गुरुवार, 7 जून 2012

आईपीएस अफसर नरेंद्र कुमार की हत्‍या पर से उठा पर्दा

''क्‍या दिन थे हमारे''
             मध्‍यप्रदेश में पहली बार किसी आईपीएस की हत्‍या ने हर व्‍यक्ति को चौंका दिया है। मुरैना में अवैध रूप से गिट्टी, पत्‍थर भरकर ले जा रही ट्रेक्‍टर ट्रॉली को रोकने के कारण मौत हो गई थी। सीबीआई ने 90 दिन में इस पूरे मामले को हत्‍या नहीं, बल्कि एक हादसा करार दिया है। 08 मार्च, 2012 को होली के दिन खेले गये इस खून की होली के छींटे खनन माफिया पर नहीं पड़े हैं, बल्कि एक दुर्घटना सीबीआई ने माना है। नरेंद्र कुमार की हत्‍या के बाद विपक्ष ने इस पूरे मामले को खनन माफिया से जोड़‍ दिया था। भाजपा सरकार कटघरे में फंस गई थी।
''आईपीएस नरेंद्र कुमार अपनी पत्‍नी मधुरानी के साथ''

''पिकनिक का भी भरपूर आनंद लिया''
मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आनन-फानन में सीबीआई जांच के आदेश दिए। सीबीआई ने भी तीन महीने की जांच में खुलासा कर दिया कि नरेंद्र कुमार की मौत एक हादसा है। नरेंद्र कुमार की पत्‍नी मधुरानी जो कि स्‍वयं आईएएस है एवं पिता केशव देव को भी आशंका थी कि नरेंद्र कुमार की खनन माफिया ने हत्‍या की है। सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ट्रेक्‍टर-ट्रॉली को रोकने के लिए नरेंद्र उस पर चढ़ गये, तभी ड्राईवर ने उन्‍हें धक्‍का दिया, ड्राईवर पर शासकीय कार्य में बाधा और मोटर व्‍हीकल एक्‍ट का चार्ज भी लगाया गया। इस पूरे मामले की जांच से यह खुलासा हो गया है कि मुरैना में खनन माफिया तो है, लेकिन उसने किसी आईपीएस की हत्‍या नहीं की है। अब भाजपा हल्‍ला मचा रही है कि कांग्रेस को प्रदेश की जनता से मांफी मांगना चाहिए। इस मामले को लेकर कांग्रेस ने मप्र बंद कराया था और जमकर विधानसभा में भी हल्‍ला मचाया था। इस घटना से एक बात तो साफ जाहिर हो गई है कि राजनीति जिस तरह से घटनाओं पर होती है उसके कई बार अर्थ दूसरे निकलते हैं, तब तक समय काफी गुजर चुका होता है। 

 

खुशी बरसी आसमान से, मौसम हुआ सुहाना

''बादलों की बिखरी छटा ने दिखाया अपना नया रूप''
         गर्मी की तपन और उमस ने लोगों को कदम-कदम पर तकलीफ दी पर अचानक मौसम ने 06 जून को करवट ली और आसमान से खुशियों की झमाझम बारिश हुई। बादलों का नजारा ही निराला था। मौसम के इस प्रिय मानसून ने कई कायसों पर से पर्दे उठा दिए हैं। यूं तो प्रदेश के कई हिस्‍सों में सुबह से ही बादल छा गये थे, यही स्थिति गुरूवार को भी बनी हुई है। मौसम के बदले मिजाज ने लोगों को राहत दी है और पसीने से छुटकारा दिलाया है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि प्रिय मानसून की गतिविधियां शुरू हो गई है। 
''वाह क्‍या आनंद आ रहा है पहली बारिश में''
आने वाले दिनों में आंधी-तूफान का दौर शुरू होगा। बादलों की आमद हो गई है, ठंडी-ठंडी हवाएं चल रही है, लोग राहत महसूस कर रहे हैं। हल्‍की बारिश ने मौसम में एक अलग ही फिजा घोल दी है। मप्र मौसम केंद्र के निदेशक डॉ0 डी0पी0 दुबे का मानना है कि अरब सागर में बेदर सिस्‍टम बना होने से वहां से प्रदेश में काफी मात्रा में नमी आ रही है। यही कारण है कि मौसम का मिजाज अचानक बदला है। इस बदले मौसम ने आम आदमी को महीने बाद राहत दी है। लोग झील किनारे भी बदले मौसम का नजारा देखने के लिए दौड़ पड़े थे। अब वैसे भी मौसम की इस अदला-बदली से समाज का हर वर्ग प्रभावित होता है। किसानों के लिए तो बारिश सोना-चांदी लेकर उनके घरों में प्रवेश करती है। मप्र में मौसम की आंख-मिचौली लंबे समय से देखी जा रही है जिसका असर यहां के कारोबार और किसानों की जिंदगी पर नजर आता है, फिलहाल मौसम की बदली फिजा ने सब कुछ बदल डाला है।

''आंधी और अंधड़ के यह रूप कभी भी नजर आयेंगे''

बुधवार, 6 जून 2012

धार्मिक कट्टरता ने फैलाये मप्र में पैर

      जब तब राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की गतिविधियों को लेकर कांग्रेस धार्मिक कट्टरता का आरोप लगाने में देरी नहीं करती है, क्‍योंकि पिछले आठ सालों में मप्र में धार्मिक कट्टरता बढ़ी है जिसके चलते कदम-कदम पर प्रमाण भी सामने आये हैं। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह लंबे समय से आशंका जाहिर कर रहे हैं कि भाजपा सरकार के संरक्षण के चलते राज्‍य में धार्मिक कट्टरता का जाल फैलता जा रहा है। वह तो हिन्‍दू और मुस्लिम दोनों प्रकार की कट्टरता की ओर संकेत करते रहे हैं। यूं भी भाजपा सरकार में मुस्लिम कट्टरता फैलाने का काम कर रहे सिमी संगठन का जाल ध्‍वस्‍त किया है, जबकि संघ के नाम पर कुछ संगठन समय-समय पर धार्मिक कट्टरता फैलाने में देरी नहीं करते हैं। अब तो देश के गृहमंत्री पी0चिदंबरम ने भी 05 जून को भोपाल में ही कह दिया कि मप्र में धार्मिक कट्टरतावाद बढ़ रहा है। इसी वजह से आतंकी घटनाएं भी हो रही हैं। उनका मानना है कि देश की ज्‍यादातर दक्षिण पंथी कट्टरता से जुड़ी आतंकी घटनाओं के तार मप्र से जुड़े हैं। खासतौर से मालवा के आसपास इंदौर में इन घटनाओं के सबूत मिले हैं। इनमें कुछ लोग पकड़े भी गये हैं और कुछ लोग अभी भी खुले घूम रहे हैं। उनका कहना है कि उन्‍हें ऐसे संगठनों के नाम मालूम है, लेकिन वह उनका नाम नहीं लेना चा‍हते हैं। यह सच है कि इंदौर के साथ-साथ उज्‍जैन, रतलाम, मंदसौर के जिलों में धार्मिक कट्टरता के अवशेष ज्‍यादा फैलते जा रहे हैं, जो कि चिंता का विषय है। इस दिशा में राज्‍य सरकार को पहल करना चाहिए, क्‍योंकि किसी भी प्रकार की कट्टरता विकास में हमेशा बाधक रही है। आज प्रदेश के कई शहर विकास की दौड़ में तेजी से भाग रहे हैं उस स्थिति में धार्मिक कट्टरता पर विराम लगा सकती है।

नाज है इन पर

''60 वर्ष का बेटा और 80 साल की मां : आधुनिक जमाने का श्रवण कुमार''
       समाज में हमारे आसपास ऐसे पात्र होते हैं, जिन पर कोई गौर नहीं करता है, लेकिन वह दुनिया से हटकर ऐसा काम करते हैं जिन पर सबको नाज होता है। मध्‍यप्रदेश में ऐसे लोगों की संख्‍या सीमित तो है, लेकिन लगातार उन लोगों का काफिला बढ़ता जा रहा है, जो कि अपनी भावनाओं और लीग से हटकर काम कर रह हैं। इनकी सेवा, समर्पण और विश्‍वास देखकर लगता है कि ऐसे लोग ही समाज के रखवाले हैं और हमें उन पर नाज भी होना चाहिए। 
60 वर्ष का श्रवण कुमार : 
         मध्‍यप्रदेश के शहरों में आजकल ऐसे मामले सामने आ रहे हैं कि बुजुर्ग माता-पिता को उनके कमाऊपूत बेटे घर से प्रताडि़त करके बाहर निकाल रहे हैं और बुजुर्ग मां बाप रैन बसेरों में अपनी जिंदगी गुजर-बसर करने के लिए मजबूर हैं। बुजुर्गों की पिछले म‍हीने हुई सीएम हाउस में पंचायत के दौरान भी बुजुर्ग लोगों ने ऐसी शिकायत मुख्‍यमंत्री से की थी। भोपाल, इंदौर में तो ऐसे प्रसंग अनगिनत मिल जायेंगे, जिनके बेटे मोटी-मोटी रकम नौकरी से कमा रहे हैं, लेकिन मां-बाप कहीं और उपेक्षित रहकर जीवनयापन कर रहे  हैं। मध्‍यप्रदेश में साडि़यों और तोतों के लिए प्रसिद्व चंदेरी में तो 60 साल का श्रवण कुमार अपनी मां को बीते पांच सालों से लगातार देवी के दर्शन कराने के लिए गोदी में बैठकर गांव से लाकर दर्शन करा रहा है। चंदेरी से 05 किमी दूर सिंहपुर पांडरी गांव के निवासी 60 वर्षीय आदिवासी गणेशराम अपनी 80 वर्षीय मां रतनिया बाई को कंधे और गोदी में  बैठाकर गांव से मां जागेश्‍वरी मैया के दर्शन कराने ला रहा है। इसके पीछे का कारण यह है कि मां को एक दिन रात में दुर्गा मैया ने दर्शन दिये कि अगर तुम्‍हें रोशनी चाहिए, तो दर्शन करने आओ, तो फिर क्‍या था बूढ़ी मां के आग्रह को बेटा टाल नहीं सका और लगातार दर्शन करा रहा है। इससे मां के आंखों की रोशनी थोड़ी-थोड़ी आने भी लगी है। 
बेसहारा महिला का बेटा बन निभाया बादा : 
        समाज में ऐसे भी लोग मौजूद हैं, जो कि हर किसी के लिए कोई भी काम करने के लिए समर्पित हो जाते हैं। मप्र के टीकमगढ़ जिले में 80 वर्षीय बेसहारा सियाबाई यादव की मौत के बाद उसकी अंत्‍योष्टि करने का जिम्‍मा बेटे के रूप में नगर पालिका अध्‍यक्ष राकेश गिरी ने उठाया। न सिर्फ गिरी ने मां-बेटे के रिश्‍तों को मजबूत किया, बल्कि अंत्‍योष्टि के दिन  अपनी भूमिका अदा करके बाल भी कटवाएं और उनकी अस्थियां संचित करके इलाहाबाद भी ले गये। इसके बाद गिरी ने 9 करोड़ की लागत से बन रहे पालिका प्‍लेजा का नाम अपनी मां के नाम से रखा है। निश्चित रूप से भले ही समाज दुआ न दें, लेकिन बूढ़ी मां जरूर दुआएं दे रही होंगी, बेटे को। 
विदिशा के इंजीनियर को 80 लाख का पैकेज : 
मध्‍यप्रदेश की प्रतिभाएं न सिर्फ देश भर में धूम मचा रही है, बल्कि अब तो विदेशों में भी उनकी मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्‍वराज के संसदीय क्षेत्र विदिशा का आईआईटी इंजीनियर स्‍वप्निल जैन को टिवटर कंपनी से 80 लाख रूपये सालाना पैकेज के रूप में आफर मिला है। 22 साल के स्‍वप्निल अक्‍टूबर म‍हीने में कैलीफोनिया प्रांत के सैन फ्रांसिको शहर में अपना कैरियर शुरू करेंगे। इसी साल उन्‍होंने आईआईटी दिल्‍ली से कम्‍प्‍यूटर साईंस में बीटेक किया है। स्‍वप्निल के पिता संजय जैन का ज्‍वलेरी का व्‍यवसाय है। इससे पहले भी इस नौजवान को फेसबुक ने 28 लाख और गोगुल ने 75 लाख का ऑफर दिया था। इस युवक का सपना है कि पहले वह नौकरी करेगा उसके बाद वह मप्र में इंस्‍ट्री खोलेगा। 
बेटियां भी दिखा रही खेलों में हौंसला : 
        अभी तक मप्र के खेलों में बेटियां बढ़-चढ़ कर हिस्‍सा नहीं लिया करती थी, लेकिन अब बेटियां भी किसी भी क्षेत्र में कम नहीं हैं। मप्र की बेटी और भोपाल निवासी मेरीकॉम ने तो बॉकसिंग रिंग में एक अलग ही स्‍थान बना लिया है। इसी के साथ ही सरिता तोमर भी मुक्‍केबाज बनकर उभर रही हैं। वहीं दूसरी ओर हॉकी जैसे जोखिम भरे खेल में अब लड़कियों ने आना शुरू कर दिया है। 
भोपाल की शान है, बड़ा तालाब : शाम का खूबसूरत मंजर
       
