाये, क्‍योंकि बेईमानी कभी छुपती नहीं है। कागज में योजनाएं कुछ और बनती है तथा फील्‍ड में परिस्थितियां कुछ और होती है। अत: इस बात पर ध्‍यान रखा जाये कि जो योजनाएं कागज पर बने वह जमीन पर भी उतरें। ऐसा कई योजनाओं के बारे में खुलासा हो चुका है कि वह फाइलों में तो खूबसूरत होती है पर धारातल पर उसका अता-पता नहीं होता। 
           मध्‍यप्रदेश के आईएएस अधिकारियों के व्‍यवहार और कामकाज को लेकर खूब चर्चाएं होती है, लेकिन परिवर्तन कहां और कैसे हो रहा है इस पर किसी भी स्‍तर पर कोई मॉनिटरिंग नहीं होती है। यही वजह है कि जो वातावरण बन चुका है वह यथावत बना रहा है उसमें परिवर्तन की तरफ कोई ध्‍यान नहीं देता है। बातें खूब होती है पर काम उतने नहीं होते हैं जितना कि होना चाहिए। 
                                       ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

सड़क-बिजली की बदहाली पर विधायक खफा हुए मुख्‍यमंत्री पर

        यूं तो प्रदेश में सड़कों की बदहाली और बिजली की आंख मिचौली से आम आदमी परेशान है ही। राज्‍य के किसी भी हिस्‍से में चले जाईये, सड़कों पर गहरे-गहरे गड्डों का सामना करना पड़ेगा, तो कहीं चलने लायक सड़क बची ही नहीं। बिजली की आंख मिचौली तो और भी सिरदर्द बनती जा रही है। कब बिजली चली जाये, किसी को पता ही नहीं चलता। गांव का किसान सिंचाई के लिए बिजली मांगता है, तो उसे इंजीनियर आंख दिखाता है। मध्‍यप्रदेश का सत्‍तारूढ़ दल भाजपा के विधायक भी सड़कों की बदतर स्थिति से परेशान होने लगे हैं और अपनी पीड़ा मुख्‍यमंत्री के सामने जाहिर भी करने लगे हैं। हालत यह हो गई है कि अब विधायकों ने विधायक दल की बैठक में यह कहना शुरू कर दिया है कि आगामी चुनाव में सड़क, बिजली की बदहाली भारी पड़ सकती है। 13 दिसंबर, 2012 को विधानसभा सत्र के अंतिम दिन विधायक दल की बैठक में विभिन्‍न समस्‍याओं के स्‍वर गूंजे। विधायकों ने खुलकर कहा कि चुनाव में कांग्रेस सड़कों को मुद्दा बना सकती है, इसलिए इसकी तरफ विशेष रूप से ध्‍यान दें अन्‍यथा भविष्‍य में मैदानी मोर्चा संभालना मुश्किल हो जायेगा। मुख्‍यमंत्री ने बार-बार विधायकों को समझाने की कोशिश की कि सड़कों की मरम्‍मत का काम व्‍यापक स्‍तर पर चल रहा है। किसी प्रकार की चिंता न करें। इसी के साथ ही मुख्‍यमंत्री की विकास यात्राओं को लेकर भी सवाल खड़े किये गये कि पिछली यात्रा के दौरान जो समस्‍याएं जनता ने दी थी उसका अभी तक निराकरण नहीं हुआ। विधायकों ने साफ तौर पर यह भी कहा कि जनसुनवाई हर हाल में बंद कर देना चाहिए। क्षेत्र के लोग विधायकों की बजाय अपनी समस्‍याओं के उल्‍टे-सीधे आवेदन लेकर एसडीएम कार्यालय जाते हैं। अधिकारी भी मनमाने निर्णय कर सरकार की बदनामी करते हैं। इस पर फिलहाल तो मुख्‍यमंत्री ने कोई टिप्‍पणी नहीं की है, लेकिन इस बहाने जनसुनवाई पर सवाल तो खड़े हो गये। कर्मचारियों का मुद्दा भी उठा जिस पर मुख्‍यमंत्री ने साफतौर पर कहा कि कर्मचारी न तो चुनाव जिताता है और न ही चुनाव हराने का माददा है। इसलिए विधायकों को ईमानदारी और परिश्रम एवं पब्लिक ईमेज के आधार पर अपनी तैयारियों में जुट जाये। चार साल में किये गये कामकाज का जमकर प्रचार-प्रसार करें। लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह के इस सुझाव पर विधायकों ने आपत्ति की कि चौराहों पर सरकार की खामियां न गिनाई जाये, बल्कि पार्टी फोरम पर चर्चा की जाये। इसके साथ ही विधायकों ने यह भी कहा कि मंत्री लोग न तो बंगले पर मिलते हैं और न ही मोबाइल पर बात हो पाती है। 
ये समस्‍याएं और गिनाई : 
  • बिजली सप्‍लाई का शेड्यूल बदला जाये 
  • विधायकों की सिफारिश पर ट्रांसफार्मर बदले 
  • दो-दो माह में नहीं बदले जा रहे ट्रांसफार्मर 
  • शहरी झुग्गियों की समस्‍याएं सुलझाई जाये 
  • अवैध कॉलोनियों का निराकरण हो 
  • विधायक निधि 77 लाख से बढ़ाकर दो करोड़ की जाये 
  • बलराम तालाब और कपिल धारा कुएं की मंजूरी में दिक्‍कतें दूर हों 
  • जनसुनवाई हर हाल में बंद हो
  • कर्ज मांफी को कांग्रेस मुद्दा बनायेगी 
  • सीएम की घोषणाएं थोती साबित हो रही हैं 
  • सड़कों की स्थिति सुधर नहीं पा रही है, क्‍यों
मंत्रियों ने कहा : 
  • विधायक भी करें पदयात्रा और दौरे 
  • चौराहों पर समस्‍याएं नहीं गिनाये विधायक 
  • सहकारिता चुनाव में जीत के लिए प्रयास करें 
  • कर्मचारियों और अधिकारियों पर ज्‍यादा निर्भर न रहे। 
मुख्‍यमंत्री ने कहा : 
  • प्रत्‍येक विधायक से सोमवार-मंगलवार को मिलूंगा 
  • 15 दिसंबर के बाद नेशनल हाईवे की लड़ाई शुरू की जायेगी 
  • कांग्रेस कार्यकर्ता भी कह रहे हैं कि तीसरी बार सरकार बनेगी 
  • किसान, मजदूर, युवा, कारीगर की पंचायत का आयोजन होगा 
  • हर वर्ग को लुभाने के प्रयास करेंगे 
  • कर्मचारियों के भरोसे कोई काम न करें

