शनिवार, 20 अप्रैल 2013

फिर किसानों की जिंदगी पर पड़ी मौसम की मार

    मध्‍यप्रदेश के किसानों पर किसी की बुरी नजर लग गई है। जब भी किसान अपनी फसल तैयार करके बाजार में ले जाने के लिए बेताब होता है, तो मौसम अपना ऐसा रंग दिखाता है कि उसके सारे सपने ध्‍वस्‍त होने लगते हैं। ऐसा नहीं है कि यह एक बार हो रहा है, बल्कि इस साल तो गेहूं की फसल उगने से लेकर कटने तक के दौरान मौसम ने बार-बार बेरहमी का रूप दिखाया है। अब तो किसानों ने अपनी फसल बेचने के लिए मंडियों में दस्‍तक दी थी। कई ट्रालियां मंडियों में अपनी पारी का इंतजार कर रही थी कि 19 अप्रैल को अचानक शाम को मौसम ने ऐसी करवट बदली की मंडियों में रखा गेहूं भींग गया। अब गेहूं में बारिश के कारण काले दाग लग जायेंगे, जिसके फलस्‍वरूप न तो उन्‍हें व्‍यापारी बेहतर दाम देंगा और न ही मंडी खरीदेगी। इसके चलते किसान को फिर लुटना-पिटना तय है। मप्र में इस बार बारिश ने होशंगाबाद, रायसेन, राजगढ़, धार, शिवपुरी आदि इलाको में हुई बारिश के कारण हजारों क्विंटल गेहूं भींग गया। कई जिलों में दो दिनों से रूक-रूक का बारिश हो रही है।
        इसके फलस्‍वरूप किसानों की फसले बुरी तरह से बर्बाद हो गई हैं। इससे पहले ओलों ने खड़ी फसल को चौपट कर दिया था। जिसके मुआवजे को लेकर किसान दर-दर भटक रहा है। अब किसानों को नये सिरे से फिर जद्दोजहद करनी पड़गी। किसानों के लिए यह समझ से परे है कि आखिरकार उन पर ही बार-बार आपदा क्‍यों आ रही है। वे हर बार पूरी मेहनत और ताकत से अपनी खेती में लगे रहते हैं। राज्‍य की भाजपा सरकार भी किसानों को हर तरह से मदद करने के लिए अग्रसर है। इसके बाद भी किसानों की फसलों का बार-बार चौपट होना यह दर्शाया रहा है कि किसी न किसी की बुरी नजर लग गई है जिसका खामियाजा निरीह और बेवश किसान भुगतने को विवश है। न तो किसान को कुछ समझ में आ रहा है और न ही उसे अपना भविष्‍य दिख रहा है। ऐसी स्थिति में किसान के जीवन में चारो ओर अंधेरा ही अंधेरा है। शायद अंधेरे के बाद उजाले की दस्‍तक किसानों के जीवन में हो। 
                                     ''मप्र की जय हो''

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

अश्‍लील संवाद करते हैं शिवराज सरकार के मंत्री विजय शाह

        यूं तो राजनीति में न तो अब मर्यादा रही है और न ही कोई मापदंड बचे हैं। कब कौन राजनेता क्‍या बोल दे, आजकल तो इसका भी भरोसा नहीं। यहां तक कि राजनेता हंसी-मजाक में अश्‍लील संवाद भी करने लगे हैं। इसमें शिवराज सरकार के आदिम जाति कल्‍याण मंत्री विजयशाह भी शामिल हो गये हैं। यह मंत्री महोदय न तो मर्यादा पर कायम रह पाये और न ही जब छात्राओं के बीच अपनी जुबान चला रहे थे, तब भी उन्‍हें मान-मर्यादा का कोई ध्‍यान नहीं था। उनके संवाद ऐसे अश्‍लील थे कि वे बोले जा रहे थे और लोग तालियां बजाये जा रहे थे, लेकिन जब उनके संवाद का वीडियो मार्केट में आया और टी0बी0 चैनलों में हलचल मची तो फिर मंत्री महोदय को अपनी सफाई तक देनी पड़ी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मंत्री महोदय अपनी बात तो कह चुके हैं। शिवराज सरकार में कैबिनेट मंत्री और विजयशाह एक बार फिर विवादों में हैं। उनके बयान ने राजनीति में भूचाल ला दिया है। उन्‍होंने कन्‍या विद्यालय में ऐसा-ऐसा बोला है, जिससे न सिर्फ राजनीति शर्मसार हुई है, बल्कि लोगों का राजनेताओं के प्रति और विश्‍वास टूटा है। यहां तक कि मुख्‍यमंत्री की पत्‍नी श्रीमती साधना सिंह के बारे में भी जो बाते कहीं है वह भी गंभीर है। फिर भले ही शाह ने पत्रकारों से रात्रि में अपने बयान की सफाई भी दी है, लेकिन विपक्ष ने तो इन्‍हें मुद्दा बना लिया है। 
आखिर ऐसा क्‍या कह दिया शाह ने : 
      मंत्री शाह ने झाबुआ में कहा कि ''पहला वो'' भुलाये नहीं भूलता, बताओ मामला कभी भूलता है क्‍या, चीज ही ऐसी है सभी समझ गये होंगे'' मैंने भाभी (सीएम की पत्‍नी) से कहा चलो घुमाकर लाता हूं, भाई साहब के साथ तो रोज जाती हो, कभी हमारे साथ भी चलो, ट्रेकशूट छोड़ो, लड़कियों को दो-दो टी-शर्ट देंगे, मस्‍त वाली, लोवर भी देंगे, बढि़या वाला। मंत्री अपने द्विअर्थी संवादों में छात्राओं के सामने ऐसी अश्‍लील बातें कहीं हैं, जो कि आम आदमी भी बच्चियों के सामने करने में शर्माते हैं। मंत्री ने कहा कि झाबुआ में तो एक के साथ एक फ्री का चलन बढ़ गया है। उन्‍होंने महिला अधिकारी से मुस्‍कराने का अनुरोध करते हुए कहा कि अगर मुस्‍कराओगी नहीं तो सारी राशि कैंसिल कर दूंगा। इन बयानों के बाद जब खूब हल्‍ला मच गया, तो शाह ने रात्रि में पत्रकारिता बैठक बुलाया अपनी सफाई दी कि उन्‍होंने मजाक में कहा था और उनकी मंशा किसी को चोट पहुंचाने की नहीं थी और न ही किसी की भावना आहत करने की थी। यहां तक कि सीएम की पत्‍नी साधना सिंह से भी उन्‍होंने मांफी मांगी। 
शाह की फितरत है ऐसी बाते करना : 
        ऐसा नहीं है कि मंत्री विजयशाह ने पहली बार ऐसा विवादास्‍पद बयान दिया हो, इससे पहले भी वे बयानों के जरिये विवादों में रह चुके हैं। जनवरी, 2010 में खंडवा जिले के मलगांव उत्‍सव में वे विदेशी महिला कलाकारों के साथ नृत्‍य करते हुए देखे जा चुके हैं। दो माह पहले उन्‍होंने अलीराजपुर में कहा था कि सरकार लड़कियों की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकती, यह गारंटी लड़कियों को स्‍वयं लेनी होगी। वर्ष 2011 में उन्‍होंने ब्रम्‍हाणों के खिलाफ भी जहर उगला था, तो उन्‍होंने कहा था कि ब्रम्‍हाणों को भोजन मत कराओ, पौधे लगाओ। यह सच है कि उनके बयान को लेकर खूब हल्‍ला मच गया है और हमेशा मचता रहेगा, लेकिन भाजपा नेताओं ने सारी मर्यादा तार-तार कर दी है। उत्‍तरप्रदेश के सीएम अखिलेश ने तो एक मंत्री द्वारा सड़कों की तुलना हेमा मालिनी के गालों से की और एक डीएम की खूबसूरती की खूब प्रशंसा कर डाली तो उन्‍हें मुख्‍यमंत्री ने उन्‍हें कैबिनेट से बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। अब मप्र में भी शाह के खिलाफ खूब माहौल बन रहा है। जगह-जगह पुतले जलाये जा रहे हैं। 
                                                           ''मप्र की जय''

