मंगलवार, 8 नवंबर 2011

मध्‍यप्रदेश आज भी अविकसित राज्‍यों में शुमार

बार-बार मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जनमानस में राज्‍य के विकास का सपना तो रोज ही दिखाते हैं निश्चित रूप से नये सपने देखना चाहिए,लेकिन जमीनी हकीकत तो यह है कि राज्‍य अविकसित राज्‍यों में आज भी शुमार हैं। पूर्व राष्‍ट्रपति और वैज्ञानिक अब्‍दुल कलाम भी युवकों के बीच बार-बार यही दोहराते हैं कि सपने तो बढे देखना चाहिए,लेकिन उन्‍हें जमीन पर उतारने की पहल भी करना चाहिए।यहां तक कि अब्‍दुल कलाम ने भी मध्‍यप्रदेश की विधानसभा में विकास के एजेंडों का खुलासा किया था, लेकिन उन पर अमल तो दूर कोई उन पर गौर तक नहीं कर रहा है। राज्‍य का विकास जिस तेजी से होना चाहिए उसमें गति नहीं पकड पा रहा है। हाल ही में पीएचडी0चैम्‍बर ऑफ कॉमर्स की जारी रिपोर्ट के अनुसार देश के दस राज्‍यों में मध्‍यप्रदेश विकास सूचकांक में फिसडडी है। मध्‍यप्रदेश में गरीबी रेखा से जीवन यापन करने वालों का आंकडा 30 प्रतिशत को पार कर चुका है। यही आलम बालिका संरक्षण का है। इसके लिए सरकार तमाम योजनाएं बेटी बचाओ,लाडली लक्ष्‍मी,जननी सुरक्षा योजना,कन्‍यादान सहित आदि चलाई जा रही है,ल‍ेकिन तब भी मध्‍यप्रदेश में शिशु म़त्‍युदर सबसे अधिक बनी हुई है। प्रति व्‍यक्ति आय में भी मध्‍यप्रदेश पिछडा हुआ है। दिल्‍ली राज्‍य की प्रति व्‍यक्ति आय 1 लाख 17 हजार रूपये हैं, जबकि छत्‍तीसगढ और राजस्‍थान की 30 से 40 हजार रूपये है मगर मध्‍यप्रदेश में प्रति व्‍यक्ति आयु 27,250रूपये है। इससे साफ जाहिर है कि मध्‍यप्रदेश की विकास की रफतार कैसी चल रही है, न तो शहरों में विकास हो रहा है और न ही गांव के विकास के सोपान पर चल रहा है। आज भी मध्‍यप्रदेश देश के विभिन्‍न राज्‍यों की अपेक्षा अविकसित राज्‍यों में शुमार है। क़षि आधारित प्रदेश में क़षि अनुत्‍‍पादक है,जिसके कारण राज्‍य में गरीबी विद्यमान है। सात सालों में 23हजार किसानों ने आत्‍महत्‍या कर ली है,पैदावार तो अच्‍छी हो रही है,लेकिन को लागत मूल्‍य आज भी नहीं मिल रहा है। बार-बार किसान सडक पर आंदोलन करने के लिए मजबूर है। सिंचाई के पर्याप्‍त साधन नहीं होने के कारण किसान आज भी जो उत्‍पादन करना चाहता है वह नहीं कर पा रहा है,जिसका असर फसलों पर पड रहा है। मध्‍यप्रदेश से बेहतर विकास छत्‍तीसगढ, महाराष्‍ट्र, राजस्‍थान, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, पंजाब और हरियाणा तथा दिल्‍ली राज्‍य कर रहा है। मध्‍यप्रदेश सडकों का आलम यह है कि एक लाख हजार किलोमीटर सडकें है,जबकि महाराष्‍ट्र में दो लाख 42हजार किलोमीटर सडकें हैं। आज भी प्रदेश में सडकों की स्थिति राष्‍ट्रीय औसत से तीन गुनी कम है। विकास सूचकांक में मध्‍यप्रदेश 0.490है,जबकि गुजरात की स्‍थापना 01मई 1960को हुई और उसका विकास सूचकांक 0.814है। भले ही मध्‍यप्रदेश विकास के मामले में तेज गति से नहीं बढ रहा हो लेकिन आबादी के मामले में जरूर उछाले मार रहा है। 1956 में मध्‍यप्रदेश की आबादी 3 करोड 24 लाख थी, जो कि वर्ष 2011 में बढकर 7 करोड 25 लाख हो गई है। अब आसानी से यह समझा जा सकता है कि राज्‍य का विकास किस दिशा में हो रहा है।
क्‍यों पिछड रहा है राज्‍य :
       जनमानस में विकास की ललक नहीं, भविष्‍य की योजनाओं का अकाल, आर्थिक राजनीतिक,सांस्‍क़तिक और सामाजिक क्षेत्र में भारी उतार-चढाव,विकास को लेकर राजनीतिक इच्‍छा शक्ति का अभाव, प्राक़तिक संसाधनों का दोहन नहीं कर पा रहे, प्रशासन में विकास की कमी, भ्रष्‍टाचार चरम पर, कुशल श्रमिकों का अभाव, सडकों का न होना, शिक्षा के मामले में लगातार पिछडापन, विकास के आधारभूत मानकों को पूरा नहीं कर पा रहे, क़षि उत्‍पादकता भी अपेक्षाक़त कम, आर्थिक विकास थमा, अपराधों में लगातार अव्‍वल।