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

मध्‍यप्रदेश में भ्रष्‍ट अफसरों की भरमार

           भ्रष्‍टाचार के घेरे में अधिकारी फंसते ही जा रहे हैं। हालत यह हो गई है कि इस जंजाल में आईएएस अफसर से लेकर राज्‍य प्रशासनिक सेवा (राप्रसे) के अधिकारियों पर भी मामले दर्ज हुए हैं। मप्र में 91 अधिकारी विभिन्‍न जांचों के घेरे में हैं जिसमें 35 आईएएस और 42 राप्रसे तथा 14 अन्‍य अधिकारी शामिल हैं। इन अधिकारियों के खिलाफ मामले तो दर्ज हो गये हैं, लेकिन जांच की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है। जिसके चलते भ्रष्‍टाचार की गंगा जहां-तहां से बह रही है। इन अधिकारियों के मामले 12 दिसंबर, 2012 को विधानसभा में फिर से गूंजे हैं। अरसे से यह बात उठती रही है कि आखिरकार आईएएस अफसरों पर अभियोजन की अनुमति राज्‍य सरकार क्‍यों नहीं देती है। लोकायुक्‍त और आर्थिक अपराध अन्‍वेषण ब्‍यूरो जांच करके मामला मंत्रालय तक पहुंचा देता है और उसके बाद सामान्‍य प्रशासन विभाग उस फाइल पर ऐसे कुंडली मारकर बैठता है कि फिर उठने का नाम नहीं लेता। राज्‍य में नौकरशाह और राजनेताओं के बीच तनातनी कोई नई बात नहीं है। नौकरशाह अपनी ढपली बजाते हैं और राजनेता अपने अंदाज में काम करते हैं। इसके चलते विवाद बढ़ते ही जाते हैं। नौकरशाहों को लगता है कि वे नियम प्रक्रियाओं को ज्‍यादा जानते हैं और राजनेता को वे कठपुतली की तरह इस्‍तेमाल करते हैं, लेकिन कभी-कभी राजनेता भी ऐसे डंक मारते हैं कि नौकरशाहों को पसीना आ जाता है। ऐसा नहीं है कि सारे नौकरशाह भ्रष्‍ट और नियम प्रक्रियाओं को तोड़ने की कला में माहिर हैं। राज्‍य में ईमानदार और नियम से काम करने वाले अफसरों की काफी संख्‍या है, लेकिन भ्रष्‍टाचार करने वाले अफसरों की भी लंबी फेहरिस्‍त है। यही वजह है कि अधिकारी और राजनेताओं का विवाद बढ़ता ही रहता है।
इन अफसरों की जांच लंबित : 
        मध्‍यप्रदेश में अफसरों के भ्रष्‍टाचार की जांच पर तो खूब हल्‍ला मचता है, लेकिन उनकी फाइलें दबने में भी देरी नहीं लगती है। आईएएस अधिकारी डॉ0 राजेश राजौरा, एके सिंह, योगेश शर्मा, सौमित जैन, आरके स्‍वाई, देवराज बिरदी, विवेक अग्रवाल, नीरज मंडलोई, प्रभात पारासर, एनबीएस राजपूत और पवन शर्मा की जांच का काम अभी भी चल रहा है। इसी के साथ ही रमेश थेटे, अरविंद जोशी, टीनू जोशी, अजिता वाजपेयी पांडेय और सीबी सिंह के मामले में तो अभियोजन की अनुमति नहीं मिल पा रही है, जबकि इनकी जांच पूरी हो चुकी है, मात्र सामान्‍य प्रशासन विभाग को हरी झंडी देनी है। इसी प्रकार राज्‍य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी विवेक सिंह, जीआर पाटीदार, आरसी चुघ, आरके श्रीवास्‍तव, आरपी गेहलोत, जेएस धु्र्वे, विनय निगम, एचसी सोनी, चंद्रमोली शुक्‍ला की जांचे फाइलों में चल रही है, जबकि राप्रसे के अधिकारी शरद शुक्‍ला, प्रहलाद अमरचिया, आलोक श्रीवास्‍तव के मामले में राज्‍य सरकार अभियोजन की अनुमति नहीं दे रहा है। यह अनुमतियां लगातार किसी न किसी कारण से टाली जा रही हैं। 
और भी आईएएस अफसर जांच के घेरे में : 
         मध्‍यप्रदेश में एक दर्जन से अधिक आईएएस अफसर जांचों के घेरे में हैं जिनकी किसी न किसी मामले में जांच चल रही है। ऐसे अधिकारियों में अंजू सिंह बघेल, एलके द्विवेदी, यूके सामल, एसएस अली, एमके अग्रवाल, एसआर मोहंती, अजय आचार्य, एम गोपाल रेड्डी, पी नरहरि, एसके मिश्रा, शिखा दुबे, निकुंज श्रीवास्‍तव, निशांत बरवड़े, एम सैलवेंद्रम, आशीष श्रीवास्‍तव, एसपी गुप्‍ता, एचएल द्विवेदी, एस दुबे, संजय गोयल, शिव शेखर शुक्‍ला, प्रमोद अग्रवाल, राकेश गुप्‍ता, एसके पाल, विजय सिंह सिगोरिया व शैलेंद्र सिंह शामिल हैं। इनमें कई आईएएस अफसर सेवानिवृत्‍त हो चुके हैं, लेकिन फिर भी इन अफसरों की जांच तो चल ही रही है। अब अधिकारी भले ही अपने आपको पाक-साफ कहें, लेकिन उनकी जांच किसी न किसी कारण से फाइलों के चक्रव्‍यूह में उलझी हुई है। 
                                 ''मध्‍यप्रदेश की जय हो'' 