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

सरकारी अफसरों को काम करने में आ रही हैं बाधाएं

          अगर मध्‍यप्रदेश में कोई अफसर नियम-प्रक्रिया से काम करना चाहे, तो उसके लिए राह आसान नहीं है, बल्कि जटिल होती जा रही है। यही वजह है कि अधिकारी और राजनेताओं के बीच टकराहट अब प्रदेश में कोई नई बात नहीं रह गई है। किसी न किसी इलाके में अधिकारी के साथ अभद्र व्‍यवहार की घटनाएं भी खूब हो रही हैं। अधिकारी अपने स्‍तर पर नाराजगी जाहिर कर चुप हो रहे हैं, क्‍योंकि उन्‍हें नौकरी करना है और वे इस बहाने तंत्र पर तीखा प्रहार तो कर रहे हैं, लेकिन उससे लड़ने की क्षमताएं खो चुके हैं। अब मामला अलीराजपुर की प्रभारी सीएमएचओ डॉ0 अनसुर्इया गबली का सामने आया है। डॉ0 गबली ने स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के प्रमुख सचिव को लिखे पत्र मे कहा है कि अलीराजपुर के भाजपा नेता, अधिकारी और डॉक्‍टर भ्रष्‍ट हैं, उन्‍होंने तो पूर्व कलेक्‍टर राजेंद्र सिंह पर भी आर्थिक अनियमितताओं का आरोप जड़ा है। इसके साथ ही जिला अस्‍पताल के पांच चिकित्‍सकों पर धोखा-धड़ी करने का आरोप लगाया है। इस मामले में क्षेत्रीय विधायक नागर सिंह चौहान, जिला भाजपा अध्‍यक्ष सौमानी, पूर्व जिला अध्‍यक्ष शाह आदि के साथ डॉक्‍टर और अधिकारियों पर आरोप डॉ0गबली ने लगाये हैं। कोई अधिकारी पहली बार इस तरह से आरोप लगाता नजर नहीं आता था, लेकिन अब तो खुलकर लोगों ने लड़ने का इरादा बना लिया है। इसके साथ ही लोक निर्माण विभाग के सब इंजीनियर रामेश्‍वर चतुर्वेदी और खनिज निरीक्षक संजय भार्गव की मौत का मामला लगातार उलझता जा रहा है। दोनों की मौत को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। इसके साथ ही हाल ही में इंदौर के विकास प्र‍ाधिकरण कार्यालय में अधिकारियों को कुर्सी से धक्‍का देकर भाजपा नेता उस पर बैठ चुके हैं। इससे पहले भोपाल में तो सीएसपी की कुर्सी पर बजरंग दल के नेता बैठकर निर्देश दे चुके हैं। वही भोपाल के एक अन्‍य थाने में तो संघ परिवार के समर्थकों से सवाल जवाब करने पर पुलिस कर्मियों को निलंबित किया गया था, जब बड़ा हल्‍ला मचा तो उन्‍हें अचानक बहाल कर दिया गया। इससे साफ जाहिर है कि कहीं न कहीं तंत्र व्‍यवस्‍था में राजनीति का हस्‍तक्षेप तेजी से बढ़ गया है। इसी का परिणाम है कि झाबुआ जिले की कलेक्‍टर ने तो माफिया के बढ़ते हस्‍तक्षेप से परेशान होकर जिला ही छोड़ने का मुख्‍यमंत्री से अनुरोध में पत्र लिख दिया था। किसी न किसी क्षेत्र में माफिया तेजी से अपने पैर फैला रहा है। अगर इस माफिया से कोई अधिकारी आमना-सामना कर रहा है, तो उसे फिर कई प्रकार की सजाएं भोगनी पड़ रही हैं। यही वजह है कि माफिया और तंत्र के बीच गठजोड़ होने लगा है, जो कि राज्‍य के विकास के लिए एक गंभीर खतरा है। अगर यह गठजोड़ कामयाब हो गया तो फिर विकास पर विचार करना तो दूर की बात जो भी राशि विकास को मिलेगी उस पर अमल होना संभव नहीं होगा। ऐसा नहीं है कि व्‍यवस्‍थाओं में हर व्‍यक्ति को अपनी-अपनी आवश्‍यकताएं होती है, पर हर चीज की एक सीमा है। अब मप्र में यह सीमाएं लगातार टूट कर बिखर रही हैं। इस पर तत्‍काल रोक लगाने की आवश्‍यकता तो है ही साथ ही तंत्र को भी अपनी कार्यशैली में बदलाव लाना होगा, अन्‍यथा तंत्र में भी कई खामियां हैं और वे छोटी-छोटी बातों पर अक्‍सर सवालों को रोकती हैं। 
                                        ''मप्र की जय''

रविवार, 14 अप्रैल 2013

जड़ जमा ली सामाजिक कुरीतियों ने मप्र में

        भागम-भाग की जिंदगी में अब मध्‍यप्रदेश के रहवासियों के बीच समाज की महत्‍ता धीरे-धीरे खत्‍म हो रही है। समाज का ताना-बाना तेजी से टूट रहा है जिसके फलस्‍वरूप सामाजिक कुरीतियां फिर से अपने पैर फैला रही हैं। उनकी जड़े इस कदर मजबूत हो गई हैं कि अब सामाजिक कुरीतियों का घिनौना रूप कभी भी राज्‍य के किसी भी हिस्‍से से सामने आ रहा है। भक्ति में डूबकर ईश्‍वर से जुड़ने की कामना को लेकर युवक ने बलि के रूप में अपनी गर्दन देवी प्रतिमा के सामने चढ़ा दी, तो शहडोल में युवती ने जीब काटकर मंदिर में चढ़ा दी, भोपाल में भी पुलिस सेवा में कार्यरत एक कर्मचारी नव दुर्गा उत्‍सव के दौरान जीब को काटने का उपक्रम करते हैं। यह कुरीतियं नहीं तो क्‍या है। माना कि वह आस्‍था में अंध भक्‍त हैं। निश्चित रूप से ईश्‍वर हमारे आसपास है, ईश्‍वर के बिना हम एक पल भी सांस नहीं ले सकते हैं। मप्र भी कोई बिरला राज्‍य नहीं है, जहां पर मंदिर न हों। इस राज्‍य में मंदिरों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है, तो भक्‍त भी कम नहीं हो रहे हैं। ठीक है भक्ति की जाये, लेकिन शरीर का अंग ही चढ़ा दिया जाये, तो फिर जिस लक्ष्‍य के लिए हम जी रहे हैं, अगर वही खत्‍म हो जायेगा, तो फिर भक्ति किस काम की। यही स्थिति कटनी में देवी भक्‍त युवक ने अपनी गर्दन काटकर देवी के चरणों में अर्पित कर दी। हद तो तब हो गई, जब ग्रामीणों ने घायल युवक को अस्‍पताल ले जाने की बजाये, देवी स्थल पर ही लाल कपड़े से लपेडकर देवी के चरणों में अर्पित कर दिया। इस घटना के दौरान मंदिर के आसपास जन समुदाय उमड़ पड़ा। सुबह 9 बजे की घटना के बाद शाम को 4 बजे पुलिस पहुंची। जब पुलिस युवक को इलाज हेतु अस्‍पताल ले जाने लगी तो ग्रामीणों ने रोक दिया। यह घटना कटनी जिलेी ग्राम पंचायत सुड्डी की है, जहां पर महानदी के मुहाने पर एक देवी प्रतिमा स्‍थापित है। 35 वर्षीय युवक मोहन लाल केवट दो दिनों से मां भक्ति की आराधना में लीन था। इसी प्रकार की दूसरी घटना आदिवासी अंचल के केवलारी में हुई।  जहां पर ग्राम खुसरीपार में 16 वर्षीय युवती ने जीब काटकर देवी मां के चरणों में चढ़ा दी। यह युवती कु0अनसुईया मसकौले अपनी जीब देवी के चरणों में चढ़ाने के बाद आज पूरी तरह स्‍वस्‍थ है पर उसकी आवाज गायब हो चुकी है। 
अंध विश्‍वास खत्‍म नहीं हो रहा है : 
          दुखद पहलु यह है कि मप्र में अंधविश्‍वास की खाई आज भी फैलती जा रही है। डायन बताकर आदिवासी अंचलों से महिलाओं को पागल करार दिया जा रहा है। पिछले पांच साल में ऐसी एक दर्जन से अधिक घटनाएं हो चुकी है जिसमें महिला को पागल बताकर गांव से बाहर कर दिया जा रहा है। इसी के साथ ही आज भी बाल विवाह की कुप्रथा बरकरार है। चोरी-चुपके बाल विवाह हो रहे हैं। वर्षो पूर्व सतीप्रथा पूरे देश से भली खत्‍म हो गई हो, लेकिन मप्र के बुंदेलखंड अंचल में आज भी सती प्रथा कायम है। 90 से 2000  के दशक में एक महिला बुंदेलखंड में सती हो चुकी है। कुप्रथाएं आज भी हमारे सामने तेजी से फैलती जा रही है और इसमें समाज बौना साबित हो रहा है। अब तो समाज के नाम पर कुछ सामाजिक सम्‍मेलन हो जाते हैं, तो धार्मिक कार्यक्रमों के जरिये प्रवचन का लाभ ले लिया जाता है, यही समाजसेवा बच गई है। कहीं-कहीं रोटरी क्‍लब गरीब बच्‍चों, अनाथ परिवारों और कैम्‍प लगाकर अपनी समाज सेवा दिखा देता है। समाज को अब यह कुरीतियां नजर नहीं आ रही है, जो कि लगातार अपने पांव फैला रही हैं। इस दिशा में समाज को ही नई पहल करके कुरीतियों से लड़ना होगा। 
                                            ''मप्र की जय हो''

MPraag: राजनेता अभी आमने सामने नहीं आए

MPraag: राजनेता अभी आमने सामने नहीं आए:                            मप्र की राजनीति यूं भी ठंडी ही  रहती है कभी कभार ही उसमें उबाल आता है अगर कभी ज्‍यादा उबाल आ जाए तो एकाध पखवाडा ...