वाह क्‍या दृश्‍य है
रात्रि का नजारा और खूबसूरत झील

मंगलवार, 5 जून 2012

दरिंदगी की सीमाएं तोड़ी, पहले बालिका से गैंगरेप फिर जिंदा जलाया

       मध्‍यप्रदेश में बालिकाओं के भविष्‍य को सुनहरा बनाने के लिए मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नित-प्रति नये सपने देखते हैं। उन्‍हें साकार करने के लिए जमीन पर कार्य योजनाएं शुरू करवाते हैं। ऊपर से नीचे तक अधिकारी/कर्मचारी उसमें सक्रिय भी रहते हैं। बेटी बचाओ अभियान इसका उदाहरण है। इस अभियान को न सिर्फ सरकार चला रही है, बल्कि समाज भी भरपूर मदद कर रहा है। इसके बाद भी बालिकाओं के साथ दरिंदगी के मामले सामने आये तो दिल दहल जाता है। बलात्‍कार की घटनाएं राज्‍य में थमने का नाम नहीं ले रही हैं, अब तो एनसीआरबी की रिपोर्ट में भी खुलासा हो गया है कि मध्‍यप्रदेश में सबसे ज्‍यादा रेंप हो रहे हैं। पुलिस महकमा एक ही राग अलापता है कि आखिरकार हम हर बच्‍ची की सुरक्षा तो कर नहीं सकते, लेकिन उन कारणों की अभी भी तपतीश नहीं हो रही जिसके चलते रेंप के कारणों की खोज हो सके। 04 जून, 2012 को सागर जिले के खुरई थाना क्षेत्र के ग्राम खेजराहरचन में एक 15 वर्षीय बालिका के साथ पहले युवकों ने गैंगरेंप किया और बाद में मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जला दिया। बालिका अस्‍पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही है। इस बालिका के साथ चार युवक दीपक विश्‍वकर्मा, मुकेश कुर्मी, विवेक कुर्मी और मुरलीधर विश्‍वकर्मा ने बलात्‍कार किया। इसके बाद जब यह बालिका इन दरिंदों से छूटकर घर की ओर भागने लगी तो इन युवकों ने उस पर मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जला डाला। परिवार के लोगों ने जब बालिका को आग की लपटों घिरा देखा तो उसे अस्‍पताल पहुंचाया। बालिका ने भी चार युवकों के नाम बताये हैं। इस नाबालिग के साथ खेत में शौच के दौरान रेंप किया गया है। गांव के लोग इस घटना को लेकर तरह-तरह की बातें कर रहे हैं, क्‍योंकि इसमें दो मासूम बच्‍चों को भी पकड़ा गया है जिसकी उम्र 9 और 11 साल है। इसके पीछे प्रेम प्रसंग भी एक कारण बताया जा रहा है। दूसरी ओर दिल्‍ली की सूचना के अनुसार एनसीआरबी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि वर्ष 2007 से 2011 के बीच मप्र में सबसे अधिक 15,275 बलात्‍कार के मामले दर्ज किये गये हैं। इसके बाद बलात्‍कारों के मामले में पश्चिम बंगाल, यूपी और महाराष्‍ट्र आते हैं। यानि मप्र बलात्‍कार के मामले में भी अव्‍वल हो गया है, जो कि शर्मनाक है। समझ में नहीं आता है कि जो सामाजिक संगठन महिलाओं और युवतियों की जागृति के नाम पर चलाये जा रहे हैं, वे आखिरकार क्‍या कर रहे हैं। इन संगठनों की भूमिका कई बार संदिग्‍ध हो जाती है। यही हाल राजनैतिक दलों के महिला संगठनों का है। समझ से परे हैं कि जो महिला संगठन काम कर रहे हैं वे क्‍यों नहीं गुस्‍से में आते हैं। महिलाओं के साथ रेंप के मामले बढ़ रहे हैं और महिला संगठन हाथ पर हाथ धरे बैठी है। 
पहले मासूम की हत्‍या फिर बलात्‍कार : 
       दमोह जिले के पथरिया में एक दिल दहला देने वाली घटना हुई। यहां पर एक बैंहशी दरिंदें ने एक दलित महिला के घर में घुस कर दो माह के मासूम बच्‍चे को जमीन पर पटक कर हत्‍या कर दी, उसके बाद हत्‍यारे ने महिला के साथ बलात्‍कार किया और उसके बाद लूटपाट करके फरार हो गया। रिंकी नामक महिला पेशे से सब्‍जी बेचने का काम करती है। कुछ दिन पहले आरोपी से उसकी स्‍टेशन पर मुलाकात हुई थी और एक दिन 03 जून को अचानक आरोपी शराब के नशे में धुत्‍त होकर घर पहुंचा और महिला के साथ बदतमीची करने लगा। महिला के विरोध करने पर बच्‍चे को मार डाला और बाद में महिला के साथ रेंप किया। महिला फिलहाल अस्‍पताल में भर्ती किया।  

सोमवार, 4 जून 2012

जुझारू और लड़ाकू प्रवृत्ति के युद्वाओं का पड़ा टोटा

          मध्‍यप्रदेश के विकास के सपने तो खूब दिखाये जाते हैं। इन सपनों को अमलीजामा करने के लिए जो प्रयास होना चाहिए वह नहीं हो पाते हैं। यही वजह है कि  मध्‍यप्रदेश की स्‍थापना के 56 साल बाद भी हम सड़क, बिजली, पानी की समस्‍या से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। आज भी हर तरफ इन्‍हीं मुद्दों पर विवाद होते हैं। राजनेता भी यही सवाल बार-बार जनता के सामने खड़ा करते हैं। जनता भी अपने इलाके की सड़के बनाने की गुहार राजनेताओं से करती है। राजनेता भी जनता को सड़कों की मरम्‍मत और नये निर्माण के सपने दिखाकर वोट हासिल कर लेता है। दुखद पहलू यह है कि न तो जनता नये सपने देख रही है और न ही राजनेता उन्‍हें साकार करने पर ध्‍यान देते हैं जिसके चलते प्रदेश लगातार गर्त में जा रहा है। शहरों के विकास की परिकल्‍पनाएं बुनी गई, लेकिन आज भी हम मध्‍यप्रदेश में एक भी बड़ा महानगर तैयार करने में कामयाब नहीं हो पाये। आबादी के हिसाब से इंदौर को महानगर कहा जाता है, लेकिन केंद्र सरकार के मापदंड में इंदौर भी महानगर नहीं है। इसके अलावा अन्‍य जो शहर है उनमें भी बुनियादी संरचनाएं विकसित करने की कोई पहल नहीं हो रही है। इन शहरों में भी बुनियादी सुविधाओं के लिए लोग रोना रोते रहते हैं। गांवों की हालत तो और भी बदतर है। इन सब कारणों की मूल वजह मप्र की जनता में लड़ाकूपन का न होना है। यहां की जनता न तो संघर्ष करना जानती है और न ही अपने अधिकारों के लिए लड़ना आता है, जो जैसा चल रहा है उसी पर अपनी गाड़ी दौड़ती रहती है। नये सपने देखना तो लोगों को आता ही नहीं है। यही वजह है कि मप्र के बाद बने राज्‍य गुजरात, हरियाणा, पंजाब, गोवा आज देश के नक्‍शे पर चमक रहे हैं और हम मप्र वासी आज भी पिछड़ापन, गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, अज्ञानता जैसे तमगे लगाकर जीने को विवश है। राजनेताओं का हाल यह है कि न तो वे इसके लिए लड़ रहे हैं और न ही जनता को लड़ने के लिए उदेलित कर रहे हैं। राजनेता को तो पांच साल में एक बार वोट चाहिए उसके बाद उनका कोई वास्‍ता नहीं। जनता संघर्ष करें या न करें पर मप्र को अगर देश के नक्‍शे पर चमकाना है, तो जनता को संघर्ष का रास्‍ता अपनाना ही होगा। 
              जय हो मध्‍यप्रदेश की