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

कानून व्‍यवस्‍था इसलिए पटरी से उतर रही है मध्‍यप्रदेश में

          राज्‍य में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता है जब कोई बड़ा अपराध न होता हो। हर तरफ से यह स्‍वर गूंज रहा है कि अपराध क्‍यों बढ़ रहे हैं। मध्‍यप्रदेश को शांति का टापू कहा जाता था, लेकिन अब अपराधियों के हौंसले इस कदर बढ़ गये हैं कि दिन दहाड़े अपराध करने में उन्‍हें कोई हिचक नहीं हो रही है। प्रदेश के गृहमंत्री उमाशंकर गुप्‍ता कहते हैं कि संगठित अपराध पर काबू पा लिया गया है जिसमें नक्‍सलवाद का सिर नहीं उठने दिया, सिमी का नेटवर्क खत्‍म कर दिया, डाकुओ को ढेर कर दिया और तस्‍करी पर रोक लगा देने सहित आदि शामिल हैं। इन संगठित अपराधों का कहर कभी कभी नजर आ जाता है, लेकिन जो रोजाना के अपराध हो रहे हैं उन पर तो किसी भी स्‍तर पर कोई काबू नहीं पाया जा रहा है। हर दिन प्रदेश में हत्‍या, लूट, अपहरण, बलात्‍कार, चोरिया, धमकी जैसे अपराध आम बात होते जा रहे हैं। अब तो अपराधी इस कदर बैखौफ हो गये हैं कि वे किसी को भी क्रूर ढंग से मारने के लिए तैयार रहते हैं। हाल ही में जबलपुर में एक विकलांग व्‍यक्ति को कार से बांधकर दूर तक घसीटा गया, जबकि इससे पहले सीहोर में ऐसी घटना 2011 में घट चुकी है। इसके साथ ही सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर फर्से से हाथ काटने की घटनाएं हुई। ऐसी जघन्‍य अपराध कई हो रहे हैं। मध्‍यप्रदेश की पुलिस के पास जांच करने की टीम का बेहद अभाव है। न तो पुलिस उन अपराधों को गंभीरता से ले रही है और न ही इस दिशा में विचार हो रहा है कि आखिरकार अपराध बढ़ क्‍यों रहे हैं। पुलिस सुबह से दोपहर तक सड़कों पर हैलमेट की चैकिंग अथवा कारो में काले कांच लगे हैं अथवा नहीं इस चैकिंग में ही उलझी हुई है। उनकी उन तथ्‍यों पर नजर ही नहीं है, जो कि अपराध करके भाग रहे हैं। आखिरकार पुलिस इस हैलमेट की जांच से मुक्‍त होती है, तो वीआईपी ड्यूटी में लग जाती है और थोड़ा बहुत समय बचा तो बाजारों में खाकी बर्दी का गुरूर दिखाने में जुटी रहती है, तो अपराधियों का बेखौफ होना स्‍वाभाविक है। अभी भी मध्‍यप्रदेश में हालात बिगड़े नहीं है। अगर ठीक से ध्‍यान दिया जाये तो निश्चित रूप से कोई न कोई रास्‍ता निकल ही आयेगा और अपराधियों पर अंकुश लग सकता है। 
                                 ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