राजनेता अभी आमने सामने नहीं आए

                           मप्र की राजनीति यूं भी ठंडी ही  रहती है कभी कभार ही उसमें उबाल आता है अगर कभी ज्‍यादा उबाल आ जाए तो एकाध पखवाडा जरूर उस पर बहस चलती है, यहां की राजनीति की एक खासियत बात यह है कि यहां दलों के बीच आपस में मतभेद की दीवारें कम ही है,परदे के पीछे भी अभियान चलाने वाले नेता भी कम ही है, यही वजह हे कि यहां पर विकास को लेकर कोई भी राजनेता दिल्‍ली में आंखे तक नहीं दिखाता  है कभी कभार सीएम शिवराज सिंह चौहान ने केंद्र के खिलाफ आवाज तेज कर राज्‍य के विकास में उपेक्षा का आरोप लगा चुके है पर कांगेसी कभी विकास को लेकर दिल्‍ली में सक्रिय नही रहते,यहां तक कि अपने अपने क्षेत्रों में होने वाले विकास कार्यो को लेकर भी केंद्रीय मंत्रियों से संवाद नही करते , यहां पर लडाकू तेवर गायब से ही है, कभी कभार ही तीखे तेवर दिखते है, अब देखिए विधानसभा चुनाव में मात्र छह माह का समय बाकी है पर अब भी राजनेताओं के तेवर आक्रमक नहीं हुए है, यहां तक कि वे अपनी अपनी ढपली और अपने राग अलाप कर रहे है इस वजह से राजनेता भी जिस तरह से सक्रिय होना चाहिए वे नहीं हो पा रहे है, कांग्रेस में तो प्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष कांतिलाल भूरिया, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिधिया लगातार क्षेत्रों में सभाएं और सम्‍मेलन कर रहे है जबकि भाजपा की तरफ यह जिम्‍मेदारी सीएम अकेले ही संभाल रहे है,चौहान लगातार कार्यक्रमों में भाग ले रहे है जबकि प्रदेश भाजपा अध्‍यक्ष् नरेंद सिंह तोमर भी सक्रिय हुए है, भाजपा में फिलहाल कम नेता ही सक्रिय हुए है हाल ही में विरोधी गुट से ताकतवर हुए संगठन में उमा भारती और प्रभात झा की नई नियुक्ति से भी भाजपा के ताने बाने में बदलाव आने के संकेत मिलने लगे है इससे यह आभास होता है‍ कि भविष्‍य की राजनीति में उबाल आने के साथ ही माहौल गर्म होगा है जिसे भाजपा और काग्रेस नेता ही हवा देगे तब राजनीति की दिशा बदलेगी

                                         मप्र की जय हो

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

इसलिए मार डाला मां ने दिल के टुकड़े को

       कभी-कभी जीवन में अपनी गलतियों की वजह से वह काम भी करना पड़ता है, जो कि स्‍वीकार नहीं होता है, लेकिन मजबूरी, विवशता और परेशानियां जीवन में ऐसी आती हैं कि फिर वह काम भी करना पड़ता है, जो मंजूर नहीं है। ऐसा ही कदम शहडोल जिले की जयसिंह नगर निवासी महिला सुनीता यादव ने उठा लिया और उसने अपने दिल के टुकड़े को अपने ही हाथों से मार डाला। इसकी भनक जब पुलिस को लगी, तो ततीश की गई तो और भी भयाभय तस्‍वीर सामने आई। महिला ने पुलिस के सामने स्‍वीकार किया कि उसने अपने कलेजे को इस कारण मार डाला, क्‍योंकि वह पढ़ाई करना चाहती हैइसी के साथ ही युव‍ती को अहसास था कि बच्‍चा पढ़ाई में बाधा बनेगा। इसलिए उसने कलेजे के टुकड़े को नौ माह तक तो गर्भ में पाला, लेकिन जैसे ही बच्‍चा बाहर आया तो उसने मारकर झाडि़यों में फेंक दिया। शुरूआती दौर में तो इस महिला ने यह कहानी गढ़ी की उसके बच्‍चे को नर्स ने चुरा लिया, लेकिन जब नर्स से पूछताछ की गई, तो पता चला कि वह नर्स तो अवकाश पर है। इसके बाद पुलिस ने महिला को पकड़ा और उससे शक्ति से पूछताछ की तो पता चला कि उसी ने अपने दिल के टुकड़े को मार डाला है। इसके बाद पुलिस ने उस महिला को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। ये युवती स्‍कूल मसीदा में कक्षा-12वीं की छात्रा है और अभी उसको अपनी पढ़ाई पूरी करनी है, लेकिन परिस्थितियों ने उसे मां बना दिया। निश्चित रूप से यह महिला अपनी जिंदगी को संवारना चाहती थी, लेकिन उससे एक बड़ा अपराध हो गया और वह अब जेल में ही जीवन काटने के लिए फिर विवश हो गई।

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

विकास पर होने लगी जंग

         फिलहाल तो मध्‍यप्रदेश में चुनावी मौसम आने में अभी छह माह का समय बाकी है, लेकिन राजनेता अभी से विकास के मुददे पर बयानों के जरिये जंग को आकार देने लगे हैं। अपने-अपने दावे और इरादों को जाहिर किया जा रहा है। मप्र की सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान केंद्र सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के आधार पर दावा कर रहे हैं कि मप्र विकास दर में कई राज्‍यों से अव्‍वल है। तब स्‍वाभाविक है कि दस साल तक मुख्‍यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह को विकास दर नागवार गुजरेगी। ऐसी स्थिति में वे भी शिवराज सिंह चौहान को चुनौती न दें यह कैसे हो सकता है। 10 अप्रैल को अपनी भोपाल यात्रा के दौरान जब पत्रकारों ने उन्‍हें मप्र की विकास दर पर सवाल दागा तो उन्‍होंने तत्‍काल मुख्‍यमंत्री को चुनौती भरे अंदाज में कहा कि मैं कभी भी, कहीं भी विकास के मुद्दे पर मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से बहस करने को तैयार हूं। उन्‍होंने तो यहां तक कहा कि उनके दस साल के कार्यकाल में विकास की जो बुनियाद रखी गई थी, उसकी का लाभ आज मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उठा रहे हैं। कुल मिलाकर मप्र में एक बार फिर विकास बनाम बहस शुरू हो गई है। यह शुभ संकेत राज्‍य के लिए बेहतर हैा यह सिलसिला 2002 में शुरू हुआ था, तब उमा भारती ने राज्‍य के विकास पर बहस छेड़ी थी। इस बहस को मुख्‍यमंत्री चौहान ने अंजाम दिया। अब वे भी लगातार एक ही बात कह रहे हैं कि भाजपा सरकार के राज्‍य में लगातार विकास के नये रास्‍ते खुले हैं। प्रदेश ने विकास में नये कदम बढाये हैं तब विपक्ष को तखलीफ क्‍यों हो रही है। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 10 अप्रैल को स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के 'ममता अभियान' का शुभारंभ करते हुए कहा कि उन्‍होंने प्रदेश में सड़के बनाई और उन्‍हें सुधार भी दिया, नागरिकों को 24 घंटे बिजली दे दी है अब उनकी प्राथमिकता शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य है। उन्‍होंने यह भी कहा कि जब मुख्‍यमंत्री बना था, तब प्राथमिकता कुछ और थी अब प्राथमिकताएं बदल गई हैं। निश्चित रूप से विकास की बयार तो बही है यह बात आम आदमी भी कहता है, लेकिन कांग्रेसियों को विकास दिख नहीं रहा है, तो बहस का एक नया मुद्दा उन्‍हें मिल गया है यह राज्‍य के लिए एक शुभ संकेत हैं और विकास पर बहस होना ही चाहिए, तो प्रदेश नये सौपान गढ़ेगा। 
                                 ''मप्र की जय हो''
                     