सोमवार, 7 नवंबर 2011

अब बंदरों की भी होगी नशबंदी



              यूं तो मध्‍यप्रदेश का वन विभाग जंगलों की अवैध कटाई, अवैध उत्‍खनन,वनभूमि पर अवैध कब्‍जे रोकने में नाकाम साबित हो रहा है। कदम-कदम पर विभाग की कलई खुल रही है,लेकिन इस सब से हटकर वन विभाग ने बंदरो की नशबंदी करने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया है। इस योजना पर करोडों रूपये खर्च करने का विभाग का इरादा है। इसके पीछे का तर्क बढा दिलचस्‍प है। कहा जा रहा है कि पर्यटन स्‍थल,पुरातात्विक महत्‍व की ऐतिहासिक धरोहर तथा धार्मिक स्‍थलों पर बंदरों ने आंतक मचा रखा है और आने-जाने वालों को परेशान करते हैं। धर्मशास्‍त्रों के अनुसार बंदरों को भगवान हनुमान जी का दूत माना जाता है। कई धर्म प्रेमी लोग बंदरो को चने खिलाने के लिए दूर-दूर तक जाते हैं। इसी के साथ ही जब-जब पर्यटक अपने पसंदीदा स्‍थलों पर पहुंचते हैं,तो उन्‍हें अपने ईद-गिर्द जंगलों और ऐतिहासिक धरोहारों से कूदते-फादते जब नजर आते हैं,इसका कभी कभी पर्यटक आनंद भी उठाते है, लेकिन जब कभी बंदरों से छेडछाड की जाती है,तो फिर बंदर हमले भी करने लगते हैं। वन विभाग को लगातार शिकायतें मिल रही है कि बंदरो के आंतक से लोग परेशान है। वन्‍य जीव प्रेमियों ने तो बंदरों के उत्‍पात पर नियंत्रण के लिए अपनी-अपनी योजनाएं भी सरकार को भेजी हैं। मप्र में बंदरो की संख्‍या में लगातार इजाफा हो रहा है। इस पर रोक लगाने के लिए वन विभाग ने अब बंदरो की नशबंदी करने की योजना बनाई है,जिसके तहत वन विभाग के आला अफसरो ने वैटनरी लैव के वैज्ञानिकों से चर्चा करके बैक्‍सीन की जानकारियां ली जा रही है। मध्‍यप्रदेश में बंदरो की नशबंदी करना आसान काम नहीं होगा। कोई एक दशक पहले दिल्‍ली सरकार ने भी बंदरों से परेशान होकर उन्‍हें मध्‍यप्रदेश भेजने की पहल की थी,लेकिन आज तक बंद मध्‍यप्रदेश नहीं आ पाये,क्‍योंकि बंदरों को पकडना सबसे जटिल काम है। अब सरकार का वन विभाग बंदरो की नशबंदी करने पर विचार कर रहा है,जो कि सुनने में ही जटिल लग रहा है,तो उसे अंजाम देने में पसीना आना स्‍वाभाविक है अथवा योजना कागजों पर बनकर रह जायेगी।
बंदर और मध्‍यप्रदेश :
राज्‍य में 2004 की जनगणना के अनुसार 3,90,000 बंदर हैं, इनमें से 25 फीसदी ने गांव और शहरों में अपना आसरा बनाया हुआ है। अक्‍सर बंदरों को वन विभाग सतपुडा राष्‍ट्रीय उद्यान,टाईगर रिजर्व भोपाल  वन विहार एवं जंगलों में छोड देते हैं। बंदरों की संख्‍या सबसे अधिक पचमढी, चित्रकूट, ओरछा, खजुराहो, होशंगाबाद, जबलपुर, महेश्‍वर, मैहर, सलकनपुर, मढई, माडव आदि स्‍थानों पर है। बंदरो की नशबंदी पर वन विभाग ने 20 से 30 करोड बजट खर्च की योजना बनाई है। यह योजना 1 लाख बंदरों पर खर्च होगी।
               

रविवार, 6 नवंबर 2011

बीमारियों की चपेट में फंसा मध्‍यप्रदेश

खुशिया और उत्‍सव का दौर अभी थमा भी नहीं था कि अचानक मध्‍यप्रदेश की सरजमी पर बीमारियों का ऐसा जाल फैला कि हर कौनों में लोग बीमार हो रहे हैं। सरकारी और प्राइवेट अस्‍पतालों में मरीजों की संख्‍या में इजाफा हुआ  है। इन दिनों मलेरिया और चिकनगुनिया के मरीज सबसे अधिक मिल रहे हैं। मलेरिया से प्रदेश में अब तक 50मौतें हो चुकी हैं। यह मौते विंध्‍य और मालवा अंचल में हुई हैं। मौतों पर राजनीतिक रोटियां भी सेंकी जा रही है पर यह सच है कि स्‍वास्थ्‍‍य अमला अभी भी नींद से जागा नहीं है। प्रदेश में सीधी,रीवा, झाबुआ,धार,मंदसौर एवं ग्‍वालियर में मलेरिया और चिकनगुनियां का प्रकोप लोगों को अपने जाल में समेट रहा है। चिकनगुनिया बीमारी बुखार के साथ-साथ हाथ-पैर में जकडन पैदा कर रहा है। स्‍वास्‍थ्‍य विभाग एक बार फिर पंगु साबित हुआ है। ग्‍वालियर संभाग से जुडे स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री नरोत्‍तम मिश्रा के इलाके में भी चिकनगुनियां ने दस्‍तक दे दी है,इन इलाकों में करीब इस रहस्‍यमय बीमारी से लगभग 200लोग पीडित हैं,तो झाबुआ जिले के प्रभारी स्‍वास्‍थ्‍य राज्‍यमंत्री महेंद्र हार्डिया भी अपने प्रभार वाले जिले में बीमार लोगों का इलाज नहीं करा पा रहे हैं। यहां से मरीजों ने अन्‍य शहरों में इलाज कराने के लिए जाना शुरू कर दिया है, वहीं मंदसौर में 04, सीधी में 50 मौते होने का दावा नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस जिले में 17बच्चियों की मौत हो चुकी हैं। आदिवासी अंचलों में मलेरिया का ऐसा प्रकोप फैला है कि बूढे, बच्‍चे, महिला उसकी चपेट में आ रहे हैं। सिंह ने सीधी में 03 नवंबर को कलेक्‍टर कार्यालय के सामने धरना भी दिया था और उन गांवों में जाकर हालातों का दौरा भी किया,जहां पर बीमारियों का प्रकोप चरम पर है। इन गांवों में मरीजों को दवाईयां तक नहीं मिल रही हैं। स्‍वास्‍थ्‍य विभाग का जो अमला पदस्‍थ है,वह भी समय पर गांवों में नहीं पहुंच पा रहा है। इसके कारण मरीजों की हालत दिन प्रतिदिन बिगड रही है। प्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी फैलती बीमारियों से हो रही मौतों पर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। इसके बाद भी स्‍वास्‍थ्‍य विभाग का अमला अभी भी नींद से जागा नहीं है और दिन प्रतिदिन बीमारियों से मौतों का ग्राफ बढता ही जा रहा है।
स्‍वास्‍थ्‍य विभाग और मध्‍यप्रदेश में ढांचा :
राज्‍य में स्‍वास्‍थ्‍य व्‍यवस्‍थाएं अक्‍सर चरमाराती रहती हैं। चिकित्‍सकों की कमी एक समस्‍या बन गई है, दवाओं के घोटाले आम बात हो गये हैं, अस्‍पतालों में सुविधाएं नहीं मिलने का राग अब स्‍थाई हो गया है। प्रदेश में जिला अस्‍पताल 50, शहरी सिविल अस्‍पताल 54, सामुद‍ायिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र 70, प्राथमिक स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र 1149 एवं उप स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र 8834 हैं।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