रविवार, 3 जून 2012

छोटे भाई ने प्रेम किया और बड़े भाई को मिली मौत

छोटे भाई के प्रेम की सजा बड़े भाई को भुगतनी पड़ी
         मध्‍यप्रदेश में इन दिनों प्रेम प्रसंगों का अंत बड़ा बुरा हो रहा है। कहीं पर प्रेमिका प्रेमी नहीं मिलने पर मौत को गले लगा रही है, तो कभी प्रेमी ट्रेन से कटकर प्रेमिका की चाहत में जान गवा रहा है। प्रेम प्रसंगों पर परिवार और गांव-गांव में मारपीट और टकराव के साथ-साथ हिंसक घटनाएं हो रही हैं। अब तो छोटे भाई के प्रेम की सजा बड़े भाई को मौत के रूप में मिली है। सजा भी इतनी घिनौनी है कि बड़े भाई को जिंदा जला कर मार डाला गया है। यह घटना मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे सीहोर जिले के ग्राम तिलाडि़या की है, जहां पर राजपूत समाज की एक युवती से प्रेम करना दूसरे परिवार को एक बड़ा सजा मौत के रूप में भोगनी पड़ी। इसके घटना के पीछे का मूल कारण प्रेम प्रसंग को पुलिस भी बता रही है। कहा जा रहा है कि मृतक अमर सिंह का छोटा भाई सबल सिंह 26 अप्रैल को ग्राम तिलाडि़या की एक विवाहिता को लेकर भाग गया। इस विवाहिता से सबल सिंह के प्रेम के रिश्‍ते महीनों से चल रहे थे और दोनों के बीच इस कदर निकटता हो गई थी कि वह घर छोड़कर प्रेमी के साथ भाग खड़ी हुई और इन दोनों ने कोर्ट में शादी भी कर ली। अदालत ने दोनों को साथ रहने की इजाजत भी दे दी थी। प्रेमी महिला के अपने पूर्व पति से दो बच्‍चे भी है, जो कि वह घर छोड़ गई है। इस प्रेम प्रसंग और शादी के बाद से गांव में तनातनी का माहौल बन गया था जिस घर की विवाहिता भागी थी उसके लोगों ने काफी प्रयास करने के बाद भी शादी करने वाले प्रेमी-प्रेमिका को तो तलाश नहीं कर पाये, क्‍योंकि वह अज्ञात स्‍थान पर रह रहे हैं। इसी बीच 02 जून 2012 को करीब 12 बजे प्रेमी सबल सिंह के भाई अमर सिंह को ग्राम झागर की ओर जा रहा था, तभी उसको कुछ लोगों ने घेर लिया और जिंदा आग के हवाले कर दिया, जिन लोगों ने अमर सिंह को जलाया है वे एक बुलेरो वाहन से आये थे और जलती लाश को खेत में छोड़कर भाग गये। गांव वालों ने जब तक देखा तब तक व्‍यक्ति की मौत हो चुकी थी, पुलिस ने जला हुआ शव बरामद कर लिया है और नौ लोगों को गिरफ्तार भी किया है। प्रेम की नियति देखिए कि छोटे भाई ने प्रेम किया और उसकी सजा बड़े भाई को जिंदा जलकर चुकानी पड़ी। इस प्रेम कहानी की दुखद स्थिति यह है कि अंत्‍योष्टि में छोटा भाई शामिल भी नहीं हो सकेगा। क्‍योंकि आसपास के लोगों की निगाहें उसके ऊपर ही टिकी हुई हैं। मध्‍यप्रदेश में इन दिनों प्रेम-प्रसंगों का अंत बड़ा बुरा हो रहा है।

शुक्रवार, 1 जून 2012

तीन साल, तीन बच्‍चे : घर में खोद लिया कुंआ

दो बहनों और एक साथी का कमाल, तीन साल में खोद डाली कुईयां, यह बालिकाएं हैं रचना और लीला
      दिल में अगर तमन्‍ना हो तो कोई भी असंभव कार्य संभव हो सकता है। इसी राह पर चलकर मध्‍यप्रदेश के विदिशा जिले की तहसील गंजबासौदा में तीन बच्‍चों ने तीन साल में रात-दिन मेहनत करके 35 फीट का कुंआ (कुईयां) खोद डाला। बच्‍चों की लगन, परिश्रम का ही परिणाम था कि आज उनके घर में एक कुंआ हो गया है, जहां वे अब आसानी से सुबह-शाम पानी उससे ले सकते हैं, जबकि इससे पहले उन्‍हें पानी के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता था। इन बच्‍चों ने अपने घर में कुंआ इसलिए खोदा कि उनमें से एक बच्‍चे के स्‍वाभिमान को इस कदर चोटर लगी कि वे कुंआ खोदने के लिए प्रतिज्ञा कर बैठे। हुआ यह है कि सार्वजनिक हैंडपंप पर हुए विवाद से एक बालिका रचना को पड़ोसियों ने तमाचे जड़ दिये, जिससे विचलित होकर रचना ने नई कुईयां घर में ही खोदने का इरादा बना लिया। इस काम में उसकी छोटी बहन लीला और पड़ोस में ही साथ में खेलने वाले 14 वर्षीय बालक राजेश कुशवाहा ने इस अभियान में हाथ बटाया और देखते-ही-देखते तीन साल में कुईयां पानी देने लगी। यह इलाका गंजबासौदा में लाल पठार मुहल्‍ले का है, जहां पर ग्‍यारसपुर के मोहम्‍मदगढ़ गांव का खेत सिंह मालवीय का भूमिहीन परिवार रहता है। इन बच्‍चों के माता-पिता मजदूरी करके अपने परिवार का लालन-पोषण करते हैं। इन बच्‍चों की मेहनत का ही प्रतिफल है कि आज उनके घर में खोदी गई कुईयां से वह आसानी से पानी निकाल रहे हैं। अब इस पानी का उपयोग आस-पड़ोस के लोग भी करते हैं। जिस किशोरी रचना ने एक चाटा खाने के बाद यह कुईयां खोदने का निर्णय लिया था अब वह 12 वर्ष की हो गई है । उसके पिता खेत सिंह और मां गुलाबी बाई भी अपनी इस बेटी के अथक परिश्रम के साक्षी हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने भी इस कुईयां को खोदने में अहम भूमिका अदा की है। वैसे भी कहा जाता है कि बाल मन विचलित जल्‍दी होता है और वह जो तय कर लेता है उसमें उसे सफलता ही मिलती है। इसका उदाहरण सामने है। 
                            '' जय हो मध्‍यप्रदेश की'' 

गुरुवार, 31 मई 2012

अलग-अलग युगों की खोजी जा रही है धरोहर

       इतिहास आज भी हमारे लिए दस्‍तावेज है। इस धरोहर की तलाश में हम गांव-गांव और गली-गली भटक रहे हैं। कभी यह धरोहर मूर्तियों, सिक्‍कों, गुफाओं अथवा अन्‍य औंजारों के जरिए हमें हासिल होती हैं। मध्‍यप्रदेश का पुरातत्‍व विभाग एक कदम आगे बढ़कर प्रदेश के हर जिले और ब्‍लाक स्‍तर पर अब पुरातात्विक सर्वे करा रहा है। इस सर्वे के माध्‍यम से सिंधु घाटी सभ्‍यता के दौर के पत्‍थर या औजार हों या आदि-मानव काल के अवशेष तराशे जा रहे हैं, ताकि उस काल की गणना की जा सके। इसके साथ ही अशोक, विक्रमादित्‍य या फिर अंग्रेजों से संघर्ष काल से जुड़े दस्‍तावेजों का भी संरक्षण करने की कोशिश हो रही है। यह काम गांव-गांव में किया जा रहा है, ताकि उन्‍हें भविष्‍य के लिए संरक्षित किया जा सके। इतिहास से जुड़ी धरोहरों की खोज को सभी 50 जिलों में स्‍थानीय स्‍तर पर फैली धरोहर को सर्वे के माध्‍यम से खोजा जा रहा है। 
          मध्‍यप्रदेश ऐतिहासिक स्‍थलों की धरोहर के लिए जाना पहचाना जाता है। यहां पर कई गुफाएं खोजी गई हैं और उन गुफाओं का महत्‍व तलाशकर पर्यटक स्‍थल के रूप में विकसित भी किया गया है। यह सच है कि राज्‍य में इस दिशा जितना ध्‍यान दिया जाना चाहिए था, उतना ध्‍यान नहीं दिया गया है जिसके चलते हम अपनी धरोहर का संरक्षण उस तरह से नहीं कर सकें हैं जिस तरह किया जाना चाहिए, लेकिन अब पुरातत्‍व विभाग नये सिरे से धरोहर के सर्वे के काम में जुटा है, जो अपने आप में एक सराहनीय कदम है।

बुधवार, 30 मई 2012

एक प्रेमी और दो प्रेमिकाएं बंधे शादी के बंधन में

'' दूल्‍हा एक और दुल्‍हन दो : यह करिश्‍मा मप्र के अलीराजपुर में आदिवासी युवक ने कर डाला''
      अमूमन हिन्‍दू परंपरा में एक युवक एक युवती से शादी कर सकता है, लेकिन आदिवासियों की परंपराएं इससे भी एक कदम आगे बढ़कर हैं, जहां पर दो बीबियों से शादी करना कोई गुनाह नहीं है। आदिवासी अंचल अलीराजपुर जिले के उदयगढ़ गांव में एक दिलचस्‍प शादी हुई। इस गांव के नौजवान आदिवासी जालम सिंह मुझाल्‍दा ने अलग-अलग दो युवतियों से अपना प्रेम प्रसंग चलाया और बाद में दोनों से शादी के बंधन में भी बंधा। पूरे देश में लिव एन रिलेशनशिप पर विवाद मचा हुआ है पर आदिवासी युवक ने तो वह काम कर डाला जो कि हरियाणा और पंजाब में भी नहीं हो पा रहा है। इस आदिवासी युवक की शादी की स्क्रिप्‍ट बड़ी दिलचस्‍प है। जालम सिंह ने सबसे पहले अपने गांव की मनीषा से बेइतंहा मोहब्‍बत हुई, गांव में चर्चा का विषय बनी, जब परिवार में शादी से इंकार कर दिया तो आदिवासी युवक जालम सिंह मनीषा को लेकर भाग गया। थोड़े दिन बाद घर वालों ने उसे स्‍वीकार कर लिया। शादी के बिना ही वह दो बच्‍चों का बाप बन गया। इसी बीच जालम सिंह को पड़ौसी गांव भोरकुंडिया गांव की युवती प्रर्मिला से मोहब्‍बत हो गई। बार-बार प्रर्मिला उसे शादी के लिए जोर डालती थी, तो उसे समझ में नहीं आता था कि क्‍या करें, तो एक दिन जालम सिंह ने अपनी पुरानी कहानी दोहराई और प्रर्मिला को लेकर भाग गया। इसके बाद विगत एक साल से मनीषा और प्रर्मिला को एक साथ जालम सिंह अपने घर में रखे हुए था। इस दौरान प्रर्मिला भी एक बच्‍चे की मां बन गई। जब लड़की के मां-बाप ने शादी का प्रस्‍ताव रखा तो जालम सिंह और उसके परिवार के लोग आसानी से मान गये और फिर आदिवासी परंपरा के अनुसार विवाह हुआ। इस मौके पर समाज और परिवार के रिश्‍तेदारों ने जमकर खुशियां मनाई, नाचे, गाये और शराब भी पी। इस शादी को लेकर इन दिनों आदिवासी अंचल में खूब चर्चा का विषय बनी हुई है। आदिवासी युवक अपनी दोनों पत्‍िनयों साथ न सिर्फ खुश है, बल्कि उसका परिवार भी इस खुशी में सहभागी है।      