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

बेटी को जन्‍म देते ही ठुकराया परिवार ने

         भले ही मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बेटी बचाओ अभियान चला रहे हों, लेकिन राज्‍य में न सिर्फ बेटियां असुरक्षित हैं, बल्कि कदम-कदम पर मुसीबतों का सामना भी करना पड़ रहा है। हालात ऐसे हो गये हैं कि अब तो बेटी को जन्‍म देना भी मां के लिए गले की मुसीबत बन गया है। भोपाल में छोला मंदिर थाने के निकट रहने वाली नीता यादव ने 24 फरवरी, 2013 को जैसे ही बेटी को जन्‍म दिया, तो परिवार वालों का पारा आसमान पर पहुंच गया। तरह-तरह से परिवार के लोगों ने अपन बहु को प्रताडि़त करना शुरू किया, इस परिवार में नीता के पति अमित यादव, सास गीता यादव, देवर विनय यादव ने हर तरह से नीता को तंग किया। यहां तक कि घर से भी बाहर निकाल दिया है। नीता और अमित की शादी 28 फरवरी, 2012 को हुई है, लेकिन जैसे ही नीता ने बेटी को जन्‍म दिया, तो उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना मिलने लगी। इसके बाद तो जो सिलसिला शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब नीता यादव ने अपने पति और परिवार के खिलाफ खुलकर लड़ने का मोर्चा संभाल लिया है। हिम्‍मत करके नीता ने पति, सास और देवर के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा दी है। भोपाल के छोला मंदिर थाने में महिला की शिकायत पर धारा-498-ए, 34 और 3/4 के तहत मामला दर्ज हो गया है। फिलहाल पुलिस का कहना है कि तीनों आरोपी फरार हैं। नीता यादव दुखी मन से कहती है कि उसने बेटी को जन्‍म देते ही मुसीबतें गले लगा ली हैं। घर वालों को बेटी बिल्‍कुल पसंद नहीं है, उन्‍हें तो लड़का चाहिए था। इसके बाद ही परिवार के तेवर बदले और नीता यादव आज अपने पति से दूर रहकर दर-दर की ठोकर खाने को विवश है। 
             मध्‍यप्रदेश में ऐसी घटनाएं पहली नहीं है, कई परिवारों में आज भी बेटी को शुभ नहीं माना जा रहा है। अभी भी वे पुराने विचारों में जी रहे हैं और लगातार अपने घर में बेटी पैदा होने को उत्‍सव नहीं बल्कि अपशगुन मानते हैं। यूं तो मप्र की सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान पूरे प्रदेश में यह मुहिम चला रहे है कि अगर बेटी पैदा हो, तो जोर-शोर से खुशियां मनाई जाये, ताकि आस-पड़ोस और मोहल्‍ले में यह संदेश जाये कि लड़की पैदा होना यानि खुशियों का खजाना मिलना है। ऐसे आयोजन लगातार हो रहे हैं और उन्‍हें महत्‍व भी मिल रहा है, लेकिन वही दूसरी ओर बेटी पैदा होने पर बहु को घर से निकाला भी जा रहा है। अब यहां पर पुलिस की महती भूमिका शुरू होती है और अगर पुलिस चाहे तो पूरे परिवार को न सिर्फ जेल की हवा खिलाये, बल्कि उस महिला को न्‍याय भी दिलाये, जो कि बेटी की खातिर घर से दर-दर भटकने को विवश हुई है। तभी तो मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का बेटी बचाओ अभियान जमीनी हकीकत में सच होगा। 
                                          ''मप्र की जय हो''

भजन मंडली में मस्‍त है मप्र के पंचायत मंत्री भार्गव

         इन दिनों भाजपा नेताओं को अपने-अपने विधानसभा क्षेत्र की चिंता सताने लगी है। किसी न किसी बहाने मंत्रियों पर डोरे डालने की कलाएं विकसित की जा रही हैं। मंत्री और विधायक अपने-अपने क्षेत्र में मतदाताओं को आकर्षित कर रहे हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव हमेशा से अपने ग्रामीण लुक का अहसास राजधानी में भी कराते हैं, उन्‍हें अपने क्षेत्र के लोगों से बेहद प्रेम हैं। यही वजह है कि हर साल वे मेला, उत्‍सव अन्‍य सांस्‍कृतिक कार्यक्रम भी करते ही हैं। अब उन्‍होंने हरमोनियम बजाना भी सीख लिया है जिस पर क्षेत्र की जनता के साथ गीत और गाने में डूब रहे हैं। बुंदेलखंड में राई नृत्‍य खूब लोकप्रिय है। इस नृत्‍य को लेकर भार्गव एक बार भारी विवादों में आ चुके हैं, उन्‍हें कांग्रेस ने इस पर घेर भी लिया था। अब वे थोड़ा सतर्क होकर अपने सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों में डूबते हैं। इस बार उन्‍होंने चुनाव से पहले ही अपनी एक मंडली बना ली है, जो कि चुनाव प्रचार तो करेगी ही जहां मंत्री जी जरूरत होगी वहां वे स्‍वयं ग्रामीण गीतों के साथ संगत करने में देरी नहीं करेंगे, ऐसा उन्‍होंने अपने हाव-भाव से भी मानस बना लिया है। फिर भले ही उनके विभाग को आईएएस अफसर संभाले इससे उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता। यूं भी यह विभाग आईएएस अधिकारियों के हवाले ही है और विभाग की योजनाओं में जमकर भ्रष्‍टाचार हो रहा है। मनरेगा ने तो भ्रष्‍टाचार के सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये हैं पर मंत्री जी को इसकी कोई चिंता नहीं है। वे अपने क्षेत्र को ताकत देने में जुटे हुए हैं। 
                                        ''मप्र की जय हो''

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

कांग्र‍ेसियों को जीत के लिए चुनावी हवा चलने का इंतजार

         मिशन-2013 के विधानसभा चुनाव में फतह करने के लिए मात्र छह माह का समय रह गया है, लेकिन अभी भी कांग्रेसियों को लगता है कि कोई हवा चली तो वे डेढ़ सौ सीटे आसानी से जीत जायेंगे अन्‍यथा सरकार तो बना ही लेंगे। इन संकेतों से ऐसा लगता है कि कांग्रेसियों को अभी भी सत्‍ता की वापसी को लेकर संशय बना हुआ है। बार-बार वे जीत का दावा तो कर रहे हैं, लेकिन सीटों के गुणा-भाग में उनका मन डामा-डोल हो जाता है। इसके उलट भाजपा पूरी ताकत से यह कहने से कभी नहीं चूकती है कि वे तीसरी बार फिर से हैट्रिक बनाने जा रहे हैं। भाजपा के लिए तो यह चुनाव आर और पार की लड़ाई बन गया है। यही वजह है कि संगठन और सरकार पूरी ताकत से मैदान में उतर आया है। अब तो चुनाव मैदान से अभी तक दूर रहने वाली उमा भारती भी अब मैदान में उतर आई हैं। वे सात साल बाद पार्टी कार्यालय जाकर अपने मौजूदगी दर्ज कर चुकी हैं। यूं तो भाजपा को कदम-कदम पर संघर्ष का रास्‍ता दिख रहा है, लेकिन वे अपनी मं‍जिल पर पहुंचने के लिए आतुर भी हैं। उसके गुणा-भाग में जुट गये हैं, उम्‍मीदवारों के लिए सर्वे करवा रहे हैं, होर्डिंगों का सहारा लेकर प्रचार का रास्‍ता अपना लिया है, कहीं-कही प्रचार अभियान में सरकारी माध्‍यम का भी उपयोग किया जा रहा है। भाजपा में गुटबाजी अभी तक तो नहीं है, लेकिन भविष्‍य में होने के संकेत बार-बार मिल रहे हैं। यही भाजपा के लिए बेहतर आसार नहीं है, लेकिन इसके बाद भी भाजपा यह मानकर चल रही है कि वे चुनाव आते-आते सारी स्थितियों को सुधार लेगी। लगातार दस साल से विपक्ष में रह रही कांग्रेस पार्टी को भी अब सत्‍ता पाने की बेचैनी होने लगी है। कांग्रेस के नेता हुंकार भी भर रहे हैं। इस बार चुनावी जंग में चेहरे बदल गये हैं अब आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया के हाथों में संगठन की कमान है, तो विधायक दल की बागडोर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह संभाले हुए हैं। इन दोनों नेताओं को नेतृत्‍व दिग्विजय सिंह का है। फिलहाल तो दिग्विजय सिंह दिल्‍ली की राजनीति में सक्रिय है, लेकिन वे मध्‍यप्रदेश के हर पल घटित हो रही घटनाओं पर नजर रखे हुए हैं। किसी न किसी कार्यक्रम के जरिये कांग्रेस अपनी मौजूदगी दर्ज कर रही है। कांग्रेस ने परिवर्तन यात्रा शुरू कर दी है, इस यात्रा का एक दौर समाप्‍त होने के बाद भूरिया और सिंह ने 9 अप्रैल को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुए स्‍वीकार किया कि कांग्रेस को 135 से कम सीटें नहीं मिलेगी। यदि अंतिम दिनों में कोई हवा चली तो कांग्रेस 150 से ज्‍यादा सीटें जीतेगी। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का दावा है कि विंध्‍य में तो 30 सीटों में से 22 सीटें कांग्रेस जीतेंगी। उमा भारती ने अब फिलहाल तो अपनी मौजूदगी एक बयान से यह कहकर दिखा दी है कि अब वे कांग्रेस का पिंडदान करने आयेगी। इस पर कांग्रेस नेता भूरिया और सिंह ने तीखी नाराजगी जाहिर की है और पलटवार करते हुए यह तक कह दिया है कि उमा भारती कांग्रेस का पिंडदान नहीं, बल्कि शिवराज का पिंडदान करने आई हैं। उमा भारती जैसी नेत्री अपनी छवि का इस्‍तेमाल करके जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करती हैं, जबकि भाजपा नेताओं ने उनका पिंडदान करके मप्र से निर्वासित कर दिया था अब फिर उमा भारती अपने फिर वही तेवर दिखाना चाहती है, जो कि संभव नहीं है। उमा भारती का जादू मप्र में 2003 में खूब चला है, उन्‍हीं की अगुवाई में दो तिहाई बहुमत भाजपा को मिला था और कांग्रेस के दस साल की सत्‍ता को उखाड़ फेंका था। अब दस साल बाद तस्‍वीर बदल चुकी है। इस दौरान भाजपा में शिवराज सिंह चौहान का डंका बज रहा है और उमा भारती उनके पीछे खड़ी हैं। सामने सत्‍ता का सुख है जिससे वे वंचित रही हैं। वे कह भी चुकी है कि उन्‍होंने तो सत्‍ता लाने में अहम भूमिका अदा की और काजू-किशमिश कोई और खा रहा है। इस बयान से साफ जाहिर है कि उमा भारती अब 2003 की भूमिका में तो नहीं रहेगी। वैसे भी एक दशक के बाद प्रदेश की राजनीति में काफी पानी बह गया है और फिर से माहौल बनाना इतना आसान नहीं होगा। कुल मिलाकर भाजपा की राजनीति एक बार फिर करवट बदल रही है। इसमें उमा भारती कहां होगी, शिवराज की भूमिका बड़ी स्‍पष्‍ट है। वैसे तो उमा और शिवराज कह रहे हैं कि हम साथ-साथ चुनाव लड़ेगे। दूसरी ओर कांग्रेस में फिलहाल गुटबाजी कम नहीं हुई है, अब तो कांग्रेसी नेता यह भी दबी जुबान कहने लग हैं कि हमारे कई नेताओं की भाजपा से सांठगांठ हो गई है और वे भीतर ही भीतर भाजपा के नेताओं से मिले हुए हैं। यह बात भी कांग्रेस नेताओं के कहने से यह तो जाहिर हो गया है कि कहीं न कहीं मिली भगत का दौर चल रहा है। इसके बाद भी कांग्रेस नये सिरे से तैयारियों में जुटी हुई है। अब देखना यह है कि मिशन 2013 पर फतह कौन करता है। 
                                            ''मप्र की जय हो''