मप्र : नेशनल हाइवे बने राजनीति के अखाडे

मप्र में फैला सडकों का जाल और उन पर सियासत राजनेताओं का शगल बन गया है। हर चुनाव में सडकें मुददा बनती है,खूब हल्‍ला मचता है फिर भी सडके जस की तस हो जाती हैं। इस बात पर कोई सोचने को तैयार नहीं है कि आखिरकार सडकों की गुणवत्‍ता उच्‍चकोटि की क्‍यों नहीं है। प्रदेश के नेशनल हाइवे तो पिछले एक दशक से राजनीति की सियासत पर भेट चढ रहे हैं। इन हाइवे की हालत यह है कि वाहनों का चलना मुश्किल है ही,लेकिन दो पहिया वाहन भी आसानी से चल नहीं पा रहे हैं, क्‍योंकि कदम-कदम पर गहरे गडडे हो गये हैं। इन सडकों पर 20 महीनों से कोई मरम्‍मत नहीं हुई, बारिश के बाद तो इस कदर सडके बदतर हो गई है कि लोगों ने उन मार्गों पर जाना बंद सा कर दिया है अथवा मजबूरी में जाते हैं,तो जाम में फंसना सामान्‍य बात हो गई है। प्रदेश की भाजपा सरकार ने 09 अगस्‍त11 को कैबिनेट की बैठक कर दस नेशनल हाइवे मार्गों को प्रदेश को देने के लिए प्रस्‍ताव पारित कर केंद्र को भेज दिया है, केंद्र सरकार भी इन सडकों को राज्‍य को वापस करने के लिए तैयार हो गई है और पहली किस्‍त में 04राष्‍ट्रीय राजमार्ग प्रदेश को मिलने वाले हैं। सडक विशेषज्ञों का कहना है कि नेशनल हाइवे जितनी देरी से मिलेगे उतना ही समय उनके निर्माण में लगेगा। यहां तक कहा जा रहा है कि 2013 तक सडकों का निर्माण होना संभव नहीं है और तब तक विधानसभा चुनाव आ जायेंगे और एक बार फिर से चुनाव में सडक ही मुददा बनेगी। भले ही आज भी प्रदेश की जनता 2393 किलोमीटर लंबे खराब मार्गों से गुजरने को विवश है,लेकिन सरकार अपने ढंग से सडकों पर राजनीति कर रही है और केंद्र सरकार भी चुनाव का इंतजार कर रही है। अब जनता को घटियां सडकों पर चलने के अलावा कोई रास्‍ता नहीं है। कांग्रेस और भाजपा अपनी-अपनी सियासत करने में पीछे नहीं है। जय हो मध्‍यप्रदेश की ।
                                                              

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

गांव की बेटी का कमाल : फयूल से उडेगा रॉकेट

आजकल बेटियां कमाल कर रही हैं,चाहे वह हवा में उड रही हो या शिक्षा के मैदान में बाजी मार रही हो। उनकी दौड लगातार सतत जारी है। मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी बेटी बचाओ अभियान का शंखनाद करके यह एहसास कराया है कि वे न सिर्फ सरकार चला रहे हैं, बल्कि उनका सामाजिक सरोकार भी अव्‍वल है। राज्‍य के कोई आधा दर्जन से अधिक जिलों ने लिंगानुपात ने उन्‍हें परेशान कर डाला है,जिसके चलते वे 'बेटी बचाओ अभियान'में कूद पडे हैं। बेटियां जहां भी है, वह अपने-अपने स्‍तर से धूम मचा रही हैं। मप्र के होशंगाबाद जिले के एक छोटे से कस्‍बे‍ सिवनी मालवा में रहने वाली मध्‍यम परिवार की बेटी मोनिका मालवीय ने वह कमाल कर दिखाया है,जो कि अपने आप में बेमिशाल है। मोनिका ने फार्मूले से बने फयूल से अब राकेट आसमान में बिना प्रदूषण के उड सकेगा। मोनिका ने अपना फार्मूला नासा, यूएसए, आईआईआईएसटी चेन्‍नई, आईआईआईएसटी तमिलनाडु, आईआईटी मुंबई, आईआईटी चेन्‍नई को भेजा था, जहां सघन परीक्षण के बाद फार्मूले को सफल पाया गया। इस पर आईआईएसटी चेन्‍नई ने जनवरी 2012में मोनिका को दिल्‍ली में नेशनल अवार्ड से सम्‍मानित करने का निर्णय लिया है। मोनिका बताती है कि उसका फार्मूला बायोकैमिकल पर आध‍ारित है,जो कि ग्‍लोबिल वार्मिंग की समस्‍या का समाधान करेगा। इस फयूल से आसमान में उडने वाले राकेट, मिसाइल आदि में प्रयुक्‍त होने वाले ईधन के कारण धरती पर होने वाले प्रदूषण को रोकेगा, इस फयूल से प्रदूषण वातावरण की रक्षा तो होगी ही, साथ ही तापमान भी नियंत्रित रहेगा।

बुधवार, 2 नवंबर 2011

जय हो मध्‍यप्रदेश

        शांति के टापू के नाम से विख्‍यात मध्‍यप्रदेश का 56वां जन्‍मदिवस पर प्रदेश की राजधानी भोपाल जश्‍न में डूबा रहा। पूरे राज्‍य में रंग बिरंगी   साज-सज्‍जा के साथ नये संकल्‍पों और इरादों की शपथ ली गई। भोपाल में फिल्‍म अभिनेत्री हेमा‍ मालिनी ने ऩत्‍य नाटिका दुर्गा की प्रस्‍तुत‍ि में दर्शकों का मन मोह लिया। इस मौके पर नारी की सर्जना और सामर्थ्‍य पर केंद्रित कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। लेजर शो बेटी पर केंद्रित था,जिसमें देश की प्रख्‍यात महिलाएं सोनल मानसी, कल्‍पना चावला, साइना नेहवाल, गिरजा देवी, लता मंगेश्‍कर, तीजन बाई, ब‍छेंद्री पाल, मदर टेरेसा, मीरा बाई और प्रतिभा सिंह पाटिल जैसी महिला किरदारों के व्‍यक्तित्‍व से दर्शकों को रूबरू कराया गया। इसके पीछे का संदेश यह था कि महिलाएं बेटियां थी और आज की बेटिया भी अपना एक अलग मुकाम बना सकती हैं। पूरे कार्यक्रम में मध्‍यप्रदेश गान,सुख का दाता,सबका साथी गाकर लोगों का मन मोह लिया। पार्श्‍व गायिका आशा भोसले का जादू भी खूब चला। ताई की आवाज का जादू देर रात तक चलता रहा। सूबे की सालगिरह का जश्‍न वक्‍त की दहलीज पर सपनों के तारे खूब टम-टमाये। जय हो मध्‍यप्रदेश की गूंज के बीच राजनीति भी हुई। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कर्मचारियों को तौहफे ही तौहफे की झडी लगा दी। लंबे समय से की जा रही मांग के तहत अब साढे चार लाख कर्मचारियों को अग्रवाल वेतन आयोग की अनुशंसाओं का लाभ मिलेगा। इससे कर्मचारियों को कई स्‍तरों पर लाभ होना है। सरकार के खजाने पर 400करोड का बोझ आयेगा, लेकिन तब भी सरकार ने 01 नवंबर, 2011 से लागू करने का फैसला कर लिया है। निश्चित रूप से यह चुनावी रथ यात्रा पर सवार होने से पहले मुख्‍यमंत्री ने कर्मचारियों का दिल जीत लिया है,वही दूसरी ओर हताश और निराश विपक्ष अपना वही पुराना राग आलापता नजर आया कि सरकार हर मोर्चे पर असफल है। कांग्रेस पार्टी ने स्‍थापना दिवस मनाने का विरोध कर अच्‍छी परंपरा की शुरूआत नहीं की। राज्‍य का स्‍थापना दिवस किसी एक पार्टी का उत्‍सव नहीं था,बल्कि इसमें सहभागिता प्रत्‍येक नागरिक की होती है। राज्‍य अपने 55 साल की उम्र पूरी कर अब 56 साल में प्रवेश कर गया है। निश्चित रूप से नये इरादों और संकल्‍पों के पूरे होने की शुरूआत है।           
                                    