मंगलवार, 29 मई 2012

फिर जीत लिया आसमान बेटियों ने

 
       बेटियां हर क्षेत्र में अव्‍वल हैं। वे जहां चाह रही है वहां राह खुल रही है। आसमान पर अपने अरमानों का झण्‍डा बुलंद कर रही हैं उनकी राह में बाधाएं हैं, लेकिन फिर भी उनके इरादे बुलंद है जिसके चलते मंजिल उन्‍हें मिल भी रही है। समाज बार-बार नमन भी कर रहा है। एक बार फिर बेटियों ने सीबीएसई एवं माध्‍यमिक शिक्षा मंडल के कक्षा 12वीं के परीक्षा परिणामों ने एक बार फिर धूम मचा दी है। हर विषय में छात्राएं अव्‍वल रही हैं। यहां तक कि सीबीएसई में तो सातों विषयों में 86.21 प्रतिशत लड़किया कामयाब रही हैं। इस बार सबसे ज्‍यादा मैरिट में गणित विषय में छात्राओं ने बाजी मारी है। सीबीएसई में भोपाल में पढ़ने वाली छात्रा वर्षा वर्मन ने 97.2 प्रतिशत अंक पाकर अव्‍वल रही हैं। यह छात्रा सेंट जोसेफ को-एट की कॉमर्स संकाय में हैं। निश्चित रूप से ब‍ेटियों के इरादे बुलंद हुए हैं और उन्‍होंने बुलंदियां छू ली हैं। वर्षा वर्मन अपनी खुशी का इजहार करती हुई क‍हती है कि वे लॉ की पढ़ाई करना चाहती हैं। फिलहाल भविष्‍य में सपने तो खूद देखें है अब कितने पूरे होते हैं यह तो वक्‍त ही बतायेगा। इसी प्रकार ऑल इंडिया में 17वां रैंक हासिल करने वाली राधिका यादव का भी इरादा वकालत करने का है और वे लॉ की डिग्री लेना चाहती हैं। राधिका ने कहा कि वे रोजाना 8 घंटे स्‍टडी करती हैं। इस बार माध्‍यमिक शिक्षा मंडल के हायर सेकेण्‍ड्री रिजेल्‍ट में टॉपर बच्‍चा गोपाल धाकड़ रहा है, जो कि नीमच जिले के जाबद के खेतिहार मजदूर का बेटा है। बोर्ड के परीक्षा परिणामों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि गांव-कस्‍बों ने बड़े शहरों को पीछे छोड़ दिया है। इसी प्रकार कॉमन लॉ एडमीशन टेस्‍ट में छतरपुर की प्रतिभा राजे परिमार ने देश में प्रथम रेंक हासिल की है। यह बच्‍ची छतरपुर में रहकर पढाई कर रही है। निश्चित रूप से बच्चियां कमाल कर रही है और अपनी पढ़ाई में लड़कों को भी पीछे छोड़ती चली जा रही हैं और उनके अपने इरादों और सपनों को साकार करने में जुटी है।  

राई नृत्‍य के बदल रहे हैं अर्थ मध्‍यप्रदेश में

''राई नृत्‍य में मशगूल महिलाएं''
        मध्‍यप्रदेश का अति पिछड़ा इलाका बुंदेलखंड राई नृत्‍य में अपनी पहचान अंतर्राष्‍ट्रीय और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बना चुका है। कई बड़े समारोह में आज भी राई नृत्‍य के आयोजन गरिमा के साथ हो रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे राई नृत्‍य के अर्थ बदलने लगे हैं, जो नई उम्र की नृत्‍यांगनाएं राई के क्षेत्र में आ रही है, वे नृत्‍य के साथ-साथ नवधनाढय को आकर्षित करने के लिए कोई भी कदम आगे बढ़ा देती हैं। इसके चलते राई नृत्‍य धीरे-धीरे जिस्‍म फरोशी का माध्‍यम भी बनता जा रहा है, जो कि संस्‍कृति और परंपरा के लिए शर्मसार है। मप्र के सागर जिले में सबसे ज्‍यादा राई नृत्‍य की नृत्‍यांगनाएं अपने कौशल का प्रदर्शन कर रही हैं। इस जिले में पथरिया, हबला, लुहारी, फतेहपुर, राहतगढ़, चौकी, कोरासा, मनेशिया, लिधोरा सहित आदि गांवों में राई की नृत्‍यांगनाएं निवास करती हैं। यह नृत्‍यांगनाएं लंबे समय से राई नृत्‍य में डूबी हुई हैं। बेडि़या समाज की महिलाएं आज भी रूढि़वादी परंपराओं में जकड़ी हुई है, जो कि आज भी अपना जीवनयापन का आधार और पुश्‍तैनी व्‍यवसाय राई नृत्‍य मानती हैं निश्चित रूप से राई नृत्‍य की पहचान कई स्‍तरों पर है, लेकिन धीरे-धीरे इस नृत्‍य में कुछ ऐसे कीटाणू प्रवेश कर गये हैं जिसकी वजह से राई नृत्‍य को भी व्‍यवसाय की तरह देखा जाने लगा है। राई नृत्‍य बुंदेलखंड की शान है, लेकिन सरकार ने कभी भी इस नृत्‍य के बढ़ावा पर ध्‍यान नहीं दिया, बल्कि जो परंपरा है उसी को विकसित होने दिया। आज भी सरकारी और गैर सरकारी आयोजनों में शान के साथ राई नृत्‍य कराया जाता है। जब बुंदेलखंड की युवतियां राई नृत्‍य करती है, तो एक अलग ही शमा बंध जाता है।

सोमवार, 28 मई 2012

सीमाएं हैं असुरक्षित मध्‍यप्रदेश में, अब गश्‍त और चैंकिंग पाइंट होंगे

         लंबे समय से मप्र की सीमाएं असुरक्षित होने के संकेत मिलते रहे हैं। राज्‍य में जिस तरह से संगठित अपराधों के तरीके नये-नये इजात किये जाने लगे हैं उससे यह आभास होने लगा है कि कही न कही अन्‍य राज्‍यों से अपराधियों ने अपनी आमद देनी शुरू कर दी है। राज्‍य में आतंकवादी गतिविधियों का बढ़ना और सिमी के नेटवर्क में इजाफा होने से साफ जाहिर है कि कही न कही दाल में काला है। भविष्‍य की चुनौतियों से निपटने के लिए मप्र के पुलिस महानिदेशक नंदन दुबे की पहल पर तीन राज्‍य के पुलिस महानिदेशक की बैठक कर उन मसलों पर चर्चा की जो राज्‍य की सीमाओं पर जब तब विवाद होते हैं। 
     मध्‍यप्रदेश यूं तो पांच राज्‍यों की सीमाएं से जुड़ा हुआ है जिसमें राजस्‍थान, गुजरात, उ0प्र0, छत्‍तीसगढ़ और महाराष्‍ट्र शामिल हैं। इसमें सबसे ज्‍यादा आवाजाही राजस्‍थान, गुजरात  और महाराष्‍ट्र से होती है। इन राज्‍यों की सीमाओं पर मदक पदार्थों की तस्‍करी, संगठित अपराध और मवेशियों की तस्‍करी के साथ-साथ सिमी के नेटवर्क का जाल भी फैल रहा है। इसकी भनक राज्‍य की पुलिस को है। यही वजह है कि डीजीपी ने पहल करके पुलिस महानिदेशक की बैठक बुलाई और उसमें सीमावर्ती इलाकों में संयुक्‍त गश्‍त और चैकिंग पाइंट लगाने पर सहमति बन गई है। यह जरूर है कि महाराष्‍ट्र और यूपी से अधिकारी नहीं आ पाये। मप्र की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए राज्‍य सरकार को बेहद गंभीर रहने की जरूरत है, क्‍योंकि सीमाएं आये दिन माहौल खराब कर रही हैं। सिमी का नेटवर्क मप्र के साथ-साथ गुजरात और राजस्‍थान में भी अच्‍छा खासा है। मप्र की पुलिस ने राज्‍य में सिमी के नेटवर्क को ध्‍वस्‍त किया है, लेकिन फिर भी सिमी ने चेहरा बदलकर अपना मूवमेंट बढ़ाया है जिसकी भनक राज्‍य की पुलिस को है। इस बैठक में नबालिग और आदिवासी लड़कियों की तस्‍करी का मामला भी उठा था। निश्चित रूप से मप्र के प‍ुलिस महानिदेशक नंदन दुबे ने एक सार्थक पहल करके राज्‍य की सीमाओं को फिर से चाक-चौबंद करने की पहल की है, जो कि एक सराहनीय कदम माना जायेगा। इस दिशा में लगातार प्रयास करने की जरूरत है। 
                               '' जय हो मप्र की''

रविवार, 27 मई 2012

सिंधिया ने गरमाई मध्‍यप्रदेश की कांग्रेस राजनीति

''अभी तो मंजिल पर नजर''
         यूं तो केंद्रीय वाणिज्‍य एवं उद्योग मंत्री ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया अभी तक मप्र की राजनीति में अधिक दिलचस्‍पी नहीं ले रहे थे, उनका राजनीतिक लक्ष्‍य ग्‍वालियर, चंबल संभाग तक सीमित था, लेकिन पिछले चार-पांच महीनों में अचानक सिंधिया ने प्रदेश की राजनीति में अपने कदम बढ़ाएं हैं। ऐसा नहीं है कि वे इससे पहले सक्रिय नहीं थे, लेकिन उनकी यात्राओं ने राजनीति में भूचाल ला दिया है और उनके एक बयान ने तो कांग्रेस शिविर में हल-चल ही मचा दी है। वे लगातार कह रहे हैं कि मप्र कांग्रेस के अध्‍यक्ष भूरिया ही कांग्रेस का चेहरा है और अगर कोई आदिवासी मुख्‍यमंत्री बनता है, तो यह मप्र के लिए गौरव की बात होगी। सिंधिया के इस बयान से दि‍ग्विजय सिंह खेमा खफा हुआ है। विशेषकर दिग्विजय समर्थक नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की राह में कहीं न कहीं यह बयान बाधा बनकर खड़ा हो गया है। दिलचस्‍प यह है कि इस बयान पर पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह ने संतुलित टिप्‍पणी करके यह कह दिया है कि मुख्‍यमंत्री का चयन तो विधायक करेंगे। इसके बाद भी सिंधिया लगातार भूरिया को ही मुख्‍यमंत्री पद का दावेदार बता रहे हैं। सिंधिया ने थोड़े समय में ही 40 जिलों के दौरे कर लिये हैं और वे लगातार अपने दौरों के जरिए कांग्रेस को मजबूत करने का काम भी कर रहे हैं। इन दिनों मप्र में एक नया ध्रुवीकरण पैदा हो रहा है जिसकी बागडोर सिंधिया के हाथों में धीरे-धीरे आ रही है जिसमें सत्‍यव्रत चतुर्वेदी, सुरेश पचौरी, अरूण यादव शामिल हैं। सिंधिया की राजनीति गतिविधियों से मप्र की राजनीति में अच्‍छी खासी हलचल पैदा हो गई है। सिंधिया 25 मई को राजधानी में थे, उन्‍होंने फिर से मुख्‍यमंत्री पद के लिए भूरिया को ही बेहतर उम्‍मीदार बताया। इससे साफ जाहिर है कि भविष्‍य में सिंधिया भूरिया पर ही दांव खेलेंगे।
''मोबाइल पर बात करते हुए ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया''