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

गुटबाजी के दल-दल में तो नहीं फंस जायेगी भाजपा की राजनीति


              गुटबाजी के रोग से अभी तक बची रही भाजपा अब एक बार फिर भंवरजाल में फंसती नजर आ रही है। यह आंकलन मीडिया का नहीं, बल्कि पार्टी के नेता भी इस तरह की कुशंका और शंका आपसी चर्चाओं में कर रहे हैं। यूं तो मध्‍यप्रदेश भाजपा में गुटबाजी का बीजारोपण 90 के दशक में हो गया था, तब पटवा और जोशी आमने-सामने आ गये थे। जोशी के साथ पूर्व मुख्‍यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा, रघुनंदन शर्मा, प्‍यारेलाल खंडेलवाल, नारायण प्रसाद गुप्‍ता एवं लक्ष्‍मीनारायण शर्मा सहित आदि दिग्‍गज हुआ करते थे, जबकि दूसरे गुट की अगुवाई पूर्व मुख्‍यमंत्री सुंदरलाल पटवा के हाथों में होती थी, उन्‍हें आर्शीवाद पार्टी के पितृपुरूष कुशाभाऊ ठाकरे का रहा है। यही वजह है कि पटवा लंबे समय तक पार्टी के एक क्षत्र नेता रहे हैं। उनके साथ कदमताल करने वाले नेताओं की लंबी फेहरिस्‍त रही है। यही वजह है कि पार्टी पर पटवा की तूती बोलती रही है। धीरे-धीरे पार्टी की तस्‍वीर बदली और गुटबाजी का रोग फैलता ही गया, लेकिन 2000 में फिर भाजपा ने एक साथ मिलकर कांग्रेस को उखाड़ने का संकल्‍प लिया और भाजपा नेता भी गुटबाजी को भूलकर आपस में एक हो गये थे। इसके बाद 2005 में फिर भाजपा में बंबडर आया और उमा भारती को पार्टी से अलग होना पड़ा, तब फिर गुटबाजी की गूंज सुनाई दी। इसके बाद वर्ष 2011 में उमा की फिर वापसी हो गई। इसके साथ उमा भारती ने अपने आपको मप्र की राजनीति से दूर रखा और हमेशा उत्‍तर प्रदेश की राजनीति में डूब गई। एक बार फिर वर्ष 2013 में भाजपा की राजनीति में उबाल आ गया है। इसकी वजह है उमा भारती को पार्टी का राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष बनाना है और दूसरी वजह पूर्व अध्‍यक्ष्‍ा प्रभात झा को भी उपाध्‍यक्ष बनाना है। इन दोनों नेताओं को वर्तमान में विरोधी गुट का माना जा रहा है। यह नेता बार-बार कह भी रहे हैं कि वे पूरी तरह से गुटविहीन है, लेकिन किसी को विश्‍वास नहीं हो रहा है। 8 अप्रैल को प्रदेश भाजपा कार्यालय में पार्टी के राष्‍ट्रीय पदाधिकारी बने नेताओं के स्‍वागत समारोह में भी सारे नेताओं ने एक स्‍वर से यह कहा कि हम शिवराज के नेतृत्‍व में हर हाल में सरकार बनायेंगे। इन मीठे-मीठे बयानों पर भाजपा के लोगों को विश्‍वास नहीं हो रहा है। उमा भारती सात साल बाद भाजपा कार्यालय पहुंची और प्रभात झा को जिस तरह से प्रदेश अध्‍यक्ष पद से दरकिनार करके अलग किया गया था, वे भी फिर पार्टी कार्यालय पहुंचे। इन दोनों नेताओं के बयानों और बॉडी लेग्‍वेज पर हर बड़े नेता की नजर थी। आशंका यह जाहिर की जा रही है कि उमा भारती अपनी कड़वी यादे आसानी से भुला नहीं पायेगी, क्‍योंकि उन्‍हें भाजपा की राजनीति में भुला ही दिया गया था, जबकि प्रभात झा के साथ जो पर्दे के पीछे प्रतिघात हुआ है उसका दर्द उन्‍हें आज भी है जिसे वे समय-समय पर बयां भी कर रहे हैं। आने वाले समय में प्रदेश भाजपा की राजनीति का ध्रुवीकरण हो जाये, तो किसी को आश्‍चर्य नहीं करना चाहिए, क्‍योंकि जो हालात नजर आ रहे हैं, वे निश्चित रूप से चिंतनीय तो हैं ही साथ ही साथ भविष्‍य की राजनीति के संकेत भी बयां कर रहे हैं। मध्‍यप्रदेश की भाजपा का मिशन 2013 है और ऐसी स्थिति में गुटीय राजनीति अगर अपना रूप दिखायेगी,तो फिर मिशन में निश्चित रूप से कोई न कोई बाधाएं तो आयेगी ही। इस पर पार्टी और सरकार की नजर तो है, लेकिन राजनीति में कब क्‍या नया हो जाये, कोई कुछ नहीं कह सकता। यही वजह है कि एक बार फिर से मप्र की राजनीति करवट ले रही है, जो कि जल्‍दी ही सामने आयेगी। 
स्‍वागत में नेताओं ने कहा - 
  • 2003 में कांग्रेस का संहार हुआ, 2008 में अंतिम संस्‍कार और 2013 में पिंडदान हो जायेगा। साढ़े सात साल बाद भाजपा कार्यालय के भवन से दूर रही, लेकिन जो भावना ठाकरे जी और राजमाता ने सिखाई उससे कभी अलग नहीं हो पाई। मुख्‍यमंत्री की कुर्सी किसी आरोप में नहीं, बल्कि तिरंगे की शान में छोड़ी थी तिरंगे की शान, गाय की जान, नारी की आन, गंगा के मान के लिए शीश भी कटा सकती हूं। - उमा भारती, राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष भाजपा। 
  • मैं मध्‍यप्रदेश छोड़ने वाला नहीं हूं, भले ही अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की जिम्‍मेदारी दे दो। शिवराज निर्विवाद और सर्वमान्‍य नेता है, उन्‍हीं ने तोमर को ढाई साल के लिए केंद्र में भेज दिया था। उमा भारती का मप्र पर सर्वाधिक हक है। - प्रभात झा, राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष भाजपा। 
  • हमें गर्व है कि पार्टी नेतृत्‍व ने मप्र को महत्‍वपूर्ण पद दिये हैं इन नेताओं के मार्गदर्शन और नेतृत्‍व में मिशन 2013 फतह करेंगे। - शिवराज सिंह चौहान, मुख्‍यमंत्री मप्र। 
                                  ''मप्र की जय हो''    
                                 