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

विकास के नये पायदान पर खडा होगा मध्‍यप्रदेश

Bhedaghat, a small village of Jabalpur district, is located on the banks of river Narmada and widely famous for its marble rocks towering in glittering grandeur.
        आज का दिन मध्‍यप्रदेशवासियों के लिए खुशियों का पैगाम लेकर आया है। राज्‍य आज 56वां जन्‍म दिन माना रहा है। जश्‍न में डूबे प्रदेश ने  55साल का सफर पूरा कर लिया है। हमें नये संकल्‍पों की शपथ लेना है और ऐसी राह बनाना है, जिसमें राज्‍य देश में नक्षत्र की भांति चमके। निश्चित रूप से प्रदेश प्राक़तिक और नैसर्गिक संसाधनों से भरा हुआ है,इसके उपयोग की आवश्‍यकता है और समय-समय पर इस माध्‍यम से राह भी तलाशी जा रही है। इसके अलावा भी कई अन्‍य क्षेत्रों में प्रदेश करने और उन्‍हें समझने की आवश्‍यकता है। वैसे तो जन्‍मदिन के दिन चुनौतियों पर बात करने की जरूरत नहीं होती है,लेकिन जब हम नये सपनों के संकल्‍प ले रहे हैं,तो आने वाली विकट चुनौतियों पर विचार करने की आवश्‍यकता तो है। राज्‍य में एक नहीं अनंत चुनौतियां है,जो कि हमारे सामने मुहं बाये खडी है, जिसमें अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बढती कटटरता,रोजगार के साधनों का टोटा,बुनियादी सुविधाओं के लिए आज भी तरसते लोग,न  थमता पलायन सहित आदि हैं। यह सच है कि विकास के विविध आयामों पर राज्‍य एक कदम आगे बढा है,लेकिन अभी भी विकास के नये फलक हमें छूना है,जिनका हम सबको बेशबरी से इंतजार है,क्‍योंकि हमारे सामने पैदा हुए राज्‍य आज न सिर्फ विकास के नये मापदंड स्‍थापित कर रहे है, बल्कि विकास की दौड में तेज रफतार से लगातार उंचाईयां छू रहे हैं। इस दिशा में अब मप्र भी किसी से कम नहीं है। विकास की ललक धीरे-धीरे लोगों में पैदा हो रही है और वह दिन दूर नहीं है जब हम विकास के नये पायदान पर खडे होंगे।

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

मध्‍यप्रदेश का 55 साल का सफर : जश्‍न ही जश्‍न

       धीमी-धीमी रफतार से विकास की चल रही गाडी के फलक  पर मध्‍यप्रदेश 01 नवंबर 2011 को राज्‍य 55 साल का सफर पूरा कर लेगा। हर साल की भांति इस वर्ष भी जश्‍न ही जश्‍न की तैयारियां है। वर्षों बाद मध्‍यप्रदेश की सालगिरह जोर-शोर से मनाने का सिलसिला भाजपा सरकार में रफतार पकडा है। भले ही विकास की ललक अभी भी आम आदमी में मौजू नहीं है, लेकिन नेत़त्‍वकर्ताओं में राज्‍य को लेकर जज्‍वां पैदा होने लगा है। अब विकास पर बहस होने लगी है, नेत़त्‍व से सवाल-जवाब होने लगे है, पिछले एक दशक में केंद्र की राजनीति में मध्‍यप्रदेश नक्षत्र की भांति चमक रहा है। राज्‍य की उपेक्षा पर केंद्र से सवाल जवाब किये जा रहे हैं। इस बार जश्‍न में शामिल होने के लिए जानी-मानी गीतकार आशा घोसलें और फिल्‍म अभिनेत्री हेमा मालिनी भोपाल आ रही  हैं। हर साल की तरह भोपाल में ही लाल परेड मैदान पर जबर्दस्‍त जश्‍न होगा। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहल पर राज्‍य की सालगिरह का केंद्रित विषय बेटी बचाओ अभियान है। चौहान हर साल किसी न किसी विषय पर केंद्रित सालगिरह मनाते है। इससे पहले जल संरक्षण,हरियाली महोत्‍सव, गांव में स्‍वच्‍छता एवं सफाई अभियान, उर्जा संरक्षण एवं बिजली का व्‍यय रोकना,नशा-मुक्ति सहित आदि शामिल हैं। चौहान पहले मुख्‍यमंत्री है,जिन्‍होंने आओ मध्‍यप्रदेश बनाये का अभियान छेडा है,इस अभियान में वे लगातार लोगों से मिलकर संवाद करते हैं। निश्चित से मप्र की विकास गति जिस रफतार से होनी चाहिए थी,उसमें कहीं न कहीं खामी है तभी तो मप्र के बाद बने राज्‍य हरियाणा, पंजाब और गुजरात आज देश के फलक पर चमक रहे हैं,जबकि मप्र अभी भी पिछडा राज्‍य की संज्ञा से नबाजा जाता है। इस दिशा में राज्‍य को अभी भी कई आयाम स्‍थापित करना है,जिसकी पहल शुरू हो चुकी है।

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

मध्‍यप्रदेश में असंतुलित विकास से पनप रहा असंतोष

         असंतुलित विकास के पहिए ने मध्य‍प्रदेश में भीतर ही भीतर असंतोष का पहिया तेजी से घूम रहा है। महानगरों और शहरों की चमक के सामने गांव फीके और असहाय नजर आते हैं। जहां एक ओर विकास का पैमाना समान रूप से स्‍थापित करने के सपने तो दिखाये जा रहे हैं,लेकिन उनमें भी हमारे-तुम्‍हारे की भावना प्रबल हो रही है। इसके चलते विभिन्‍न इलाकों में ऐसी समस्‍यायें जन्‍म ले रही है,जो कि भविष्‍य में विकराल रूप ले सकती हैं। असंतुलित विकास में नेत़त्‍व कर्ताओं की अहम भूमिका है,जो कि अपने नजरियें से विकास के पैमाने तय नहीं कर रहे हैं,बल्कि कहीं ओर से संचालित हो रहे हैं,इसके फलस्‍वरूप बुनियादी सुविधाएं तो नागरिकों को मिल ही नहीं रही है, बल्कि बिजली की आंख मिचौली और उबड-खाबड सडकों से दिन-प्रतिदिन रूबरू होना पड रहा है। इसके साथ ही शहरों और गांवों के बीच नवपूंजीवाद तेजी से पनपा है,जो कि शोषण की सारी सीमाएं लांघ रहा है,जिसके फलस्‍वरूप पलायन का ऐसा खेल शुरू हुआ है,जो कि मनरेगा जैसी योजनाएं भी रोक नहीं पा रही है। असंतुलित विकास के पीछे का मूल कारण राजनेताओं को माना जाता है,लेकिन कही-कही उन बुद्विजीवियों और समाजसेवियों पर भी सवाल उठ रहे हैं कि वे समान विकास की पैरवी क्‍यों नहीं कर रहे हैं। विकास में जमीन आसमान का परिवर्तन किसी भी शहर और कस्‍बे में मध्‍यप्रदेश में देखा जा सकता है। यह सच है कि निजी संस्‍थाऐं तेजी से अपने पांव पसार रही है,जो कि अपने हिसाब से लोगों को सपने बेच रहे हैं। सबसे दुखद पहलू तो यह है कि मप्र में आर्थिक विकास थम सा गया है। रोजगार तो नादारद ही हैं।