जल बंटवारे पर मध्‍यप्रदेश और राजस्‍थान में टकराव

 
           नदी और बांध हमारा है फिर भी मध्‍यप्रदेश सिंचाई के लिए बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है। आलम यह है कि पानी की जरूरत है पर अनुबंध के बाद भी राजस्‍थान देने को तैयार नहीं है। तब मध्‍यप्रदेश को स्‍वाभाविक रूप से राजस्‍थान को आंखे दिखानी पड़ेगी। यह विवाद कोई नया नहीं है, बल्कि वर्षों से चला रहा है और इसका कोई हल नहीं निकल रहा है। मध्‍यप्रदेश के ग्‍वालियर-चंबल संभाग के इलाकों में किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल रहा है, जब बार-बार राजस्‍थान से गुहार की जा रही है तब भी वहां के अफसरों की नींद नहीं खुल रही है। हालात यह हो गये हैं कि हमारा पानी राजस्‍थान में तालाब और नदियों में बहाया जा रहा है और मध्‍यप्रदेश को पानी के लिए तरसाया जा रहा है। इस पर 10 दिसंबर,2012 को राजस्‍थान की राजधानी जयपुर में मध्‍यप्रदेश और राजस्‍थान के अधिकारियों के बीच जमकर तनातनी हो गई। यहां तक कि मध्‍यप्रदेश के जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव राधेश्‍याम जुलानिया बैठक में जब सात घंटे पर भी कोई निष्‍कर्ष नहीं निकला तो वह बौखला गये और उन्‍होंने राजस्‍थान के अधिकारियों को धमकी भरे स्‍वर में कह दिया कि अगर पानी के बंटवारे पर यही रवैया रहा तो वह किसी भी अधिकारी को मध्‍यप्रदेश में घुसने नहीं देंगे। उनकी अनुमति के बिना कोई बांधों का निरीक्षण भी नहीं कर पायेगा। यह बैठक मध्‍यप्रदेश, राजस्‍थान अंतर्राज्‍यीय नियंत्रण बोर्ड की स्‍टेंडिंग कमेटी टू की बैठक जयपुर में थी, दोनों राज्‍यों के जल संसाधन विभाग के अधिकारी मौजूद थे। मध्‍यप्रदेश की तरफ से जुलानिया ने तर्क दिया कि बार-बार कहने के बाद भी राज्‍य को पानी नहीं मिल रहा है, जो अनुबंध के तहत पानी मिलना चाहिए, वह भी नहीं दिया जा रहा है। मध्‍यप्रदेश को प्रतिदिन अनुबंध के तहत 3900 क्‍यूबिक पानी प्रति सेकेण्‍ड मिलना चाहिए, लेकिन हफ्ते में एक दिन पानी मिलता है और सात दिन इसके लिए तरसना पड़ता है। राजस्‍थान का जल संसाधन विभाग अनुबंध तोड़ने में माहिर हो गया है। इसी प्रकार बकाया राशि को लेकर भी खूब बहस हुई। राजस्‍थान का कहना है कि मध्‍यप्रदेश से उसे 101 करोड़ की बकाया राशि लेनी है पर मध्‍यप्रदेश के अफसर इस पर दूसरी बात कहते हैं। वह कहते हैं कि वर्ष 2006 के बाद वित्‍त समिति की बैठक ही नहीं हुई, तो फिर किस आधार पर बकाया राशि तय की जा रही है। इन सारे मुद्दों को लेकर विवाद गहरा गया है। मध्‍यप्रदेश के जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव जुलानिया ने राजस्‍थान के सीएस से उनके अधिकारियों द्वारा किये गये दुर्व्‍यवहार की शिकायत कर दी है, तो राजस्‍थान के अधिकारियों ने मध्‍यप्रदेश के सीएस को जुलानिया के व्‍यवहार की कहानी सुना दी है। विवाद बेहद गहरा गया है। अब आगे क्‍या होगा यह तो भविष्‍य के गर्त में है, लेकिन पानी को लेकर टकराव लगातार बढ़ना ही है। 
         मध्‍यप्रदेश में पानी के बंटवारे को लेकर गुजरात से भी विवाद बना हुआ है। सरदार सरोबर बांध मध्‍यप्रदेश में है, पर उसका लाभ गुजरात उठा रहा है। नर्मदा नदी का पानी हमारा है, लेकिन लाभ गुजरात ले रहा है। इस पर भी कई बार विवाद हो चुका है। अब राजस्‍थान में विवाद तूल पकड़ रहा है। आखिरकार जब पानी वितरण की प्रक्रिया शुरू होती है, तो एक अनुबंध होता है। उस अनुबंध को राज्‍य क्‍यों तोड़ते हैं। इस पर अमल करने की बेहद जरूरत है। अगर यही हाल रहा, तो फिर मध्‍यप्रदेश को अपने तेवर और तीखे करने होंगे। 
                                            ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