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

सर्वे बना गले की फांस, भाजपा विधायक जुटे गुणा-भाग में

यूं तो विधानसभा चुनाव में अभी छह महीने का समय बाकी है पर भाजपा चुनावी गुणा-भाग में जुट गई है। एजेंसियों से विधायकों की जमीनी हकीकत पता कराने के लिए सर्वे कराये गये हैं। यह सर्वे भाजपा के लिए गले की फांस बन गये हैं, क्‍योंकि कई विधायकों की रिपोर्ट निगेटिव रही है। इसके चलते विधायकों को अपनी-अपनी स्थितियां सुधारने के फरमान दे दिये गये हैं। इससे विधायक विचलित हैं उन्‍हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे अगले चुनाव में अपनी नैया कैसे पार लगायेंगे। मीडिया लगातार ये संकेत दे रहा है कि इस बार भाजपा गुजरात की तर्ज पर मध्‍यप्रदेश में भी करीब अस्‍सी से सौ विधायकों के टिकट बदलेगी। यह सुनने में तो अच्‍छा लगता है, लेकिन जब इसको जमीन पर उतारा जायेगा, तो फिर बगावत के स्‍वर भी गूंजेंगे। इससे भाजपा विचलित होगी। इसलिए पहले से ही सारी स्थितियों का आंकलन किया जा रहा है। यह देखा जा रहा है कि अगर विधायक क टिकट काटने के बाद क्षेत्र में क्‍या स्थिति बनेगी और स्‍वयं विधायक भीतरघात किस स्‍तर तक कर सकते हैं। साथ ही कार्यकर्ताओं की क्‍या स्थिति रहेगी। इन सारे पहलुओं पर विचार करने के लिए मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा विधायकों को 3-4 अप्रैल को भोपाल में मुख्‍यमंत्री निवास पर बुलाया था। इस बैठक में उन्‍होंने विधायकों से वन-टू-वन चर्चा करके सर्वे रिपोर्ट की हकीकत बयां कर दी है। दिलचस्‍प यह है कि इस रिपोर्ट में विधायकों की पूरी कुंडली तैयार करके मुख्‍यमंत्री को सौंपी गई है। जब मुख्‍यमंत्री विधायकों से बात कर रहे थे, तब टेबिल पर सर्वे रिपोर्ट भी मौजूद थी। इस रिपोर्ट के आधार पर ही विधायकों से सवाल जवाब किये गये। अमूमन अधिकांश विधायकों को मुख्‍यमंत्री ने ताकीद कर दिया है कि वे तीन महीने में अपनी स्थिति सुधार लें अन्‍यथा उन्‍हें अगले चुनाव में मैदान में उतारना मुश्किल हो जायेगा। यही वजह है कि भाजपा विधायक भी क्षेत्रों में नये सिरे से लामबंद हो गये हैं और वे किसी न किसी तरह से अपनी टिकट भी बचाने के लिए मैदान में उतर आये हैं।
फिर राजनीति ने करवट ली : 
      मध्‍यप्रदेश की भाजपा राजनीति मार्च के अंतिम सप्‍ताह में एक बार फिर बदली-बदली नजर आ रही है। अब दो असंतुष्‍ट नेताओं को पार्टी नेत़ृत्‍व की बड़ी जिम्‍मेदारी सौंपी है। यह दोनों नेता मुख्‍यमंत्री से खफा हैं। यही वजह है कि इनकी नियुक्ति के बाद भाजपा की राजनीति में भूचाल सा आ गया है। हर तरफ हाल ही में उपाध्‍यक्ष बनी उमा भारती और प्रभात झा की चर्चाएं हो रही हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि उमा और झा पर्दे के पीछे एक हो गये हैं, जबकि यह संभव नहीं है। उमा भारती और झा की नियुक्ति के बाद अखबारों में जो विज्ञापन छप रहे हैं, वे भी भविष्‍य की राजनीति के संकेत दे रहे हैं, क्‍योंकि इन विज्ञापनों में मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेशाध्‍यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर गायब हैं। इसके साथ ही राजधानी में स्‍थान-स्‍थान पर होर्डिंगों की भरमार हो गई है। इनमें भी चौहान और तोमर नदारद हैं। कहीं-कहीं इन्‍हें भी महत्‍व मिला है। इससे साफ जाहिर है कि भविष्‍य में भाजपा की राजनीति में बेहद हलचल होनी है। दोनों नेता अपने-अपने समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए लांबिग करेंगे,तो फिर चौहान और तोमर से टकराव होना स्‍वाभाविक हैं। इसके साथ ही पूर्व केंद्रीय मंत्री विक्रम वर्मा भी धीरे-धीरे चौहान के खिलाफ मुखर होने लगे हैं। कुलमिलाकर भाजपा की राजनीति के बदले तेवर से न सिर्फ कार्यकर्ता अचंभित हैं, बल्कि उन्‍हें अहसास है कि चुनाव से पहले प्रदेश में काफी कुछ बदलेगा। इसका इंतजार हर कार्यकर्ता कर रहा है और उन्‍हें मालूम है कि इस बार तीसरी बार फतह करना इतना आसान नहीं है, जबकि मुख्‍यमंत्री और प्रदेशाध्‍यक्ष इस मुहिम को अंजाम देने के लिए जुट गये हैं। मगर उनकी राह में बाधाये भी कम नहीं है। ऐसी स्थिति में भाजपा की राजनीति नये-नये गुल खिलायेगी। 
                                  ''मप्र की जय''  

रविवार, 7 अप्रैल 2013

भाजपा में अनुशासन तार-तार

       भाजपा की पहचान अनुशासन की रही है। अब तस्‍वीर बदल चुकी है। अनुशासन पार्टी और संगठन में तार-तार हो रहा है। अब वरिष्‍ठ और कनिष्‍ठ का कोई संबंध नहीं रहा है। वरिष्‍ठ नेताओं को भी छोटे-छोटे कार्यकर्ता सबके सामने खरी-खोटी सुनाने लगे हैं। इससे संगठन का तानाबाना बुरी तरह से बिखर रहा है। दुखद पहलू यह है कि अदने से कार्यकर्ता भी पार्टी नेताओं को आंखे दिखाने लगे हैं, जो कि वैचारिक अभियान को आधार मानकर काम कर रही पार्टी के लिए शुभ नहीं है। पार्टी के स्‍थापना दिवस 6 अप्रैल, 2013 को पूरे प्रदेश के विकास कार्यक्रम आयोजित किये थे, इस कार्यक्रम के जरिये हर जिले में शिलान्‍यास कार्यक्रम और भूमिपूजन आयोजित किये गये थे। इन्‍हीं कार्यक्रमों की श्रृंखला में विकास और निर्माण कार्यों का नया इतिहास भी दर्ज किया गया। पूरे प्रदेश में सभी संभागों में 1023 करोड़ 40 लाख 1 हजार रूपये के निर्माण एवं विकास कार्यों का शिलान्‍यास और लोकार्पण भी किया गया। जहां पार्टी ने नया इतिहास दर्ज कियावही तार-तार अनुशासन का इतिहास भी बना लिया। उस समय गुना में स्थिति मंच पर ही विषम बन गई जब पार्टी के संस्‍कार बुरी तरह से पानी में बह गये। जब गुना जिले के महामंत्री ने अपनी ही पार्टी के पूर्व मंत्री गोपीलाल जाटव को मंच पर ही चाटा जड़ दिया। इससे अफरा-तफरी की स्थिति बन गई। यह महाशय गुना जिले में पार्टी के मंत्री बहादुर सिंह रघुवंशी हैं। जिन्‍होंने मंच पर सारे संस्‍कार एक पल में ही खत्‍म कर दिय हैं, फिर भले ही पार्टी के जिलाध्‍यक्ष हरि सिंह यादव ने संगठन मंत्री को निलंबित कर दिया है, लेकिन अनुशासन का दंभ भरने वाली पार्टी के संस्‍कार तो जनता के सामने आ ही गये। इससे पहले भी एक जिलाध्‍यक्ष महोदय महिला के साथ रंग-रलियां मानने की सीडी बाजार में आ चुकी है। सरकारी कर्मचारियों के साथ अभद्र व्‍यवहार और मारपीट करने की घटनाएं तो पार्टी नेताओं के लिए सामान्‍य सी बात हो गई है, लेकिन अब पार्टी के कार्यकर्ता और नेता अपने ही वरिष्‍ठों के साथ मारपीट करने लगे हैं। इस घटना के पीछे का कारण यह बताया जाता है कि पूर्व मंत्री जाटव एक बार फिर से गुना से ही चुनाव मैदान में उतरना चाहते हैं। इसलिए विवाद सामने आया है। दिलचस्‍प यह है कि जब जिला मंत्री बहादुर सिंह रघुवंशी भाषण देने जाने लगे, तो पूर्व मंत्री जाटव ने उन्‍हें वहां जाने से रोका इस पर रघुवंशी को गुस्‍सा आ गया और उन्‍होंने जाटव को तीन चाटे जड़ दिये, तब मंच पर संनाटा छा गया। अनुशासन को तोड़ने वाले रघुवंशी का कहना है कि वे पार्टी का काम करते हैं और भीड़ जुटाने से लेकर दरी बिछाने में लगे रहते हैं और नेता जब भाषण देने का मौका आता है, तो पीछे करते हैं, तब स्‍वाभाविक रूप से गुस्‍सा आना स्‍वाभाविक है। इस घटना से साबित हो गया कि भाजपा में किस कदर हालात पटरी से उतर चुके हैं। कहीं कोई सम्‍मान और विश्‍वास बचा नहीं है। अब एक दूसरे के खिलाफ जंग स्‍वयं कर रहे हैं जिसका असर चुनाव पर भी रहेगा। यह असंतोष पार्टी नेताओं के लिए गहरे संकेत दे रहा है अभी भी नेताओं को जल्‍दी से सारी स्थितियों का आंकलन करना चाहिए, अन्‍यथा विषम स्थितियां बन सकती हैं। 
अनुशासन के गीत गाती है भाजपा : 
            भाजपा उन बिरले संगठनों में मानी जाती है, जहां पर अनुशासन को बड़ा महत्‍व दिया जाता है,  लेकिन अब इसी संगठन में अनुशासन नेता और कार्यकर्ता तार-तार करने में लगे हैं। 90 के दशक में पूर्व मुख्‍यमंत्री कैलाश जोशी, सुंदरलाल पटवा और वीरेंद्र कुमार सकलेचा के बीच तनातनी बनी रहती थी। वैचारिक मतभेद होते थे, लेकिन कभी भी लड़ाई झगड़े की नौबत नहीं आई। यह नेता आपस में एक-दूसरे के खिलाफ खूब तीर चलाया करते थे, यहां तक कि शिकवा-शिकायतें भी होती थी। पूर्व मुख्‍यमंत्री कैलाश जोशी ने तो हाल ही में अपने साक्षात्‍कार में स्‍वीकार किया है कि उनके पटवा से कुछ वैचारिक मतभेद रहे हैं जिसके कारण दूरिया बढ़ी हैं। 1990 से 2000 के बीच कई बार नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद रहे, लेकिन उन्‍होंने कभी भी किसी के खिलाफ इस तरह से व्‍यवहार नहीं किया, जो कि अब 6 अप्रैल, 2013 को गुना में घट गया। इससे पार्टी की जमीनी हकीकत सामने आ गई है और भविष्‍य के संकेत दिखने लगे हैं। 
                                      ''मप्र की जय हो''  