बेटियों की तस्‍करी मध्‍यप्रदेश में


        जहां एक ओर मध्‍यप्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान बेटी बचाओ अभियान चलाये हुए हैं। इसके प्रचार अभियान पर करोड़ों रूपया खर्च हो रहा है। वहीं शर्मनाक स्थिति यह है कि मप्र के कई जिलों से बेटियों की तस्‍करी हो रही है और पुलिस मूकदर्शक बनी बैठी है। मानव तस्‍करी का एक गिरोह कई हिस्‍सों में विभिन्‍न रूपों में सक्रिय है, जो कि बेटियों को निशाना बना रहे हैं। विशेषकर आदिवासी अंचलों से बेटियों के गायब होने की सबसे अधिक सूचनाएं सामने आ रही हैं। राजधानी से सटे आदिवासी बाहुल्‍य जिले बैतूल में तो पिछले पांच सालों में 1560 बालिग और नाबालिग लड़कियां लापता हुई हैं। इसके बाद भी डिंडोरी, अनूपपुर, शहडोल जिलों से भी लड़कियों के गायब होने की सूचनाएं हैं। 
बांछड़ा समुदाय में सबसे अधिक खरीद-फरोख्‍त :
         मध्‍यप्रदेश में परंपरा की आड़ में चल रहे बांछड़ा समुदाय के देह व्‍यापार डेरों में भी मानव तस्‍करी के जरिए अबोध बालिकाओं की खरीद फरोख्‍त का भी सिलसिला चल रहा है। बांछड़ा जाति नीमच, रतलाम, मंदसौर के इलाकों में फैली हुई है। वर्ष 2011 में तो एक गिरोह पकड़ा गया था, जिसमें से 06-07 बालिकाओं को वैश्‍यावृत्ति करने से मुक्ति किया गया था। राज्‍य में युवतियों के गायब होने के मामले वर्ष 2000 से बढ़ते ही जा रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्‍यूरो के रिकार्ड देखें तो चौंकाने वाली तस्‍वीर सामने आ रही हैं जिसमें हर साल लड़किया गायब हो रही हैं अथवा उन्‍हें वैश्‍यावृत्ति के लिए प्रेरित किया जा रहा है। वर्ष 2010 में खरीद-फरोख्‍त के 07 मामले दर्ज हुए जिसमें इंदौर में 02, रीवा, पन्‍ना, दतिया, गुना और टीकमगढ़ में 01-01 मामला था। वर्ष 2009 युवतियों के खरीद-फरोख्‍त के 09 मामले सामने आये जिसमें ग्‍वालियर और हरदा में 02-02 और मुरैना में 03 एवं जबलपुर, डिंडोरी में 01-01 मामला सामने आये। प्रदेश में सबसे ज्‍यादा खरीद-फरोख्‍त के मामले नीमच और मंदसौर से आ रहे हैं। यहां से लड़कियों को महानगरों में बेचा जा रहा है, तो कुछ लड़कियों को तो अरब देशों में बेचा गया है। सामान्‍यत: बालिकाओं के अपहरण, खरीद-फरोख्‍त, दलाली और मानव तस्‍करी के यह मामले समय-समय पर उजागर होते रहते हैं इसके बाद भी पुलिस का कोई ध्‍यान इस ओर नहीं है। बैतूल जिले में लड़कियों की गुमशुदगी के मामले चौंकाने वाले हैं। पिछले पांच सालों में इस जिले से लड़किया अचानक गायब हो रही है। पहले लड़कियां 50 से 60 हजार रूपये में खरीद कर शादी कर ली जाती थी और फिर उन्‍ासे देह व्‍यापार करवाया जाता था। इसमें सबसे ज्‍यादा बालिक और नाबालिक लड़कियों को देह व्‍यापार में उतारा जा रहा है। इस जिले के एसपी ललित शाक्‍यवार का कहना है कि मानव तस्‍करी रोकने के लिए हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। इन मामलों को लेकर पुलिस अधिकारी और सरकार गंभीर नहीं है। यही वजह है कि पुलिस ऐसे गिरोह पर नजर तक नहीं डाल पाती है और मानव तस्‍करी करने वाला गिरोह अपनी दुनिया में मस्‍त रहता है।

शनिवार, 26 मई 2012

आग बरसा रहा है सूरज, राहत के लिए हुए लोग बैचेन मध्‍यप्रदेश में

हाय गर्मी, कैसे बचे

कुछ पल गर्मी से राहत का आनंद लिया जाये
इन दिनों मध्‍यप्रदेश का मौसम बदला-बदला है। सूरज का क्रोध आग उगल रहा है। हर तरफ गर्मी कहर बनकर बरप रही है, लोग राहत के लिए बैचेन हैं। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी गर्मी ने सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं। दिन में सड़के सुनसान हो जाती है, जो लोग सड़कों पर दौड़ते नजर आते हैं, वे भी मजबूरी में सिर से पांव तक कपड़ों में ढके होते हैं। सूरज की इस तल्‍खी ने लोगों की दिनचर्या बदलकर रख दी है। मौसम विभाग बार-बार कह रहा है कि फिलहाल तो राहत की कोई उम्‍मीद नहीं है, लेकिन आधुनिक ज्‍योतिषों का आकलन है कि इस बार नौ-तपे में बारिश होगी। फिलहाल तो गर्मी की तपन तम-तमा रही है। गर्मी से राहत के लिए लोगों ने अलग-अलग अपने इंतजाम किये हुए हैं। मप्र के बुरहानपुर जिले में तो तापमान ने छलांग लगाते हुए 46 डिग्री पर कर गया। जबकि भोपाल का तापमान 43.9 डिग्री रहा है। मौसम के निदेशक डॉ0 डीपी दुबे का मानना है कि 22 मई 1947 को तापमान 45.6 दर्ज किया गया था, जबकि इसी तारीख में वर्ष 2011 में भोपाल का तापमान 41.1 डिग्री सेल्सियस आका गया था, जबकि वर्ष 2010 में तो तापमान 46 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। मौसम का चक्र यूं ही चलता रहता है। कभी तापमान बढ़ता है, तो कभी तापमान घटता है। 
सूरज की तपन से सड़कें हुई सुनसान
          तम-तमाई गर्मी ने लोगों को परेशान किया हुआ है। प्रदेश के कई हिस्‍सों में दिनभर सड़के सुनसान रहती हैं। लगातार ऊपर चढ़ते पारे और आसमान से बरसती आग सामान्‍य जनजीवन को प्रभावित किया है। इसके चलते बाजार का व्‍यवसाय तो प्रभावित हुआ ही है पर साथ ही साथ सड़कों पर जो लोग निकलते हैं उन्‍हें कई प्रकार की सावधानियों के साथ निकलना पड़ रहा है। अब तो घर और दफ्तरों में चल रहे कूलर और एसी भी गर्म हवाएं फैंकने लगे हैं। यही हाल रात्रि में भी बना रहता है। देर रात्रि तक गर्म हवाओं का सिलसिला चलता रहता है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार एक जून को बारिश दस्‍तक दे देगी। गर्मी की तपन से सबसे ज्‍यादा प्रभाव युवतियों को हो रहा है, जो कि अपने आपको बचाने के लिए पूरी तरह से कपड़ा ढक कर सड़क पर निकल रही हैं। वहीं राज्‍य के हर हिस्‍से में तालाब और झीलों में अचानक चहल-पहल बढ़ गई है। मौसम की इस बदली फिजा ने पूरी तरह से मप्र को अपनी बाहों में जकड़ लिया है।
भोपाल की झील में गर्मी से राहत के लिए वोटिंग का इंतजार
कहीं तो राहत नसीब हो






शुक्रवार, 25 मई 2012

रसोई घर में दफन पति की लाश पर कल्‍युगी पत्‍नी सैंक रही थी रोटियां

          क्‍या कोई विश्‍वास करेगा कि जिस जीवनसंघनी के साथ सात फेरे लेकर जीवन-मरने की कसम खाई थी, उसी पत्‍नी ने अपने पति को प्रेमी की खातिर न सिर्फ घर के किचिन में जहर देकर पहले मारा और वहीं पर ही दफन कर डाला। हद तो तब हो गई जब इस कल्‍युगी पत्‍नी ने दो दिनों तक लगातार दफन पति की लाश पर गैस रखकर रोटियां भी सैंकी। भला हो आस-पड़ौस का कि उन्‍होंने रहस्‍य पर से पर्दा हटाया और पुलिस ने पत्‍नी को अंतत: पकड़ ही लिया। यह घटना क्रम मप्र के विदिशा जिले के गंजबासौदा से 10 किमी दूर ग्राम जरौद का है। ऐसा नहीं है कि यह कोई पहली घटना है कि प्रेमी की खातिर पत्‍नी ने पति को मार डाला। राज्‍य में ऐसी घटनाएं हर महीने हो रही हैं। इसके पीछे पत्‍नी का प्रेमी के प्रति गहरा लगाव और आर्थिक संकट एक बड़ा कारण सामने आ रहा है। 
महिला के विभिन्‍न रूप : 
       वर्षों से कहा जा रहा है कि महिलाओं को समझना मुश्किल है। कलयुग में भी महिलाएं अपना चरित्र दिखाने में पीछे नहीं हैं। अभी हाल ही में भोपाल शहर में पत्‍नी ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की सिर कुचल कर निर्मम हत्‍या कर दी थी। ऐसी घटनाएं नित-प्रति सामने आती है, लेकिन अगर ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं का खुलासा होने लगे तो फिर पूरी पारिवारिक व्‍यवस्‍था ध्‍वस्‍त होने की कगार पर पहुंचने के संकेत मिलते हैं। कोई 200-300 आबादी वाले गांव जरौद में मीना बाई दांगी अपने पति के साथ जीवनभर साथ निभाने का वादा करके विवाह सूत्र में बंधी थी और इस अटूट बंधन का ही परिणाम था कि दो बच्‍चों की मां बनी, बस बाप का कसूर यह था कि वह परिवार को चलाने के लिए चाय की दुकान चलाकर घर परिवार का गुजर-बसर कर रहा था पर उसे क्‍या पता था कि उसकी पत्‍नी उसके साथ न सिर्फ बेईमानी कर रही है, बल्कि परिवार को ही तहस-नहस करने पर तुली हुई है। पहले पत्‍नी ने अपने बड़े बेटे को प्रेमी के साथ देखने पर रहस्‍यमय ढंग से मार डाला और जब यह बात पति को पता चली तो मीना ने उसे भी जहर देकर अपने पति मुन्‍ना लाल दांगी को घर में ही किचिन में दफना दिया। यह महिला न तो डरी और न ही सहमी, बल्कि उसने अपने पति की लाश को दफनाने के बाद घर में इस तरह से लीपा-पोती कर दी थी कि किसी को एहसास नहीं हुआ कि घर में अपने पति को ही दफना दिया। इसके बाद भी उसके छोटे भाई और पुत्र को अपने पिता के गायब होने का संदेह हुआ, दोनों पुलिस चौकी पहुंचे और इन्‍होंने मां और भाभी पर गायब होने का संदेह जाहिर किया। पुलिस आई और पत्‍नी मीना बाई से पूछताछ शुरू हुई। पूछताछ के दौरान ही उसने स्‍वीकार कर लिया कि उसने पति को मार डाला है। इसके बाद तो गांव-गांव में हलचल मच गई। हर आदमी कल्‍युगी पत्‍नी को देखने के लिए उमड़ पड़ा। दुर्भाग्‍य पूर्ण स्थिति यह है कि इस कल्‍युगी पत्‍नी ने दो दिनों तक अपने पति की लाश पर रोटियां भी सैंकी। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसका पति के प्रति किस कदर नराजगी थी और प्रेमी के प्रति किस कदर लगाव था। प्रेम की खातिर पूरा परिवार उजड़ गया। 