बुधवार, 26 अक्टूबर 2011

दीप पर्व :: नई राह पर चले मध्‍यप्रदेश

          रोशनी का पर्व दीपावली का जश्‍न चहुओर जोर-शोर से मन रहा है मध्‍यप्रदेश की सरजमी पर भी उत्‍साह के साथ उत्‍सव मनाया जा रहा है। पांच दिन बाद मध्‍प्रदेश का स्‍थापना दिवस है। 01 नवंबर 1956 को राज्‍य स्‍थापना हुई थी, इसलिए दीप पर्व से ही हमको मध्‍यप्रदेश को नये सिरे से गढने का संकल्‍प लेना चाहिए। नई राह पर राज्‍य चले, जो कमजोरियां और खामियां है, उन्‍हें दूर कर ऐसा वातावरण बने कि प्रदेश देश के फलक पर चमके। निश्‍िचित रूप से मध्‍यप्रदेश ने अपनी लंबी यात्रा के दौरान कई पडाव पार कर लिये है फिर भी नेत़त्‍व का जो विश्‍वास जनता पर होना चाहिए, उसकी कमी आज भी नजर आती है, जिसके फलस्‍वरूप लोगों में विकास की ललक गायब है। हमसे पहले जिन राज्‍यों ने जन्‍म लिया आज वे देश में अपना एक नया मुकाम हासिल किये हुए है, लेकिन हम आज भी बुनियादी सुविधाओं के मकडजाल से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। रोशनी का पर्व खामियां और कमजोरिया गिनने का नहीं है इसलिए हम सबको एक नये राज्‍य की परिकल्‍पना गढने का न सिर्फ संकल्‍प लेना चाहिए, बल्कि उसके लिए जो संभव हो सके, उस दिशा में प्रयास भी करें। जय हो मध्‍यप्रदेश की।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

पति ने सौंपी प्रेमी को अपनी पत्‍नी


प्रेमी के साथ वंदना : अब मंजिल मिली 

पति मुकेश : कोई पीडा नहीं

             प्रेम के लिए कोई भी कुर्बानी जायज है। शादी-शुदा महिला ने अपने परिवार और संस्‍कारों को प्रेमी के आगे कुर्बान कर दिया। यही कुर्बानी मध्‍यप्रदेश के विदिशा जिले के गंजबासौदा तहसील के अधीन आने वाले ग्राम ठर्राका में एक अजीव घटना ने सबको चौकाया है। इस गांव के युवक मुकेश सिंह राजपूत ने अपनी पत्‍नी वंदना को उसके प्रेमी देवेंद्र सिंह राजपूत के हवाले कर दिया। पति की पीडा यह है कि शादी के तीन साल बाद भी पत्‍नी बार-बार अपने प्रेमी की याद करती थी, यहां तक कि जब तब वह गांव में ही प्रेमी से मुलाकात भी करती थी,इसकी भनक सारे गांव को लग गई थी,जब पति ने पत्‍नी को अपने प्रेमी से मिलने से रोका तो पत्‍नी ने जहर खाकर आत्‍महत्‍या का प्रयास किया। इस घटना के बाद भी पत्‍नी ने अपने प्रेमी से मिलना-जुलना नहीं छोडा। दोनों प्रेमी-प्रेमिकाओं का यह मिलन शादी से पहले भी चल रहा था, लेकिन 12 अक्‍टूबर, 2011 को जब शादी शुदा महिला वंदना अपने प्रेमी के साथ भागने की तैयारी कर रही थी, तब पति ने उसे स्‍टेशन पर पकडा और पुलिस थाने लाकर,पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में पत्‍नी को प्रेमी के हवाले कर दिया। इसमें दिलचस्‍प पहलू यह है कि पति मुकेश ने अपनी पत्‍नी के खिलाफ थाने में कोई आरोप नहीं लगाया और न ही एफआईआर में कोई शिकायत की,बल्कि स्‍वेच्‍छा से पत्‍नी को प्रेमी के हवाले कर दिया। इस दिलचस्‍प कहानी की चर्चा विदिशा जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है।

सोमवार, 12 सितंबर 2011

सुषमा स्‍वराज के इलाकों में तालाब बने गांव

   लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्‍वराज मध्‍यप्रदेश के विदिशा संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्‍व करती है, पर इन दिनों उनके क्षेत्र के विभिन्‍न गांव बाढ की विभीषका से जूझ रहे हैं। तालाब गांव बन गये हैं, जोरदार बारिश ने जन-जीवन अस्‍त-व्‍यस्‍त कर दिया है। ग्राम साचेत में नदी का पानी भरने से ग्रामीणजन परेशान हो रहे है। गांव में गले-गले तक पानी भर गया है। महिलाओं को पीने का पानी कुओं से लाने के लिए गले तक भरे पानी से गुजरना पड रहा है। इससे पहले यह सूचना आई थी कि इन इलाकों के बच्‍चे बारिश के दौरान जब नदी-नालों में पानी उफान पर होता है, तब स्‍कूल जाने के लिए रस्‍सी बांध कर पानी पार करना पडता है। यह आलम जब मध्‍यप्रदेश में भाजपा सरकार होने के बाद भी नेताप्रतिपक्ष सुषमा स्‍वराज के संसदीय क्षेत्र में है, तो फिर राज्‍य के अन्‍य हिस्‍सों में क्‍या स्थिति बारिश के दौरान बनी होगी यह आसानी से समझा जा सकता है।
 ''जय हो मध्‍यप्रदेश की''

शनिवार, 10 सितंबर 2011

खुशी जाहिर करने का जरिया 'ऩत्‍य'

          खुशी और उत्‍सव जाहिर करने का जरिया  'ऩत्‍य' है। मध्‍यप्रदेश में ऩत्‍य को लेकर संस्‍क़ति विभाग समय-समय पर आयोजन करता है, लेकिन राज्‍य की प्रतिभाएं राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उभर नहीं पा रही हैं। खजुराहो महोत्‍सव तो ऩत्‍य पर ही फोकस होता है। ऩत्‍य एक मुक्ति है, उर्जा का गतिमान वलय है, भीतर के दुखों का विरेचन है। सर्वोच्‍च के सम्‍मुख संपूर्ण समर्पण है। लोग कभी अपने प्रेम को दर्शाने के लिए ऩत्‍य करते, तो कभी अपने डर को, कभी हमारी आशाएं इसका रूप बनती है, तो कभी-कभी हमारी कल्‍पनाएं इसको जन्‍म देती है। ध्‍वनि, रोशनी, रंग और ताल के मेल से बनी यह कला। हमारी भावनाओं का व्‍यक्‍त करने का एक बहुत ही सुंदर माध्‍यम है। असल में ऩत्‍य तो व्‍यक्ति की आत्‍मा की गति है। 108 प्रकार के शास्‍त्रीय ऩत्‍य नाटयशास्‍त्र से उभर हैं, जो कि योग की भंगिमाएं हैं। भगवान शिव को भारतीय ऩत्‍य का गुरू माना गया है। इसलिए उन्‍हें नटराज भी कहा जाता है, पर मध्‍यप्रदेश में अभी ऩत्‍य पर काफी काम होना बाकी है।