दूरिया क्‍या कम हो गई दिग्विजय और सिंधिया में

        मध्‍यप्रदेश की कांग्रेस राजनीति गुटबाजी के लिए बदनाम है। यहां के नेता एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी करने में महारथ हासिल कर चुके हैं। प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्‍व पर सवाल उठाने में उन्‍हें मजा आता है। कांग्रेस की राजनीति की धुरी दिग्विजय सिंह और केंद्रीय राज्‍यमंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के बीच लंबे समय से दूरिया बनी हुई हैं पर ऐसा लगता है कि अब यह दूरिया धीरे-धीरे कम हो रही हैं। इसकी वजह बना गुना का जिला कांग्रेस कार्यालय का उदघाटन समारोह। 09 दिसंबर, 2012 को इस कार्यक्रम से पहले गुना में दिग्विजय सिंह उस स्‍थान पर हार लेकर पहुंच गये, जहां से सिंधिया को प्रवेश करना था। जब दिग्विजय हाथ में हार लिये सिंधिया की तरफ बढ़े तो सिंधिया ने हार पहनने के लिए ना-नकूर किया पर दिग्विजय सिंह ने हार पहना ही दिया, जहां पर सिंधिया कहां पीछे रहने वाले थे, उन्‍होंने भी दिग्विजय सिंह को अपना हार पहना दिया। इस पर दोनों गले मिलकर जमकर हंसे और समर्थकों ने तालियां पीटी। यहां दिलचस्‍प यह है कि वर्ष 2006 में सिंधिया और दिग्विजय सिंह के खिलाफ जमकर तनातनी थी, दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ अपनी-अपनी म्‍यान से तलवार निकाल ली थी और बयानों के जरिये हमले किये जा रहे थे। अब दिग्विजय और सिंधिया की निकटता यह जाहिर कर रही है कि कहीं न कहीं दोस्‍ती की खिचड़ी पक रही है। जब मंच पर दोनों नेता भाषण देने खड़े हुए तो फिर तारीफों के पुल बांधे जाने लगे। सिंधिया ने कहा कि संकट की घड़ी में दिग्विजय सिंह ने  साथ दिया, वे उन्‍हें पिता तुल्‍य मानते हैं, इसलिए बेहद आदर करते हैं। उनके बीच सोच-विचार में मतभेद हो जाते हैं, लेकिन वे उनके लिए आदरणीय है, जिसके जवाब में दिग्विजय सिंह ने कहा कि सिंधिया मेरे पुत्र जैसे हैं, उन्‍होंने कहा कि जोड़ने से मजबूती मिलती है, तोड़ने से नहीं। हमारा अंतर्विरोध तब तक है, जब तक टिकट नहीं मिल जाता। टिकट मिलने के बाद कोई विरोध नहीं। गुना में 55 लाख की लागत से कांग्रेस भवन बना है। इस पर प्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष भूरिया ने कहा कि प्रदेश के सभी जिलों में भवन बनाये जायेंगे। निश्चित रूप से दिग्विजय सिंह और सिंधिया में अगर निकटता होती है, तो आगामी चुनाव में इसका लाभ होगा। लंबे समय से देखा जा रहा है कि दिग्विजय सिंह अपने विरोधियों को गले तत्‍काल लगा रहे हैं, फिर चाहे वे कोई भी हों, उन्‍हें अब आगामी चुनाव में किसी भी प्रकार का विरोधी तेवर नहीं चाहिए। कांग्रेस की राजनीति में इस बदलाव का कितना असर होगा, यह तो वक्‍त ही बतायेगा, लेकिन फिलहाल माहौल बनाने की एक छोटी कोशिश तो हो ही रही है। यह सिलसिला लगातार चलता रहे तब बात बनेगी। 
                                     ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

रविवार, 9 दिसंबर 2012

जी का जंजाल बना बुंदेलखंड पैकेज मध्‍यप्रदेश में


           करोड़ों रूपया खर्च करने के बाद भी बुंदेलखंड का इलाका बर्बादी के आंसू बहा रहा है। न तो इसकी चिंता राजनेताओं को है और न ही बुंदेलखंड के विकास का हल्‍ला मचाने वाले शुभचिंतकों को है। लंबे समय से उपेक्षित और बुनियादी सुविधाओं से वंचित बुंदेलखंड को चमकदार बनाने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2010 में एमपी और यूपी के इलाकों को विकास से जोड़ने के लिए बुंदेलखंड पैकेज के नाम पर करोड़ों की राशि आवंटित की थी। इस राशि का उपयोग जिस गति से होना चाहिए था उस हिसाब से नहीं हो पा रहा है। बुंदेलखंड की स्थिति जस की तस है। यहां तक कि आवंटित राशि का एक चौथाई हिस्‍सा भी बामुश्किल हिस्‍सा ही खर्च हो पाया है, जो 
राशि पैकेज के नाम पर खर्च की गई है उसमें भी घोटाले और अनियमितताएं सामने आ रही है। हालत यह हो गई है कि विकास के नाम पर भ्रष्‍टाचार की गंगा बह रही है। इसके पीछे की बड़ी वजह बुंदेलखंड में राजनैतिक चेतना का न होना है। इस इलाके में आधा दर्जन से अधिक जिले शामिल हैं। कांग्रेस और भाजपा ही मुख्‍य दल हैं। कहीं-कहीं तीसरी ताकत भी जोर मारती है, लेकिन फिर भी कांग्रेस और भाजपा के अपनी-अपनी हैसियत है। इसके बाद भी इन दलों ने कभी भी बुंदेलखंड पैकेज का ठीक ढंग से क्रियान्‍वयन हो, इस पर ध्‍यान नहीं दिया। नेताओं का ध्‍यान कमीशन पर रहा और उन्‍होंने भरपूर आनंद भी लिया, लेकिन जिन दलों को विरोध का झंडा उठाना था, वह भी चुप रहे। कभी-कभार विधानसभा में कांग्रेस विधायक गोविंद सिंह राजपूत ने जरूर बुंदेलखंड पैकेज में हो रही अनियमितताओं को उजागर किया। शिवराज सरकार में बुंदेलखंड से तीन कैबिनेट और दो राज्‍यमंत्री हैं, जिसमें जयंत मलैया, गोपाल भार्गव, डॉ0 रामकृष्‍ण कुसमरिया, हरिशंकर खटीक तथा बृजेंद्र प्रताप सिंह शामिल हैं। इन मंत्रियों को बुंदेलखंड पैकेज को व्‍यवस्थित ढंग से जमीन पर उतारने की जिम्‍मेदारी थी, लेकिन जिस जागरूकता के साथ काम करना था, वह काम नहीं हो पाया। यही वजह है कि लगातार घोटाले उजागर हो रहे हैं, यहां तक कि राज्‍य सरकार 422 करोड़ खर्च ही नहीं कर पाई। केंद्र ने बुंदेलखंड पैकेज के लिए 1953 करोड़ 20 लाख के विरूद्व 1425 करोड़ 64 लाख आवंटित कर दिये थे, लेकिन राज्‍य सरकार 422 करोड़ का तो उपयोग ही नहीं कर पाई। इसके साथ ही अभी तक 1033 करोड़ की खर्च राशि में से 458 करोड़ 44 लाख का ही उपयोगिता प्रमाण पत्र भेज सकी है, बाकी राशि का प्रमाण पत्र नहीं भेजा जा सका। ऐसा लगता है
कि राज्‍य सरकार पिछले तीन वर्षों से बुंदेलखंड पैकेज की मिली राशि खर्च करने में कंजूसी बरत रही है जिसके फलस्‍वरूप राज्‍य सरकार राशि खर्च करने में फिसड्डी साबित हो रही है। एक तरफ केंद्र सरकार को रोजाना कोसने वाली राज्‍य सरकार जब राशि ही खर्च नहीं करेगी, तो फिर सवाल उठाने का क्‍या अधिकार है। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान समय-समय पर राशि खर्च नहीं करने को लेकर नाराजगी जाहिर करते रहे हैं। इसके बाद भी विभागों की गति जस की तस है। दुर्भाग्‍यपूर्ण स्थिति यह है कि बुंदेलखंड को विकास की जिस धारा में बहना चाहिए, वह मंजिल अभी तक नहीं मिली है। आम आदमी बुनियादी सुविधाओं के लिए आज भी रो रहा है पर राजनेताओं और नौकरशाही को इसकी कोई चिंता नहीं है। सब अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग अलाप रहे हैं।
                                            ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