गुरुवार, 24 मई 2012

जिद और जुनून ने बनाई राह आसान, सिमाला बनी आईपीएस

    जिद और जुनून अगर किसी भी लक्ष्‍य के लिए कर लिया जाये, तो फिर उसे पाना कोई बड़ी कठिन राह नहीं होती है। यही रास्‍ता सिमाला प्रसाद ने भी चुना। रात-दिन की मेहनत और लगातार किताबों की जिंदगी में डूबे रहने से अंतत: आईपीएस बन ही गई। यह मध्‍यप्रदेश के लिए गौरव की बात है कि इस सरजमी की बच्‍ची ने अपने दम-खम पर आईपीएस पाई है। सिमाला ने आईपीएस की राह तक पहुंचने के लिए किसी भी कोचिंग संस्‍थान का सहारा नहीं लिया, बल्कि सेल्‍फ स्‍टडी को सफलता की सीढ़ी माना। भोपाल के बरकतउल्‍ला यूनिवर्सिटी से उन्‍हें सोशियोलॉजी में पीजी के दौरान गोल्‍ड मैडल भी मिला था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जोसफ कोएड स्‍कूल ईदगाह हिल्‍स में हुई उसके बाद स्‍टूडेंट फॉर एक्‍सीलेंस से बीकॉम एवं बीयू से पीजी करने के बाद पुलिस अधिकारी बनने का सपना देखा और इसकी शुरूआत पीएससी की परीक्षा से की। संयोग देखिए कि पहली परीक्षा में ही पीएससी में सिलेक्‍ट हो गई और उनकी पहली नियुक्ति डीएसपी के रूप में हुई। सिमाला को सबसे पहले रतलाम में सीएसपी बनाया गया। यहां पर बड़े अफसरों ने उनकी घोर उपेक्षा की तथा कई बार अपमानित किया। इससे दुखी होकर सिमाला ने एक दिन तय किया कि वे अब आईपीएस बनेगी। रात-दिन नौकरी करते हुए अपनी शिक्षा-दीक्षा को बढ़ाते हुए सिमाला ने सिविल सर्विसेस की तैयारी शुरू की और वर्ष 2011 में उनका आईपीएस में चयन हो गया और अब वे हैदराबाद स्थित इंडियन पुलिस सर्विस अकादमी में ट्रेनिंग ले रही है। सिमाला के माता-पिता भोपाल में हैं। मां जानी-मानी लेखिका पदमश्री मेहरूनिशा परवेज है, तो पिता पूर्व आईएएस अधिकारी भागीरथ प्रसाद हैं। सिमाला की कामयाबी का राज उनके माता-पिता नहीं बल्कि उनकी अपनी शिक्षा-दीक्षा के प्रति जुनून और जज्‍वा है। हर आईएएस पिता की इच्‍छा होती है कि उसका पुत्र भी आईएएस बने, लेकिन ऐसा होता नहीं है फिर भी पूर्व आईएएस भागीरथ प्रसाद की बेटी सिमाला प्रसाद ने वह करिश्‍मा कर दिखाया है, जो कम ही बच्चियां कर पाती है। 
                                   ''जय हो मप्र की''

86 साल बाद मप्र की 23 लोकभाषाओं का सर्वे

हर हाल में परंपरा को बनाये रखने की जिद कायम
        लोकभाषाओं का अस्तित्‍व लगातार समाप्‍त हो रहा है। मप्र में तो लोकभाषाएं अंतिम सांसे गिन रही है। अंग्रेजी और हिन्‍दी ने इन लोकभाषाओं को मटिया-मेट करने में कोई कौर-कसर नहीं छोड़ी है। इसके बाद भी लोकभाषाओं को बचाने के लिए कई स्‍तरों पर काम हो रहा है। राज्‍य में आदिवासी लोक कला परिषद ने प्रदेश की विभिन्‍न आदिवासियों की भाषा, रहन-सहन, गीत, कथाओं और जीवन शैली पर काम किया है। यहां तक कि राज्‍य की लोकभाषाओं के गीतों का बॉलीबुड में भी उपयोग हुआ है। अब 86 साल बाद लोकभाषाओं को सहेजने और उनके विकास के लिए केंद्र सरकार की पहल पर गुजरात की भाषा शोध एवं प्रकाशन संस्‍थान बड़ोदा ने लोकभाषाओं को बचाने का अभियान छेड़ा है। इसके तहत मध्‍यप्रदेश की 23 भाषा और बोलियों का सर्वेक्षण किया जा चुका है तथा वर्तमान में एक दर्जन भाषाओं के सर्वे पर काम किया जा रहा है। इसके पीछे का मकसद यह है कि लोग भाषाओं में बच्‍चों को उन्‍हीं की भाषा में प्राइमरी स्‍तर पर पढ़ाई कराना है। 
हमें कोई देख न ले
          लोकभाषाओं के सर्वे के दौरान आदिवासियों के गीत, कथाएं, जीवन शैली, रंगों, संबंधों, जगह-स्‍थान तथा समय के साथ-साथ इतिहास, भूगोल को ध्‍यान में रखकर भाषाओं के अस्तित्‍व की सच्‍चाई का पता लगाया जा रहा है। मध्‍यप्रदेश में यह काम 50 लोगों की टीम कर रही है। अभी तक इस टीम ने 23 भाषाओं का सर्वे पूरा कर लिया है। जिन भाषाओं का सर्वे पूरा हो गया है उनमें बघेली, भिलाली, गौंड़ी, जादौ, माटी, बंजारी, भदावरी, भीली, ब्रज, बुंदेली, मालवी, नहाल, निमाड़ी, पंचमहली, पवारी, रजपूती, सहरयायी, सिकरवारी, कछवाहघारी, तोरधारी, जटवारी, कोरवी, कोरकू, लोधधारी जैसी भाषाओं का सर्वे पूरा हो चुका है, जबकि हलवी, कोल, खेरा, वेगानी, कंजर, मवासी, वडडर, पाली, लोधी के सर्वेक्षण का काम शुरू किया जा रहा है। दिलचस्‍प यह है कि लंबे समय बाद मप्र की लोकभाषाओं के सर्वे का कार्य हो रहा है। राज्‍य में भी कई स्‍तरों पर बोलियों को लेकर कार्य हुए हैं, लेकिन जिस तरह से सर्वे अब हो रहा है वैसा काम अभी तक नहीं हुआ है।

बुधवार, 23 मई 2012

गांव-गांव में पानी की मारा-मारी और अब सरकार बनायेगी मप्र में जल निगम


       भले ही गांव-गांव में एक-एक बूंद पानी के लिए ग्रामीणजनों को 2 से 5 किलोमीटर दूर तक भटकना पड़ रहा है फिर भी पानी नसीब नहीं हो रहा है। यह तस्‍वीर मप्र की कई हिस्‍सों में बनी हुई है, जहां पर ग्रामीण क्षेत्रों में पानी का संकट लगातार गहरा रहा है। गर्मी के मौसम में तो ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं लंबी दूरी का सफर करने के बाद पानी ला पाती हैं। पानी के स्‍थाई स्‍त्रोत सूख रहे हैं और जो व्‍यवस्‍था पीएचई विभाग ने तैयार की है वह फ्लॉप साबित हुई है। 
अब मप्र की भाजपा सरकार ने 22 मई को मंत्रि परिषद की बैठक में ग्रामीण क्षेत्रों में नये पेयजल स्‍त्रोत तलाशने, पेयजल सप्‍लाई और नल-जल योजना चलाने के लिए मप्र जल निगम गठित करने का फैसला लिया है। यह निगम लोक स्‍वास्‍थ्‍य यांत्रिकी विभाग के अधीन काम करेगा। यूं तो मप्र में कोई तीन दर्जन से अधिक कार्पोरेशन काम कर रहे है जिसमें से अच्‍छे काम करने वाली की संख्‍या बमुश्किल आधा दर्जन भी नहीं है। ऐसी स्थिति में एक नये निगम का गठन करने का क्‍या मतलब है यह समझ से परे है। 

          मप्र में वर्ष 1993 से 2002 के बीच कांग्रेस सरकार ने पंचायतीराज के चलते ग्रामीण क्षेत्र की पेयजल व्‍यवस्‍था लोक स्‍वास्‍थ्‍य यांत्रिकी विभाग से लेकर पंचायत विभाग को सौंप दी थी। तब से अब तक यही व्‍यवस्‍था कायम है। इसके चलते गांव-गांव में पीएचई का आधार-भूत ढांचा पूरी तरह से खत्‍म हो गया है और नलजल योजनाएं पंचायत के हवाले हैं। वर्तमान में केंद्र सरकार का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्‍यक्ति को हर दिन  40 लीटर पानी मिलना चाहिए, लेकिन दस लीटर पानी भी लोगों को नसीब नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्‍थायी पानी के स्‍त्रोत कुएं, बाबड़ी, झील एवं नदियां सूख रही है इनकी तरफ किसी का ध्‍यान नहीं है। वहीं प्रदेश में 4,77,162 हैण्‍डपंप स्‍थापित है जिसमें से 17,564 हैण्‍डपंप बंद पड़े हैं। इनमें से अधिकतर हैण्‍डपंप ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। वैसे तो ग्रामीण नलजल योजना काम कर रही है, लेकिन इसके परिणाम कोई खास नहीं मिले हैं। इससे साफ जाहिर है कि नये निगम के गठन से ग्रामीण क्षेत्र की समस्‍या हल होने वाली नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली एजेंसियों में एक और कार्पोरेशन शामिल हो जायेगा। 
                              ''जय हो मप्र की'' 