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

शून्‍य से शिखर तक के सफर में दौड़ती-हांफती मप्र भाजपा

  वाकई में तीन दशक से अधिक के सफर में भाजपा ने मप्र में अपनी जड़े न सिर्फ मजबूत कर ली है, बल्कि शाखाएं इस कदर ताकतवर हो गई हैं कि उन्‍हें अब कोई आसानी से हिला-डुला नहीं सकेंगा। भाजपा के इस फैलाव में पार्टी के दिग्‍गज नेताओं का त्‍याग और बलिदान तो है ही साथ ही साथ उन हजारों कार्यकर्ताओं की भागीदारी है जिन्‍होंने तन, मन, धन से डूबकर पार्टी को ताकत दी है। यही वजह है कि 80 के दशक में अपना सफर शुरू करने वाली भाजपा ने अपने शुरूआती दौर में धीरे-धीरे पार्टी को गति दी। कभी भाजपा तेज दौड़ती नजर आई, तो कभी हांफते-हांफते दम फूंलने लगा। फिर थोड़े समय रूकी और फिर अपनी गति से चल पड़ी। इस अभियान को अंजाम देने में सबसे अ‍हम भूमिका अदा करने वाले नेताओं में कुशाभाऊ ठाकरे, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, प्‍यारेलाल खंडेलवाल, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, वीरेंद्र कुमार सकलेचा, नारायण प्रसाद गुप्‍ता सहित आदि शामिल हैं। त्‍यागी और तपस्‍वी ठाकरे ने तो अपने जीवन का अमूल्‍य समय पार्टी को देकर न सिर्फ मध्‍यप्रदेश में कई चेहरों को मुख्‍यधारा के मैदान में उतारा और उन्‍हें पार्टी नेतृत्‍व भी सौंपा। ठाकरे जी ने हमेशा उन नेताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश की जो कि किसी न किसी माध्‍यम से जनता पर अपनी छाप छोड सके। ऐसा नहीं है कि 80 से 2013 के कालखंड में भाजपा कमजोर न हुई हो और बिखरी न हो, लेकिन फिर भी पार्टी नेताओं ने गुटबाजी और मतभेद जब भी उभरे तो उन्‍हें आपस में बैठकर ही दूर किया। संघर्ष, जुझारूपन और लगातार सड़कों की लड़ाई लड़ने का जज्‍वा लेकर भाजपा ने पहली बार 1990 में अपनी स्‍पष्‍ट बहुमत की सरकार प्रदेश में बनाई। यह सरकार ढाई साल का ही सफर तय कर पाई और उसके बाद राष्‍ट्रपति शासन लग गया।
 फिर भाजपा को 1998 से 2002 तक संघर्ष का रास्‍ता अपनाना पड़ा और उसके बाद हिन्‍दू ब्रांड नेता उमा भारती के नेतृत्‍व में 2003 में फिर भाजपा की सरकार बनी। फिर तो दूसरी बार 2008 में भी भाजपा ने अपना झंडा गाड़ा और अब तीसरी बार 2013 में भाजपा एक बार फिर तीसरी बार सत्‍ता पर काबिज होने के लिए पूरी तरह से जोर-आजमाईश करने में लगी हुई है। अब नेतृत्‍व मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों में है, जो कि अपनी छवि के सहारे प्रदेश में फिर से सरकार बनाने के लिए न सिर्फ बेताब है, बल्कि उसके लिए सक्रिय भी हैं। सरकार बनेगी अथवा नहीं यह तो वक्‍त ही बतायेगा, लेकिन फिर भी भाजपा ने अपने मिशन को गति तो दी है, जो कि मीडिया से लेकर सड़कों तक देखाई दे रही है। भाजपा में निश्चित रूप से अच्‍छाई होने के साथ-साथ सत्‍ता आने के बाद वे गुण भी आ गये हैं, जो सत्‍ता के साथ स्‍वाभाविक रूप से आ जाते हैं। इसके चलते नेताओं पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लग रहे हैं, सरकारी साधनों के दुरूपयोग की कहानियां सामने आ रही हैं, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा खुलकर हो रही है, सिंद्वांतों को दरकिनार किया जा रहा है जिस लक्ष्‍य को लेकर भाजपा जनता के बीच पहुंची थी उसमें कहीं न कहीं भटकाव भी साफ तौर पर नजर आता है। इस भंवरजाल से भी भाजपा बाहर निकलने के लिए भीतर ही भीतर बेचैन हैं। अब कैसे निकलेगी यह तो वक्‍त ही बतायेगा, लेकिन भाजपा मिशन 2013 को फतह करने के लिए कमर कस चुकी है। निश्चित रूप से भाजपा के सामने कई चुनौतिया है, लेकिन फिर भी वह अपने लक्ष्‍य को लेकर एक कदम बढ़ चुकी है। 
                                            ''मप्र की जय हो''