कांग्रेस भी याद करने लगी अटल जी को


            पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भाषण कला पर कौन मोहित नहीं हुआ है। उनके उदारवादी चेहरे ने भाजपा से दूर भागते दलों को न सिर्फ पास लाया, बल्कि केंद्र में सत्‍ता भी दिलार्इ। अटल जी के सामने भाजपा में सारे नेता फीके हैं, वे जिस अंदाज से सभाओं में भाषण करते हैं और तालिया बजवाते हैं उसका तो भारतीय राजनीति में फिलहाल कोई विकल्‍प ही नहीं है। उनके वे मारक तीर जो कि वे सभाओं में चलाया करते थे, उनकी बार-बार राजनेता याद करते हैं। 
अटल जी का मध्‍यप्रदेश की राजनीति से गहरा निकट का रिश्‍ता रहा है। वह राज्‍य के हर हिस्‍से से बाकिफ हैं। उन्‍होंने दो बार विदिशा और ग्‍वालियर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। ग्‍वालियर उनके लिए न सिर्फ कर्मभूमि रही, बल्कि परिवार का भी रिश्‍ता बना रहा। पिछले लंबे समय से वे अस्‍वस्‍थ हैं और राजनीति से दूर-दूर तक किनारा कर लिया है पर आज भी उन्‍हें भाजपा तो भूल ही नहीं पा रही है, बल्कि कांग्रेंस नेता भी जहां-तहां याद कर ही लेते हैं। मध्‍यप्रदेश की भाजपा सरकार ने अटल जी के नाम पर हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय खोला और भी कई संस्‍थानों के नाम रखे हैं। हाल ही में नदी जोड़ योजना के तहत क्षिप्रा लिंक परियोजना शुरू हुई है। यह योजना भी पूर्व प्रधानमंत्री अटल जी के कार्यकाल में शुरू हुई थी जिसे एनडीए सरकार भूल गया। अचानक कांग्रेस महा‍सचिव दिग्विजय सिंह को फिर अटल जी याद आ गये हैं। उन्‍होंने दिल्‍ली में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि लोकसभा में विपक्ष ओर भाजपा की वरिष्‍ठ नेता सुषमा स्‍वराज प्रधानमंत्री पद के लिए बिल्‍कुल फिट हैं। यही नहीं सुषमा जी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तरह है जिन्‍हें सारे दलों ने स्‍वीकार किया था। भाजपा में वाजपेयी के बाद यदि कोई उदारवादी चेहरा है, तो वह सुषमा जी ही है, जो अन्‍य दलों को स्‍वीकार हो सकती है, क्‍योंकि उनके पीछे राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ का टेग नहीं लगा है। इस विषय पर जब नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्‍वराज से टिप्‍पणी चाही गई, तो उन्‍होंने कहा कि दिग्विजय सिंह को विवाद करने की पुरानी आदत है। इसके लिए उनके पास कई रास्‍ते होते हैं। निश्चित रूप से सुषमा जी को यही बोलना चाहिए, लेकिन राजनीति की धारा में कहीं न कहीं दिग्विजय सिंह ने सुषमा जी को समझा तो सही और उन्‍हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार तक बताया। इसके पीछे राजनीतिक गुणा-भाग हो सकता है, लेकिन सुषमा स्‍वराज ने एफडीआई को लेकर लोकसभा में जो तेवर अपनाये थे, व निश्चित रूप से न सिर्फ सराहनीय है, बल्कि प्रशंसनीय भी है। इससे उनका राजनीतिक कद बढ़ा है। सुषमा जी को भाषण देने की कला बेहद प्रभावित करती है और वे अपने अंदाज में विषयों को प्रस्‍तुत भी करती है। सुषमा स्‍वराज भी मप्र के विदिशा संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं और अगर प्रधानमंत्री पद के दावेदार के लिए सुषमा स्‍वराज का नाम सामने आ रहा है, तो यह राज्‍य के वांशिंदों के लिए एक शुभ संकेत है। इस नाम को आगे बढ़ाने में दिग्विजय सिंह ने पहल करके राजनीतिक चाल खेली है, जिसके परिणाम एक दो माह के भीतर भाजपा में दिखेंगे। 
                                      ''मप्र की जय हो''