मंगलवार, 22 मई 2012

कांग्रेस की राजनीति में मील का पत्‍थर साबित होगी जनचेतना यात्रा

लो मैं आ गया : अब बताओं सरकार कैसे परेशान कर रही है।
           राजनीति  की धारा में बहना हर किसी राजनेता के बस की बात नहीं होती है। कदम-कदम पर षड़यंत्र और पर्दे के पीछे फ्लॉप करने की रणनीति हर राजनेता को तोड़ती है । इसके बाद भी राजनेताओं का जज्‍वां ही कहा जायेगा कि वह अपनी धारा को प्रवाहमान बनाने के लिए निकल पड़ते हैं। फिर न उन्‍हें अपने विरोधियों की चिंता सताती है और न ही षड़यंत्रों की परवाह होती है। उनका मकसद सिर्फ जनता के बीच जाकर अपनी बात कहना है। इन्‍हीं राह पर इन दिनों मध्‍यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह 'राहुल' चल रहे हैं। उनकी जनचेतना यात्रा का एक पड़ाव बुंदेलखंड में पूरा हो गया है। यह यात्रा 135 घंटों में 1430 किमी चली है जिसमें बुंदेलखंड का चप्‍पा-चप्‍पा जाना और समझा है। इस दौरान सिंह को बेहाल किसान मिले, उनकी पीड़ाएं पता लगी, दर-दर भटक रहा किसान अपनी व्‍यथा बताने से नहीं रूके इसके साथ ही योजनाओं में चल रहे भ्रष्‍टाचार के प्रमाण भी मिले। यात्रा के दौरान सिंह ने भाजपा सरकार के खिलाफ जमकर जनता की सभा में ललकारा भी। उन्‍होंने न सिर्फ मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर तीखे प्रहार किये, बल्कि सरकार की कलई भी खोली। जनचेतना यात्रा के 9 दिनों में बुंदेलखंड की 21 विधानसभा सीटों में 250 सभाएं ली इस यात्रा का समापन 19 मई, 2012 को बीना में हुआ। इस मौके पर सिंह ने खुलासा किया कि उन्‍होंने नवंबर 2011 में यह तय कर लिया था कि वे यात्रा पर जायेंगे और जनता को सरकार की कार-गुजारियों से अवगत करायेंगे। इसके पीछे का तर्क यह है कि जब उन्‍होंने अविश्‍वास प्रस्‍ताव विधानसभा में प्रस्‍तुत किया था तब सरकार ने उनके आरोपों पर कोई सार्थक जबाव नहीं दिया था, तब सिंह ने मान लिया था कि यह सरकार कोई भी तर्क-कुतर्क कर सकती है, लेकिन सार्थक जबाव नहीं दे सकती है और इसका सही माध्‍यम जनता ही है। इस यात्रा से कांग्रेस को नई ऊर्जा मिली है और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का अवसर भी मिला। 
इतिहास बना रहे हैं : 
''हर व्‍यक्ति का दर्द मेरा दर्द है''
      यूं तो नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के बारे में आमधारणा  है कि वे सुख सुविधाओं की राजनीति करते हैं और चैम्‍बर से बाहर निकलने में उन्‍हें पीड़ाएं होती है पर इस मिथक को सिंह ने वर्ष 2012 मई महीने में तोड़ ही दिया। जब पूरा प्रदेश गर्मी की तपन से परेशान है तब तपती धूप में सिंह अपनी यात्रा पर निकल पड़े हैं न उन्‍हें धूप परेशान कर रही है और न ही एसी की जरूरत है, बल्कि  उमड़ते जनता का प्‍यार चाहिए अपनी यात्रा का दूसरा पड़ाव भी 23 मई से फिर नीमच से शुरू करेंगे, जो कि 25 मई को जाबरा में समाप्‍त होगा। इस यात्रा से नेता प्रतिपक्ष का राजनैतिक ग्राफ निश्चित रूप से बढ़ा है और वे कांग्रेस की राजनीति में एक चमकते सितारे बनकर उभर रहे हैं। निश्चित रूप से जनचेतना यात्रा मप्र की कांग्रेस राजनीति में मील का पत्‍थर साबित होगी। यात्रा के पहले पड़ाव में बुंदेलखंड पैकेज का मामला उन्‍होंने जोर-शोर से उठाया और इस बात को प्रमाणित करने का प्रयास किया कि बुंदेलखंड पैकेज की राशि भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ गया। केंद्र सरकार ने चार हजार करोड़ की राशि बुंदेलखंड पैकेज के रूप में दी थी, लेकिन यह राशि भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ गई और पूरे बुंदेलखंड में मंत्रियों के नाते-रिश्‍तेदार ठेकेदार बन गये हैं। यह सच है कि बुंदेलखंड से कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का खासा प्रेम है और श्री गांधी बार-बार उन इलाकों में पहुंच भी रहे हैं। जनचेतना यात्रा फिलहाल कुछ दिनों के लिए रूक सकती है, लेकिन यह यात्रा आगामी विधानसभा चुनाव तक चलती रहेगी। ऐसा संकल्‍प नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ले चुके हैं फिर भले ही कितनी ही बाधाएं आये, लेकिन वे रूकेंगे नहीं।





गुरुवार, 26 अप्रैल 2012

फिर केंद्र सरकार को ललकारा शिवराज ने

        मध्‍यप्रदेश के विकास में जब-जब केंद्र सरकार बाधा बनकर खड़ी होती है, तो राज्‍य के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बेचैनी होने लगती है। फिर वे गांधीवादी रास्‍ता अपनाने लगते हैं। मप्र के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन करने का फैसला पहली बार नहीं किया इससे पहले भी दो बार अनशन कर चुके हैं और एक बार पूरी कैबिनेट के साथ दिल्‍ली में प्रदर्शन भी किया जा चुका है। अब इस बार गेहूं के लिए बारदाने नहीं मिलने के कारण संसद भवन में गांधी जी की प्रतिमा के सामने धरने पर बैठने का एलान किया है। निश्चित रूप से मप्र में इस बार समर्थन मूल्‍य पर गेहूं खरीदी में फिर रिकार्ड टूटने का संकेत मिल रहा है। शुरूआती दौर में सरकार ने 55 लाख मीट्रिक टन गेहूं का लक्ष्‍य रखा था, लेकिन जिस तरह से मंडियों में गेहूं की आवक बढ़ी है उससे लगता है कि सरकार 65 लाख मीट्रिक टन तक गेहूं खरीद सकती है। अपार गेहूं खरीदी के बाद सरकार को बारदाने की सख्‍त जरूरत पड़ती है। इसबार प्रदेश की सरकार ने न सिर्फ गेहूं खरीदी का लक्ष्‍य बढ़ाया, बल्कि गेहूं के भंडारण की पुख्‍ता व्‍यवस्‍था भी की है। बारदाने के लिए केंद्र सरकार को 565 करोड़ एडवांस दिये जा चुके हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने 37 लाख बारदाने अभी तक नहीं दिये हैं। मात्र 43 बोरे ही मिल पाये हैं। निश्चित रूप से अगर बोरे नहीं मिलेगे, तो गेहूं गोदाम तक कैसे पहुंचेगा यह एक बड़ी समस्‍या खड़ी हो गई है। मप्र उन बिरले राज्‍यों में शुमार हो गया है, जहां पर गेहूं का उत्‍पादन रिकार्ड तोड़ रहा है। अब तो राज्‍य गेहूं खरीदी में भी हरियाणा, गुजरात, राजस्‍थान से आगे निकल गया है। यह एक शुभ संकेत है कि किसानों की मेहनत रंग ला रही है। मुख्‍यमंत्री एक बार फिर किसानों के मुद्दों को लेकर मैदान में उतर आये हैं। 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

कहां तलाश करें बहुएं मध्‍यप्रदेश में

जीवन भर साथ निभाना
     सामाजिक तानाबाना तेजी से छिन्‍न-भिन्‍न हो रहा है, लोगों का नजरिया संकुचित हो रहा है, जिसका परिणाम परिवारों पर दिख रहा है। आलम यह हो गया है कि अब शादी के लिए बहुएं तलाश करने में लोगों को पसीना आ रहा है। इसकी वजह है लिंगानुपात में जमीन-आसमान का अंतर। इस समस्‍या से देश के कई राज्‍य जूझ रहे हैं और अब मप्र भी इसमें शामिल हो गया है। राज्‍य की भाजपा सरकार ने तो बेटी बचाओ अभियान छेड़ रखा है। राज्‍य के कई हिस्‍सों में लिंगानुपात में बड़ा अंतर है जिसके चलते लोगों को अपने घरों में बहुएं लाने के लिए पड़ौसी राज्‍यों की शरण लेनी पड़ रही है। यहां तक कि बहुएं खरीदकर लाई जा रही हैं। गरीब राज्‍य मप्र में शादियां आज भी समाज के सम्‍मेलनों के जरिए व्‍यापक स्‍तर पर होती है, क्‍योंकि कई परिवार तो शादियां करने की स्थिति में नहीं होते हैं। इसलिए उन्‍हें समाज का मंच स्‍वीकार करना पड़ता है। इस दिशा में भी राज्‍य सरकार ने भी कन्‍यादान जैसी महती योजना शुरू की है जिसके बेहतर परिणाम मिले हैं। इस योजना से अब तक गरीब दो लाख निर्धन कन्‍याओं के जीवन में सुहाग की लकीर खिच गई है। सरकार भी विवाह और ग्रहस्‍थी की शुरूआत के लिए 15 हजार रूपये मुहैया करा रही है। वैसे तो इस योजना का कई स्‍तरों पर विरोध भी हुआ है, लेकिन इसका समर्थन बहुत अधिक है। समाज का एक बड़ा तबका इस योजना के साथ खड़ा है, क्‍योंकि गरीब कन्‍याओं के विवाह के रास्‍ते सरकार ने खोल दिये है। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस योजना के जरिए अपने आपको गरीबों का मसीहा भी साबित करने की कोशिश की है। 
परिचय सम्‍मेलन और शादियां :
आओ साथ रहे
       मध्‍यप्रदेश में दुल्‍हा-दुल्‍हन तलाश करने का मंच आजकल समाज के परिचय सम्‍मेलन भी हैं। समाज की सक्रियता का यह परिणाम है कि हर वर्ग का समाज परिचय सम्‍मेलन कर रहा है जिसमें मुख्‍य रूप से जैन समाज, अग्रवाल समाज, ब्राम्‍हण समाज, स्‍वर्णकार समाज, कतिया समाज, सिरवैया समाज सहित आदि अपने-अपने इलाकों में सम्‍मेलन करके शादियों के लिए दुल्‍हा-दुल्‍हन तलाश कर रहे हैं। इन समाज के कर्ता-धर्ताओं को एक चिंता सताने लगी है कि सम्‍मेलन में युवकों की अपेक्षा युवतियां कम आ रही हैं। यानि जिस परिचय सम्‍मेलन में 50 लड़के आते हैं वहां पर सिर्फ 25 लड़कियां आ रही है। इस चिंता को दूर करने के लिए अब परिचय सम्‍मेलनों में लोगों से बेटा-बेटियों के बीच कोई भेदभाव नहीं करने का शपथ पत्र भरवाया जा रहा है। निश्चित रूप से परिचय सम्‍मेलन एक सार्थक कदम तो है, लेकिन उनकी चिंता भी बाजिब है।