बेकाबू हो गया खनिज माफिया मध्‍यप्रदेश में

         ऐसा लगता है कि खनिज माफिया को किसी की परवाह नहीं है। उसकी अपनी सत्‍ता है और उसके अपने अधिकार हैं। इस राह में जो भी मुसीबत खड़ा कर रहा है उसे आंखे दिखाई जा रही है। इसके चलते खनिज माफिया बेकाबू हो गया है। जिस अधिकारी ने भी खजिन माफिया पर लगाम कसने की कोशिश की, तो फिर तरह-तरह से माफिया के लोग उसे प्रताडि़त करने का सिलसिला शुरू करते हैं। यही वजह है कि खनिज माफिया के हौसले इस कदर बढ़ गये हैं कि वे पुलिसकर्मियों, वनकर्मियों और खनिज कर्मियों की तो कोई परवाह करते ही नहीं है। इन विभागों के अफसरों को भी ठेंगे पर रखते हैं, क्‍योंकि माफिया द्वारा एक आईपीएस अफसर को मारा जा चुका है। इसके साथ ही समय-समय पर डिप्‍टी कलेक्‍टर, डिप्‍टी रेंजर, तहसीलदार के साथ भी मारपीट, झूमा-झपटी की घटनाएं आम बात होती जा रही है। रतलाम के एक खनिज इंसपेक्‍टर संजय  भार्गव की संदिग्‍ध अवस्‍था में मौत हो चुकी है। इस खनिज अधिकारी की मौत को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं। मालवांचल बेहद उत्‍तेजित है। कांग्रेसी कैंडलमार्च निकाल रहे हैं, मीडिया हल्‍ला मचा रहा है, संजय भार्गव के परिवार के लोग भी संदेह कर रहे हैं कि खनिज माफिया ने उनके भाई की हत्‍या कर दी है। इस मामले में दिलचस्‍प यह है कि उज्‍जैन में भार्गव को टक्‍कर मारने वाली टाटा मैजिक गाड़ी से मौत हुई है। इस घटनाक्रम को लेकर पुलिस शुरूआत में तो गंभीर नहीं थी, लेकिन जब धीरे-धीरे मामला तूल पकड़ने लगा, तो फिर पुलिस को सक्रियता दिखानी पड़ी। मप्र में खनिज माफिया रेत और अवैध उत्‍खनन का कारोबार कर रहा है। रेत और पत्‍थर के अवैध उत्‍खनन में एक बड़ा माफिया शामिल हैं जिसे कहीं-कहीं प्रशासन का भी संरक्षण है, लेकिन जब कभी कोई विरोध करता है, तो फिर उसे डराने, धमकाने का सिलसिला शुरू होता है। अधिकारियों पर वाहन चढ़ाने की कई घटनाएं हो चुकी है। कई बार विपक्ष इस मामले में सरकार से सवाल-जवाब भी कर चुका है। अब 5 अप्रैल को इंदौर जिले के महू में वनकर्मियों पर ट्रेक्‍टर चढ़ाने का प्रयास किया गया है। यह वनकर्मी रमेश पाल सिंह, बाबूलाल अजमेरा जब बड़गोदा इलाके में जंगल से अवैध पत्‍थर खनन रोकने पहुंचे तो माफिया ने इन पर्रेक्‍टर चढ़ाने का प्रयास किया। अंधेरा का फायदा उठाकर माफिया के लोग तो भाग गये। अब वनकर्मियों ने थाने में शिकायत की है
अब क्‍या कार्यवाही होगी भविष्‍य ही बतायेगा। मप्र में खनिज माफिया तेजी से पांव पसार रहा है और प्रकृति का संतुलन बिगाड़ने में कोई कौर-कसर नहीं छोड़ रहा है। यही वजह है कि राज्‍य का पर्यावरण प्रदूषित होने से कोई नहीं रोक पायेगा। नदियां और जंगल का संकट में आना लगभग तय है। 
                                       ''मप्र की जय हो'' 

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

राहुल और मोदी समर्थकों की बढ़ने लगी है मध्‍यप्रदेश में फौज

        भले ही कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी और गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी देश की राजनीति की दिशा और दशा बदलने के लिए अपने-अपने स्‍तर पर जोर-आजमाईश कर रहे हैं, लेकिन इन जन नेताओं  के समर्थकों की फौज मध्‍यप्रदेश में तेजी से पल्लवित हो रही है, इनके समर्थकों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। राहुल गांधी ने मध्‍यप्रदेश में युवा और छात्र कांग्रेस के चुनाव कराकर यहां पर अपने समर्थकों को तैयार करने के लिए 2011 से अभियान छेड़ दिया था। इसके साथ ही वह लगातार विश्‍वविद्यालयों के कार्यक्रमों में शिरकत करके युवाओं को अपने साथ जोड़नें की मुहिम चलाते रहे हैं। वही दूसरी ओर नरेंद्र मोदी कभी मध्‍यप्रदेश के संगठन प्रभारी रहे हैं, लेकिन उनका यह कालखंड सीमित समय का था जिसका खासा असर नहीं रहा, क्‍योंकि तब मोदी उतने लोकप्रिय नहीं थे, जितने की आज हैं। अब तो मोदी के समर्थकों की संख्‍या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। राष्‍ट्रीय राजनीति में मोदी के कदमों से कांग्रेस तो भयभीत है ही पर भाजपा की राजनीति में ज्‍यादा उथल-पुथल मची हुई हैं। अभी तक भाजपा के जो नेता मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को राष्‍ट्रीय फलक पर उभरते देख रहे थे अचानक एक निर्णय ने मोदी को चौहान से आगे कर दिया। पार्टी ने अपने संसदीय बोर्ड में मोदी को सदस्‍य क्‍या बनाया। प्रदेश की राजनीति में उबाल ही आ गया। शिवराज सरकार के कैबिनेट मंत्री बाबूलाल गौर मोदी के पक्ष में सबसे पहले बयान देकर मैदान में उतरे। उन्‍होंने यहां तक कहा कि मोदी के नेतृत्‍व में तीन बार गुजरात में भाजपा की सरकार बनी है, जबकि शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्‍व में एक बार ही सरकार बन पाई है। इसी के साथ ही
पूर्व केंद्रीय मंत्री विक्रम वर्मा ने भी माना कि मुख्‍यमंत्री चौहान गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले कम लो‍कप्रिय हैं। मोदी देश में जनमानस के नेता है, जबकि शिवराज कभी केंद्रीय राजनीति में नहीं रहे हैं। इन बयानों से साफ जाहिर है कि मप्र की राजनीति अचानक करवट ले रही है और अब यहां के नेता मोदी को चाहने लगे हैं। संकेत तो यह भी मिल रहे हैं कि मोदी से अपनी निकटता भी तेजी से बढ़ा रहे हैं। कई मंत्री और संगठन के नेता लगातार मोदी से संवाद कायम किये हुए हैं। यहां तक कि अहमदाबाद जाकर मोदी से मुलाकात भी कर रहे हैं। इससे साफ जाहिर है कि अब मोदी से किसी न किसी बहाने अपनी निकटता बढ़ा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर राहुल गांधी के संपर्क में कई नेता है, विशेषकर युवा पीढ़ी तो उनसे काफी तादाद में जुड़ रही है। राजनीति में विश्‍वास करने वाले युवा वर्ग भी राहुल गांधी को अपना आईकॉन मानते हैं। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, सुरेश पचौरी, मीनाक्षी नटराजन, अजय सिंह सहित आदि ने राहुल गांधी के सीधे संपर्क हैं, जो कि मप्र की राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। कुल मिलाकर मप्र में इन दिनों फिर से राहुल और मोदी का जलवा तेजी से चल रहा है। 
                               '' मप्र की जय हो''

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

टिकट कटेगा या मिलेगा संशय में भाजपा विधायक

       इन दिनों मध्‍यप्रदेश के भाजपा विधायक पशोपेश में पड़ गये हैं, उन्‍हें समझ में नहीं आ रहा है कि पार्टी उन्‍हें फिर से टिकट देगी या फिर घर बैठा देगी। इस डामा-डोल की स्थिति में विधायक भी अपने-अपने गुणा-भाग में लगे हुए हैं। बार-बार विधायकों को रिपोर्टो के जरिये चेताया जा रहा है कि क्षेत्र में उनका परफार्मेन्‍स बे‍हतर नहीं है। इसके साथ ही मीडिया रिपोर्ट भी समय-समय पर सार्वजनिक हो रही है कि मिशन 2013 को फतह करने के लिए भाजपा इस बार 80 से 100 विधायकों के टिकट काट सकती है। इसके चलते विधायकों के बीच लगातार संदेह की रेखा का जाल फैलता जा रहा है। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी 3 अप्रैल को विधायकों से वन टू वन चर्चा करने का दौर शुरू किया। उनसे न सिर्फ क्षेत्र की समस्‍याएं पूछी बल्कि अब तक किये गये कार्यों की रिपोर्ट भी मांगी। इसके साथ ही वे तीन काम भी पूछे जो चुनाव से पहले करा सकते हैं और उसका लाभ पार्टी को चुनाव में मिल सकता है। इस बातचीत में मुख्‍यमंत्री ने विधायकों से कांग्रेस और बसपा की मौजूदगी का आंकलन भी जाना। इस माथा पच्‍ची से साफ जाहिर है कि मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधायकों से फीडबैक लेकर नये सिरे से तैयारियां कर रहे हैं। अलग-अलग संकेत मिल रहे हैं कि 25 से 40 फीसदी टिकट विधायकों के कट सकते हैं। इसका असर यह भी हो रहा है कि कई विधायकों ने अब फिर से चुनाव नहीं लड़ने का इरादा भी बना लिया है और वे अपने पुराने व्‍यवसाय में लौटने की जुगत में जुट गये हैं। सबसे दिलचस्‍प पहलू यह है कि जब विधायकों की रिपोर्ट कार्ड पर चर्चा हो रही है तब प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ हुआ है। इसकी वजह है उमा भारती और प्रभात झा का राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष बनना। यह दोनों नेता भाजपा की राजनीति में एक बार फिर संतुलन की राजनीति में तूफान लाने के संकेत भी दे रहे हैं। असंतुष्‍ट और विरोधी तबका इन नेताओं के दरबार में दस्‍तक देने लगा है। तब ऐसी स्थिति में प्रदेश नेतृत्‍व कैसे 80 से 100 विधायकों की टिकट कैसे काटेगा यह समझ से परे हैं। भाजपा नेतृत्‍व को भी यह आभास होने लगा है कि इस बार चुनाव के दौरान विद्रोही तेवर खूब सामने आयेंगे। उनसे निपटने के रास्‍ते अभी से तलाशे जा रहे हैं। कुल मिलाकर मप्र की राजनीति में भूचाल तो आ चुका है अब इसका कौन कितना लाभ लेगा यह तो वक्‍त ही बतायेगा। 
                                        ''मप्र की जय हो''