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

मध्‍यप्रदेश : घर-घर में मंगलमूर्ति के जयकारे

मध्‍यप्रदेश में घर-घर और गली-गली में मंगलमूर्ति जय गणेश देवा के जयकारे गुरूवार से गूंजने लगे हैं। घर-घर में गणेशजी के आगमन के साथ ही उत्‍सव और त्‍यौहारों का सिलसिला शुरू हो गया। यूं तो राज्‍य के हर हिस्‍से में गणेश उत्‍सव की धूम है, विशेषकर मालवा अंचल में गणेश पर्व जोर-शोर से मनाया जाता है। इसकी झलक अब शहरों और कस्‍बों में भी दिखने लगी है। मीडिया ने  गणेश उत्‍सव को जीवन प्रबंधन के गुरू के रूप में वैलकम किया। गणेश उत्‍सव के पहले दिन दैनिक समाचार पत्रों में लिखा है कि यह उत्‍सव सिर्फ अध्‍यात्‍म और आराधना ही नहीं है,बल्कि शुद्व आचरण, बुद्वि, सामंजस्‍य, सामाजिक सदभाव और जीवन प्रबंधन भी हैं। वैसे तो गणेश उत्‍सव पर्व वर्षों से मनाया जा रहा है। दिन प्रतिदिन इस पर्व में व्‍यवसायिकता और बाजारवाद की झलक भी दिखने लगी है, लेकिन गणेश उत्‍सव और उत्‍सव से मानने का चलन का कारवा बढता ही जा रहा है। गणपति बप्‍पा मोरया।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

मध्‍यप्रदेश में क्‍यों नहीं आ रहे एनआरआई


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विमान सेवाओं में पिछडा मध्‍यप्रदेश

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गुरुवार, 25 अगस्त 2011

सडकों के निर्माण के लिए नहीं मिल रहे हैं मजदूर

        
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बुधवार, 24 अगस्त 2011

मध्‍यप्रदेश में हर तरफ अन्‍ना की आंधी


       
        यूं तो मध्‍यप्रदेश शांतिप्रिय राज्‍य है, यहां पर आंदोलन, धरना प्रदर्शन कम ही होते हैं, विशेषकर भाजपा समय-समय पर केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन का रूख अख्तियार करती है,जबकि कांग्रेस मुख्‍य विपक्षी दल है, पर वह आंदोलन से कतराती रही है। राज्‍य में पहली बार अन्‍ना की आंधी ऐसी चल रही है कि शहरों,कस्‍बों और गांवों में भी जन समुदाय हाथों में तिरंगा लेकर वंदेमातरम के जयकारे कर रहे है। अन्‍ना समर्थकों का न तो कोई नेत़त्‍व कर रहा है और न ही इन आमजनों के साथ कोई समाजसेवी मैदान में है। लोग अपने आप घरों से निकल रहे हैं और अन्‍ना के समर्थन में कही कैंडल मार्च हो रहा है,तो कहीं पर रैली और जुलूस निकाले जा रहे है। पिछले आठ दिनों से यह सिलसिला लगातार जारी है। मीडिया में भी इन प्रदर्शनों को पर्याप्‍त महत्‍व मिल रहा है। अन्‍ना समर्थकों ने भाजपा और कांग्रेस सांसदों के निवास पर भी धरना प्रदर्शन करके जनलोकपाल विधेयक के पक्ष में सांसदों से पत्र लिखवाये जा रहे हैं। भाजपा सांसद नरेंद्र सिंह तोमर का अपने क्षेत्र में निवास और बंगला नहीं होने से लोगों ने ग्‍वालियर में ही एक झुग्‍गी बनाकर धरना दिया,तो इंदौर में कांग्रेस सांसद प्रेमचंद्र गुडडू व सज्‍जन सिंह वर्मा ने प्रदर्शन के थोडी देर बाद ही जनलोकपाल विधेयक पर सहमति पत्र देकर अन्‍ना समर्थकों को गद-गद कर दिया तो भोपाल के सांसद कैलाश जोशी प्रदर्शनकारियों पर खफा हो गये, लेकिन फिर भी वंदेमातरम की गूंज उनके बंगले के आसपास होती रही,तब जोशी को भी मजबूर होकर अन्‍ना समर्थकों से चर्चा करनी पडी। नर्मदा बचाओं आंदोलन की नेत्री मेघा पाटकर और विधायक डॉ0सुनीलम की अगुवाई में 23अगस्‍त को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पर प्रदर्शन किया गया। इस दौरान काफी तादाद में दलित और आदिवासी वर्ग मौजूद था। कुल मिलाकर अन्‍ना हजारे के समर्थकों का जुनून थम नहीं रहा है,जो कि लगातार फैलता ही जा रहा है,इससे साफ जाहिर है कि मध्‍यप्रदेश में भी लोग भ्रष्‍टाचार से कभी खिन्‍न है और वे अन्‍ना की अलख में कदमताल कर रहे है।

बुधवार, 17 अगस्त 2011

अन्‍ना की आंधी मध्‍यप्रदेश में भी गूंजी

         गांधीवादी बुजुर्ग अन्‍ना हजारे की आंधी मप्र में ऐसी गूंजी की चारों तरफ अन्‍ना ही अन्‍ना का शोर-गोल सुनाई दे रहा है। हर तरफ हाथों में तिरंगा झण्‍डा लिये नौजवानों की टोलियां चौराहों और गलियों में घूम रही हैं। राष्‍ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत लोगों का हुजूम यह बता रहा है कि भ्रष्‍टाचार को लेकर अब लोग आर और पार की लडाई लडने के मूड में आ गये हैं। अमूमन प्रदेश में राष्‍ट्रीय घटनाओं का असर होता है,लेकिन लंबे अरसे बाद एक गैर राजनीतिक शख्सियत अन्‍ना हजारे के आहवान पर 16 अगस्‍त को राजधानी में आधा दर्जन से अधिक स्‍थलों पर टुकडो-टुकडों में लोगों ने धरना प्रदर्शन में हिस्‍सा लिया तो रात में मशाल जूलुस निकाला। इन सभी स्‍थानों पर नौजवानों की अच्‍छी खासी भीड नजर आई। प्रदेश में 90 के दशक से दो बडे आंदोलन लोगों ने देखे हैं,जिसमें राम मंदिर और आरक्षण आंदोलन शामिल हैं। इन दोनों आंदोलनों में जन समुदाय की भागीदारी थी,जो कि अब भ्रष्‍टाचार के खिलाफ एक बार फिर साफतौर पर नजर आ रही है। टीवी के एक पत्रकार ने चाय पीते हुए कहा कि पिपरियां जैसे छोटे से गांव में एक दर्जन लोगों की गिरफतारी यह साबित कर रही है कि भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लोग मैदान में ताल ठोककर आ गये है। राज्‍य मे स्‍वयंसेवी संगठनों की संख्‍या तो हजारों में है,लेकिन अन्‍ना की मुहिम ने वहीं एनजीओ सामने आ रहे हैं, जो कि सरकारी मदद की दरकार के मोहताज नहीं है, वे तो अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं। एनजीओ सर्किल में खासी अहम भूमिका अदा कर रहे सचिन जैन कहते हैं कि मध्‍यप्रदेश में अन्‍ना की आंधी चल पडी है और लोग अपने आप सडकों पर आ रहे हैं। निश्चित रूप से अन्‍ना का आंदोलन एक नये पडाव की ओर बढ रहा है,जो कि समाज को एक नई दिशा देगा। इसमें मध्‍यप्रदेश की भी अहम भूमिका होगी। जय हो मध्‍यप्रदेश की।