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

सतीप्रथा खत्‍म फिर भी औरत को जलाना बंद नहीं हुआ मप्र में

महिला आयोग की राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष ममता शर्मा : निसंकोच होकर अपना दर्द बताओ
           सतीप्रथा पूरी तरह से खत्‍म तो नहीं हुई है, क्‍योंकि इसके कीटाणू आज भी प्रदेश के कई हिस्‍सों में कायम है, लेकिन इसके विपरीत महिलाओं को जलाना आज भी बादस्‍तूर मप्र में जारी है। महिलाओं को जलाने की घटनाएं अखबारों की सुर्खिया बनती रहती है, कभी दहेज उत्‍पीड़न के नाम पर महिलाओं को जलाया जाता है, तो कभी शारीरिक शोषण पर इंकार करने से महिला को आग के हवाले कर दिया जाता है। अब तो महानगरों की तरह महिलाओं के खूबसूरत चेहरों पर तेजाब फेंककर उन्‍हें विद्रूप किया जा रहा है। हाल ही में एक स्‍कूल टीचर पर तेजाब फेंका गया है। यह सच है कि नगर वधु प्रथा पूरी तरह खत्‍म है, लेकिन बलात्‍कार की घटनाएं बढ़ गई हैं इसके साथ ही अपहरण, तस्‍करी और ऑ‍नर किलिंग ने महिला हिंसा को घिनौने रूप में सामने ला दिया है। यह सारी पी‍ड़ाएं 22 अप्रैल को भोपाल में महिला आयोग की राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष ममता शर्मा के सामने महिलाओं ने जाहिर की। यहां तक कि टीकमगढ़ नगर पालिका की पार्षद रानी ने भी गुहार लगाई कि उन्‍हें नगर पालिका अध्‍यक्ष देहिक शोषण के लिए बार-बार दबाव बना रहा है। यह मामला भाजपा की कार्यसमिति की बैठक ओरछा में भी उठ चुका है। इसके साथ ही महिलाओं के शोषण और अत्‍याचार की ढेरों कहानियां आयोग के सामने बयां की गई। महिला आयोग की राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष ममता शर्मा की यात्रा ने राजनैतिक रंग भी ले लिया है, क्‍योंकि उनकी जनसुनवाई के दौरान मप्र महिला आयोग की अध्‍यक्ष और सदस्‍यों ने शिरकत नहीं की। आयोग की राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष ममता शर्मा का कहना है कि उन्‍होंने सबको बुलाया था। इसके साथ ही उन्‍होंने जोड़ा कि मप्र महिला उत्‍पीड़न और अत्‍याचार में दूसरे नंबर पर है। वहीं दूसरी ओर मप्र महिला आयोग की अध्‍यक्ष उपमा राय का कहना है कि संवैधानिक पद पर बैठी महिला आयोग की अध्‍यक्ष को भोपाल में राजनीति नहीं करनी चाहिए। कुल मिलाकर महिला आयोग जिस मकसद से आया था उसमें कामयाब हो गया है, क्‍योंकि भाजपा सरकार के राज में महिलाओं की स्थिति उजागर करना उनका मकसद था। 
महिलाओं ने यह मामले उठाये : 
  • भोपाल दुग्‍ध संघ में कार्यरत यामिनी गिरी ने कहा कि अधिकारी मुझे रात में फोन कर बुलाते हैं और अनैतिक काम करने के लिए दबाव बनाते हैं। 
  • लोग शिक्षण संचालनालय में कार्यरत रेणु गुलाटी ने कहा कि अवकाश के दिन एक अफसर ने मुझे आफिस बुलाया और मेरे साथ छेड़खानी भी की गई। 
  • मंदसौर की महिला ने कहा कि सालभर पहले गांव के दबंगों ने बलात्‍कार किया, लेकिन आज तक रिपोर्ट नहीं लिखी गई। पति ने भी साथ छोड़ दिया है।  
  • भोपाल की महिला अंजू चौहान ने कहा कि कोख में एक महीने का बच्‍चा था, फिर भी सरकारी जेपी अस्‍पताल में मेरी नसबंदी कर दी गई अब डॉक्‍टर धमकी दे रहे हैं कि 30 हजार रूपये लेकर बच्‍चे को गिरा दो बरना जान से जाओंगी।

रविवार, 22 अप्रैल 2012

मिशन 2013 फतह के लिए भाजपा तलाश रही रास्‍ते मप्र में

जोशी जी आप सही फरमा रहे : यह बात पूर्व सांसद विक्रम वर्मा ने एक बैठक में कही
          भाजपा नेता चिंतन, मंथन और बैठकों के लिए जाने जाते हैं। कोई भी बड़ा मुद्दा सामने आया तो भाजपा के नेता उस पर घंटों चिंतन, मंथन करते हैं और फिर जो निष्‍कर्ष निकलते हैं उस पर अमल भी करते हैं। फिर भले ही जनता उसे स्‍वीकार करें अथवा नहीं। भाजपा नेताओं को यह बीमारी संघ परिवार से लगी है। संघ परिवार चिंतन, मंथन में ही डूबा रहता है। इसको ग्रहण करने में भाजपा ने कोई कौर-कसर नहीं छोड़ी। मप्र में विधानसभा चुनाव में मात्र अब डेढ़ साल का समय बाकी है पर भाजपा अभी से मिशन 2013 फतह करने के लिए हरसंभव प्रयास करने में जुट गई है। कार्यसमिति की बैठकें हर तीन महीने में हो रही है। संगठन और सरकार में तालमेल बनाये रखने के लिए कौर ग्रुप की बैठकें भी लगातार हो रही हैं। इन बैठकों में एक चेहरा अचानक फिर से सक्रिय हुआ है। इस पर मुख्‍यमंत्री को बेहद विश्‍वास है यह चेहरा है भाजपा के महामंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का। तोमर अचानक मप्र की राजनीति में फिर से सक्रिय हो गये हैं। मप्र की राजनीति में अभी तक मुख्‍यमंत्री चौहान का एक छत्र राज भाजपा में कायम है। बीच-बीच में प्रभात झा अपनी ताकत का प्रदर्शन भी कर रहे हैं, लेकिन फिर भी भाजपा में नौ साल बाद भी कोई गुटबाजी फिलहाल तो नहीं है। थोड़ी बहुत नाराजगी और गुस्‍सा होना स्‍वाभाविक है। भविष्‍य की योजनाएं पार्टी बना रही है। सरकार अपने स्‍तर पर लगातार सक्रिय है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं है। विपक्ष सरकार की खामियों पर हमले कर रहा है। अवैध उत्‍खनन और भ्रष्‍टाचार तथा बिगड़ी कानून व्‍यवस्‍‍था एक बड़े मुद्दे राज्‍य में बन गये हैं, इनको लेकर भाजपा के वरिष्‍ठ नेताओं ने अपनी चिंता जाहिर की है। अब इस पर कितना अमल हो पाता है यह तो भविष्‍य ही बतायेगा, लेकिन फिर भी नेताओं ने अपना फर्ज अदा कर दिया है अब इस पर निर्णय सरकार और संगठन को करना है। 



शनिवार, 21 अप्रैल 2012

अफसरों के मंथन पर भी अमृत क्‍यों नहीं निकल रहा मप्र में

बताओ विभाग में क्‍या नया चल रहा  : यह सवाल मुख्‍यमंत्री चौहान ने अधिकारियों से पूछा
             मध्‍यप्रदेश की छवि को देश के अन्‍य राज्‍यों के सामने चमकाने के लिए राज्‍य के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दिल में आग तो बहुत है और वे बार-बार अपने भाषणों में भी जिक्र करते हैं। विकास के नये आयमों को स्‍थापित करने के लिए अधिकारियों से लगातार मंथन करते हैं, उस पर मंत्रियों से फीडबैक लेते हैं, फील्‍ड की कमान स्‍वयं संभाल रखी है, वे हर दिन गांव और सड़कों पर दौरा करते हैं, सरकारी कार्यक्रमों में लाडली लक्ष्‍मी और कन्‍यादान योजनाओं का बखान करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं, इसके बाद भी मध्‍यप्रदेश का विकास जस का तस क्‍यों है यह रहस्‍यमय है। हाल ही में जनगणना की एक रिपोर्ट जारी हुई है जिसमें मप्र में सबसे कम बुनियादी सुविधाएं देने वाला राज्‍यों में शामिल हो गया है। नागरिकों को आज भी शौचालय और शुद्व पानी नहीं मिल रहा है। यह जरूर है कि सीएम ने मुख्‍यमंत्री पेयजल योजना और मर्यादा अभियान चलाया हुआ है जिसमें हर गांव में शौचालय बनाने का लक्ष्‍य है। चौहान की तमन्‍ना है कि मप्र स्‍वर्णिम राज्‍य बने, लेकिन प्रदेश में पिछले छह महीने के दौरान जो घटनाएं सामने आई है, जिससे राज्‍य का विदुप चेहरा सामने आया है। आईपीएस की हत्‍या हो जाना, तहसील पर जेसीबी चलाने जैसी घटनाएं अब आम होती जा रही है। माफिया ने हर क्षेत्र में अपना ढंका बजा रखा है, उनके सामने पुलिस और व्‍यवस्‍था लाचार और असहाय हो गई है। इससे पहले कभी माफिया इतना ताकतवर राज्‍य में नहीं रहा है। वही दूसरी ओर यह भी सच है कि मुख्‍यमंत्री बार-बार लोगों को यह विश्‍वास दिलाते रहते हैं कि माफिया को जड़मूल से खत्‍म किया जायेगा। इसके बाद भी माफिया पनपता जा रहा है। 
मंथन पर अमृत क्‍यों नहीं निकल पा रहा : 
         मुख्‍यमंत्री चौहान लगातार फील्‍ड में दौड़ रहे हैं, अफसरों के साथ मंथन कर रहे हैं, आधी-आधी रात तक बैठकों का दौर चल रहा है। इसके बाद भी अमृत क्‍यों नहीं निकल पा रहा है। विभागों की योजनाएं सड़कों से गायब है, हर विभाग में भ्रष्‍टाचार की कहानियां कभी भी अखबारों की सुर्खिया बनती रहती हैं। अधिकारी और कर्मचारी फील्‍ड में जा नहीं रहे हैं। कितना दुखद है कि करोड़ों रूपया सरकारी विभाग के हर साल लैप्‍स हो रहे हैं उस राशि का कोई उपयोग नहीं हो रहा है। जमाना तेजी से बदल रहा है, लेकिन सरकारी विभाग आज भी अपनी ही रफ्तार से चले जा रहे हैं जिसके फलस्‍वरूप विभागों का अस्तित्‍व संकट में आ गया है। विभागों की योजनाएं अगर जनता तक नहीं पहुंच पा रही है, तो यह कहीं न कहीं सरकार की असफलता तो है, इस दिशा में भी विचार करने की आवश्‍यकता है कि आखिरकार हम कहा असफल हो रहे हैं।