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

शिक्षक की क्रूरता फिर उजागर हुई

           क्‍या शिक्षक भी इतना क्रूर हो सकता है कि वह एक बाल्‍टी की खातिर अपने स्‍कूल में पढ़ने वाले बच्‍चे को इतना मारे कि वह जान ही हाथ से गवा बैठे। यह हादसा मध्‍यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्‍य जिला बेतूल में हुआ है। जहां पर बैतूल के निकट पाथाखेड़ा प्राइमरी स्‍कूल में पढ़ने वाला सात वर्षीय छात्र असलम को 16 नवंबर, 2012 को स्‍कूल के दो शिक्षक बिरजू सोनरिया और विजयराम भगत ने इसलिए इतना मारा कि वह बेहोश होकर गिर पड़ा। कारण था बाल्‍टी का टूटना। शिक्षकों ने उसकी रीड की हड्डी तोड़ दी। उसको उपचार के लिए पहले बैतूल, नागपुर और भोपाल लाने के बाद 4 दिसंबर को उसकी हमीदिया अस्‍पताल में मौत हो गई। इस मामूली बात पर पिटाई का मामला निश्‍चित रूप से गंभीर है। अभी तक पुलिस ने एक शिक्षक को गिरफ्तार कर लिया है और गैर इरादतन हत्‍या का कैश भी दर्ज कर लिया है। दुखद पहलू यह है कि घटना होने के बाद भी न तो समय पर बच्‍चे को इलाज मिला और न ही किसी प्रकार की सहायता। बल्कि शिक्षक ने भी बच्‍चे को माता-पिता को अंधरे में रखा। अब स्‍कूल शिक्षा मंत्री अर्चना चिटनिस कह रही है कि वह कड़ी कार्यवाही करेगी, लेकिन सात वर्षीय असलम 18 दिनों तक अस्‍पताल में मौत से संघर्ष करता रहा, इसके बाद भी स्‍कूल शिक्षा विभाग की नींद नहीं खुली। उसके मस्तिष्‍क के पास वाली रीड की हड्डी में फैक्‍चर हुआ था जिसके कारण बच्‍चे को असहनीय दर्द होता था। बच्‍चे की हालत देखकर दोनों शिक्षक पॉर्ढर अस्‍पताल से गायब हो गये। मध्‍यप्रदेश में शिक्षकों द्वारा बच्‍चों को मारपीट करने की घटनाएं कई बार सामने आ रही हैं। इसके बाद भी सरकार ने किसी कड़ी कार्यवाही का प्‍लान नहीं बनाया। प्राइवेट स्‍कूलों में अगर बच्‍चों के साथ ऐसी कोई घटनाएं होती है, तो शहरों में बड़ा हंगामा होता है, लेकिन आदिवासी जिले में हुई घटना के बाद न तो सरकार की नींद खुली और न ही कोई सामाजिक संगठन ने हाय-तौबा मचाई और अंतत: बच्‍चे की मौत हो गई। अब हर तरफ से शोरगुल हो रहा है पर क्‍या हम अब भी इन घटनाओं के पहलूओ पर गंभीरता से विचार करेंगे या फिर जांच रिपोर्ट में सारे मामले दबकर रह जायेंगे। 
                                          मध्‍यप्रदेश की जय हो

फिर कमर कसी

          मध्‍यप्रदेश विधानसभा का शीतकालीन सत्र 04 दिसंबर से शुरू हो गया। इसके साथ ही विपक्ष ने सरकार को घेरने के लिए पूरी तरह से कमर कस ली है। अपने-अपने अस्‍त्र तैयार है बस उनको छोड़ने की जरूरत है। विपक्ष के पास कई मुद्दे हैं जिन पर खूब चर्चा हो सकती है। अब विपक्ष के ऊपर निर्भर है कि वह सदन में चर्चा कराना चाहता है अथवा हंगामा-शोरगुल करके अपनी भूमिका तय करेगा। मध्‍यप्रदेश में विधानसभा के भीतर चर्चाओं का सिलसिला विषयवार कम होता जा रहा है। बार-बार हर विषय हंगामे की भेंट चढ़ रहा है जिसमे फलस्‍वरूप जो सार्थक बहस के जरिये परिणाम मिल सकते हैं वह राज्‍य को नहीं मिल पा रहे हैं। सत्‍ता
पक्ष भी इस मंशा में रहता है कि उनके विधायी कार्य समय पर हो जाये, विपक्ष के जवाब जितने संभव है उतने दिये जा सकें। सदन में हंगामा और शोरगुल न हो इसको लेकर विपक्ष और सरकार के बीच वार्ताओं का दौर चला है। अरसे बाद संसदीय कार्य मंत्री नरोत्‍तम मिश्रा ने नेता प्रतिपक्ष के निवास पर जाकर सौजन्‍य मुलाकात सदन शुरू होने के पहले की है। इससे ऐसा आभास होता है कि सदन में चर्चाएं होगी, जबकि विपक्ष्‍ा आक्रमक तेवर अपनाये हुए है और वह कह रहा है कि इस बार, सड़क, बिजली, और जमीन अधिग्रहण तथा बिगड़ती कानून व्‍यवस्‍था पर चर्चा अवश्‍य करायी जायेगी। संसदीय परंपराओं के अनुसार चर्चा के परिणाम निश्चित रूप से बेहतर होते हैं बस दोनों दल मिलकर चर्चा करें, तो कोई न कोई निष्‍कर्ष निकलेगा ही। 
                                           ''मध्‍यप्रदेश की जय हो''