रविवार, 14 अगस्त 2011

भोपाल की हरियाली लुभा रही अमिताभ को

         इस सदी के महानायक और परंपराओं से हटकर जिदंगी जीने वाले अमिताभ बच्‍चन को मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल की हरियाली लुभा रही है। यूं तो बच्‍चन का इस शहर से गहरा नाता रिश्‍ता है। कोई चार दशक पहले अमिताभ की ससुराल भोपाल में हुई थी तब वे यदा-कदा आया भी करते थे, लेकिन तब उन्‍होंने भोपाल को निकट से नहीं देखा, लेकिन वर्ष 2010 में आरक्षण फिल्‍म की शूटिंग में बार-बार भोपाल आने से उन्‍हें यहां की खूबसूरती ऐसी लुभा रही है कि वे इसे भुला नहीं पा रहे हैं। यह सच है कि अमिताभ बच्‍चन को अच्‍छा लगता है, उसे स्‍वीकार करने में वे एक पल की भी देरी नहीं लगाते हैं। 69 की उम्र में उर्जा से भरपूर महानायक अमिताभ बच्‍चन की आरक्षण फिल्‍म भी भोपाल में तो अच्‍छा बाजार दे रही है और प्राचार्य की भूमिका में अमिताभ ने उल्‍लेखनीय काम भी किया है। आज भी अमिताभ बच्‍चन की सास श्रीमती भादुडी भोपाल में ही निवास करती हैं। इसके चलते कभी-कभी बच्‍चन की गोपनीय यात्रा भी पत्‍नी जया बच्‍चन के साथ हो ही जाती है। भोपाल की खूबसूरती और हरियाली एवं झीलों का आकर्षण के दीवाने सदी के महानायक अमिताभ बच्‍चन हैं, तो भोपाल पर गर्व होना स्‍वाभाविक है।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

उन्‍मादी हमले में पुलिस अफसर की आंख पर निशाना

                 मध्‍यप्रदेश में उन्‍मादी और सांप्रदायिक तत्‍वों के हौसले लगातार बढ रहे हैं। अब उनके निशाने पर खाकी बर्दी भी आ गई है। बर्दी से खौफ के खत्‍म होते ही उन्‍मादी तत्‍वों के हौसले इस कदर बढ गये हैं कि पुलिस के एक आला अधिकारी की आंख पर भी निशाना साधा है, जिसके चलते 10 और 11 अगस्‍त को भोपाल के इतवारा इलाके में दो वर्गों के बीच हुए सांप्रद‍ायिक संघर्ष में उपद्रवियों ने पुलिस पर भी हमला बोला। पुलिस वाहन को आग के हवाले किया। इसके चलते भोपाल नार्थ एसपी अभय सिंह की आंखों में गंभीर चोटें आई हैं। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की विशेष पहल पर इस अधिकारी को चैन्‍न्‍ाई के शंकर नेत्रालय में भर्ती कराया गया है,जहां पर 12 अगस्‍त को ऑपरेशन हो गया है। अभी भी चिकित्‍सक यह कहने की स्थिति में नहीं है कि अधिकारी की आंख पर कितना असर हुआ है। इस प्रसंग से एक बार फिर स्‍पष्‍ट हो गया कि राज्‍य में सांप्रदायिक तत्‍व हावी हो रहे हैं। यह चिंता का विषय है। सरकार को इस दिशा में सार्थक पहल करना चाहिए अन्‍यथा भविष्‍य में भयानक परिणाम के दस्‍तक मिल रहे है। पिछले सात वर्षो में सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला थम नहीं रहा है,राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेक रहे हैं। आम आदमी इसका शिकार हो रहा है,प्रशासन परेशान है। कोई न कोई रास्‍ता निकाला जाना चाहिए अन्‍यथा विकास का दौडता पहिया भी थम जायेगा, जो प्रदेश के लिए शुभ नहीं है।

सोमवार, 20 जून 2011

हाथ फिर सडक पर आया

    
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     वैसे तो मध्‍यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा ही मुख्‍य दल हैं, लेकिन इन दलों को अगर कोई चुनौती दे सकता है, तो वह है मद-मस्‍त हाथी, जो कि पिछले दो वर्षो से शां‍त-चित होकर बैठा हुआ था, लेकिन हाथी की चाल फिर से तेज होने के आसार नजर आने लगे हैं। इस हाथी को जगाया है, उनकी पार्टी की मुखिया सुश्री मायावती ने। 19 जून को पार्टी कार्यकर्ताओं संबोधित करते हुए बसपा सुप्रीमो और उत्‍तरप्रदेश की मुख्‍यमंत्री मायावती ने साफ तौर पर एलान कर दिया है कि मध्‍प्रदेश में मिशन वर्ष 2013 में बसपा अकेली ही मैदान में आयेगी,किसी पार्टी से कोई गठबंधन नहीं करेगी, उन्‍होंने तो कार्यकर्ताओं को संकेतो ही संकेतों में कह दिया है कि मध्‍यप्रदेश में कांग्रेस कमजोर है और भाजपा सरकार में दलित और गरीब वर्ग उपेक्षित है। इसके चलते बसपा को ताकत के साथ मैदान में उतरना चाहिए। मायावती के संकेत से साफ है कि अ‍ब बसपा का हाथी मैदान में उतरकर कांग्रेस और भाजपा के लिए मुसीबत बनने वाला है। राज्‍य में जाति की राजनीति कुल हलको में ही होती है, जहां पर बसपा का जोर कभी कभी दिखता भी है। लेकिन उत्‍तरप्रदेश की सीमाओं से जुडे इलाको मे बसपा ने कई चुनावों में अपना खास असर दिखाया है। अब फिर से बसपा राज्‍य में सक्रिय हो रही है। बार बार बसपा को अपने कैडर होने का अभियान तो है, लेकिन उस कैडर का उपयोग ठीक से नहीं हो पा रहा है, न तो बसपा जमीनी संघर्ष करती नजर आती है और न ही उसका संगठन राज्‍य में ही दिखता है। कभी कभार बडे बडे सम्‍मेलन करके अपनी मौजूदगी दर्ज करती है। बसपा निश्चित रूप से दलित वर्ग में तो अपनी पैठ बनाये हुए, लेकिन अब सर्व समाज में भी प्रवेश करने की बसपा की तमन्‍ना है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी कहकर गई है कि दलित वर्ग के साथ साथ सर्व समाज की भी टिकट में भागीदारी रहेगी। बसपा का मिशन वर्ष 2013 का आगाज हो चुका है। अब तो जमीनी संघर्ष का इंतजार है।