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

प्रवासी पक्षियों का मध्‍यप्रदेश में डेरा

      धीरे-धीरे मध्‍यप्रदेश से पक्षियों की संख्‍या घटती जा रही है। कई प्रजातियां तो समाप्‍त सी हो गई हैं। इस दिशा में वन विभाग की वन्‍यप्राणी इकाई विचार तक नहीं कर रही है और न ही पक्षियों को संरक्षित करने की कोई योजना है। इसके चलते राज्‍य से पक्षी लगातार कम हो रहे हैं। यूं तो हर साल सर्दी के मौसम में प्रवासी पक्षी नदियों के किनारे आते हैं और अगर उन्‍हें अपने अनुकूल माहौल मिलता है, तो वह ढेरा भी जमा लेते हैं। इन प्रवासी पक्षियों को पर्याप्‍त संरक्षण देने में वन विभाग की कोई रूचि नहीं है। इस साल दिसंबर महीने की शुरूआत के साथ ही भोपाल की बड़ी झील के किनारे तथा आसपास की नदियों और तालाबों पर प्रवासी पक्षियों ने ढेरा जमाना शुरू कर दिया है। उनके शोरगुल और आवागमन से झील का किनारा धीरे-धीरे गुलजार हो रहा है। 
                            ''जय हो मप्र की''
 

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

भोपाल गैसकांड - 28 वर्ष का सफर : थम नहीं रहे आंसू


         गैस त्रासदी के 28 साल बाद भी भोपाल के वांशिंदों के आंसू थम नहीं रहे हैं। पीड़ाएं अनंत हैं। न तो कहीं सुनवाई हो रही है और न ही कोई मरहम लगाने को तैयार है। हर तरफ से दर्द ही दर्द मिल रहा है। त्रासदी के बाद भोपाल की आवो-हवा में गैस पीडि़तों को लेकर आंदोलन और गुस्‍सा हर साल त्‍यौंहार की भांति दो से तीन दिसंबर तक जहां-तहां सुनाई देता है, लेकिन साल भर इस पर कोई चर्चा तक नहीं करता है। यह स्थिति त्रासदी के 25 साल बाद ज्‍यादा बनी है। केंद्र और राज्‍य सरकार को लगता है कि उन्‍होंने पीडि़तों के लिए पुनर्वास और इलाज की पर्याप्‍त व्‍यवस्‍था कर दी है पर परिस्थितियां इसके विपरीत है। न तो पीडि़तों के परिवारों को पुनर्वास मिला है और न ही अस्‍पतालों में दर्द सह रहे पीडि़तों को दवाईयां नसीब हो रही हैं। पुनर्वास के नाम पर करोड़ों रूपया खर्च किया जा चुका है, लेकिन सिर्फ बड़े-बड़े भवन विभिन्‍न क्षेत्रों में नजर आते हैं, लेकिन इन क्षेत्रों में पुनर्वास के नाम पर 500 लोगों को भी रोजगार नसीब तक नहीं हुआ है। यही हाल इलाज का है। अस्‍पताल तो दर्जनों हैं, पर उनमें इलाज करने वाले चिकित्‍सक नहीं हैं, उपकरण चल नहीं रहे हैं, तो चैकअप कैसे होगा। दवाईयां तो मिल ही नहीं रही हैं। गैस पीडि़त इंसाफ के लिए संघर्ष कर-करके थक गया है। अभी तक यूका के मालिक पर कोई कार्यवाही नहीं हुई है। 
       मुआवजा को लेकर सवाल तेजी से उठते रहे हैं। अदालतों में इस पर बहस लगातार जारी है। जहरीली गैस का असर लोगों में पीढि़यो तक रहेगा। यूका कारखाने से रिसी मिथाइल आइसोसाइनाइट का असर तो बरकरार है ही। अभी वर्तमान में भी यूका के आसपास भूजल में जहरीला रसायन, 300 मैट्रिक टन कचरा पड़ा हुआ है। इसे खत्‍म करने के लिए पिछले दस सालों से बहस चल रही है पर कोई परिणाम सामने नहीं आया है। राज्‍य और केंद्र के बीच इस कचरे को लेकर बहस छिड़ी हुई है कि आखिरकार कचरे को कहां दफनाया जाये। इसका बेहतर विकल्‍प आज तक नहीं खोजा जा सका है। पीडि़तों के दर्द कम नहीं हो रहे हैं। हर साल दर्द में इजाफा ही हो रहा है। इस हादसे में 15 हजार से ज्‍यादा मौते हुई, छह लाख से ज्‍यादा लोग बीमार हैं। इंसाफ के लिए लगातार लड़ाई जारी है। मुआवजा वितरित हो चुका है, लेकिन अन्‍य सुविधाओं के लिए गैस पीडि़त लगातार संघर्ष कर रहे हैं। केंद्र और राज्‍य सरकार की अनदेखी होने लगी है। ऐसी स्थिति में जनसंगठनों की मारक क्षमता भी दिनों दिन कमजोर हो रही है। कभी-कभार आंदोलन हो रहे है। इन आंदोलनों के बाद भी गैस पीडि़तों का दर्द कम नहीं हुआ है, बल्कि वह लगातार बढ़ ही रहा है। इस दर्द पर मरहम कौन लगायेगा यह सवाल तो भविष्‍य के गर्भ में छुपा हुआ है। 
                                       ''जय हो मप्र की''