शुक्रवार, 17 जून 2011

बच्‍चे बतायेंगे कैसे सुधरे परीक्षा परिणाम

       
           समझ में नहीं आ रहा है कि मध्‍यप्रदेश में सरकारी स्‍कूलों की व्‍यवस्‍था में सुधार क्‍यों नहीं हो पा रहा है। बार-बार योजनाएं बन रही है, उन पर खूब हल्‍ला मच रहा है, इसके बाद भी परिणाम ढाक के तीन पात हो रहे हैं। भाजपा सरकार ने सरकारी स्‍कूलों में आमूल-चूल बदलाव के लिए कई बार मंथन-चिंतन भी किया। अलग-अलग व्‍यवस्‍थाएं बदली।  शिक्षकों पर नकेल  कसी , स्‍कूलों में पढाई का वातावरण बनाया, तब भी परिणाम सार्थक नहीं मिल पा रहे हैं। अब शिक्षा विभाग ने एक नया प्रयोग करने का इरादा बनाया है, इसके तहत सरकारी स्‍कूलों में बच्‍चों से ही पूछा जायेगा कि स्‍कूल में क्‍या क्‍या खामिया हैं और उन्‍हें किस तरह दूर किया जाये। परीक्षा परिणाम में कैसे सुधार आये। विभाग के आला अधिकारियों ने तय किया है कि बच्‍चों से ही उनकी प‍ढाई के बारे में राय ली जाये। अब यह सवाल यहां उठता है कि अगर बच्‍चों को अपनी पढाई के बारे में अच्‍छे से मालूम हो तो फिर वे सरकारी स्‍कूलों में पढने ही क्‍यों जाये । विभाग के अधिकारी यह मान रहे हैं कि बच्‍चों से सीधे संवाद से निश्चित रूप से अच्‍छे परिणाम आयेंगे। अगर विभाग के अधिकारी प्राइवेट के स्‍कूलों के कार्यशैली का आंकलन करें तो पता चलेगा कि प्राइवेट स्‍कूल बच्‍चों की अपेक्षा अभिभावको से सीधा संवाद करते हैं और उन समस्‍याओं का निदान करने की  पहल करते हैं। अभिभावको से लगातार प्राइवेट स्‍कूलों का संवाद चलता रहता है और अभिभावक ही अपने बच्‍चे के बारे में बेहतर ढंग से जानता है, लेकिन सरकारी स्‍कूलों में तो उल्‍टा ही हो रहा है, वह पहले  बच्‍चो से बात कर रहे और अभिभावक को भूल गये हैं। धन्‍य हो मध्‍यप्रदेश का शिक्षा विभाग ।

गुरुवार, 16 जून 2011

फिर लौट रहे शरद यादव मध्‍यप्रदेश

         खाटी समाजवादी नेता शरद यादव को एक बार फिर मध्‍यप्रदेश की याद सताने लगी है। वे बार-बार राज्‍य की यात्रा कर अपने खत्‍म हो रहे संगठन को जिंदा करने की जुगत में लगे हैं। अब उन्‍होंने संगठन के हालात देखकर यह कहना भी शुरू कर दिया है कि जनता दल यू का गठन चुनाव लडने के लिए नहीं है, बल्कि जहां अन्‍याय, अत्‍याचार और शोषण होगा वहां पर जनता दल यू मौजूद रहेगा। अब शरद यादव जो भी कहे, उस पर विश्‍वास तो करना ही होगा, लेकिन मध्‍यप्रदेश की ओर से उन्‍होंने करीब दो दशक से मुंह मोड लिया था और इसकी वजह उनकी जबलपुर लोकसभा चुनाव में पराजय थी। चुनाव में पराजित होने के बाद यादव ने दिल्‍ली की ओर रूख किया और फिर पीछे पलट कर नहीं देखा।          
        मध्‍यप्रदेश की राजनीति में संभवत: शरद यादव इकलौते राजनेता है, जो कि मध्‍यप्रदेश के अलावा बिहार, उ0प्र0, हरियाणा जैसे राज्‍यों से चुनाव लडकर संसद में आक्रमक तेवर का प्रदर्शन करते हैं। इस राह पर कांग्रेस के दिग्‍गज नेता अर्जुन सिंह चले, लेकिन उन्‍होंने भी एक बार दिल्‍ली से लोकसभा चुनाव जीता है और किसी नेता का उदाहरण मध्‍यप्रदेश में तलाश करने पर भी नहीं मिल रहा है। निश्चित रूप से शरद यादव पर फ्रक किया जा सकता है, लेकिन म0प्र0 के प्रति उनकी अनदेखी नागवार गुजरती है। 15 जून, 2011 को भोपाल के रविंद्र भवन में शरद यादव ने पार्टी सम्‍मेलन के कार्यक्रम में न सिर्फ अपनी राजनीतिक यात्रा का बखान किया, बल्कि यह भी स्‍थापित करने का प्रयास किया कि उन्‍होंने म0प्र0 के विकास के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोडी, इसके लिए उन्‍होंने एक लंबी फेहरिस्‍त कामों की कार्यकर्ताओं को गिनाई। यह सच है कि यादव इन दिलों एनडीए के संयोजक भी है, तो उनके भाजपा से निकट के रिश्‍ते भी हैं और भाजपा मध्‍यप्रदेश में सत्‍तारूढ दल है। ऐसी स्थिति में भाजपा से दूरिया बनाने का जौखिम यादव क्‍यों लेंगे, लेकिन यादव के शिष्‍य गोविंद यादव की पहल पर मध्‍यप्रदेश में जनता दल यू अपने पैर जमा रहा है और शरद यादव उसके पीछे ताकत से खडे है, इससे साफ जाहिर है कि शरद यादव की मंशा एक बार फिर राज्‍य की राजनीति में जाग गई है। वैसे तो राज्‍य की राजनीति में भारी परिवर्तन आ गया है। भाजपा और कांग्रेस में नये चेहरो के हाथों मे नेत़त्‍व है, राज्‍य के मुददे बदल गये है, शांतिप्रिय राज्‍य में राजनीतिक हलचले तेज होने लगी है, विकास पर बहस होने लगी है, आम आदमी सवाल करने लगा है, मीडिया हल्‍ला मचा रहा है, यानि सब तरफ बदलाव की बयार बह रही है, अब शरद यादव को तय करना है कि वह इस राजनीति में कहा अपने आप को पाते है।

बुधवार, 15 जून 2011

मध्‍यप्रदेश में आंतक की दस्‍तक

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मंगलवार, 14 जून 2011

निराश किसानों की जिंदगी में खुशहाली आयेगी

             क़षि परआधारित मध्‍यप्रदेश अर्थव्‍यवस्‍था को ताकत देने के लिए बार-बार योजनाएं बनती है। फाईलो से बाहर निकलकर बैठको तक पहुंचती है। मंथन, चिंतन और योजनाएं आकार लेती है। फील्‍ड पर पहुंचते ही योजनाएं डग-मांगाने लगती है और फिर शुरू होती है, नौकरशाही और बाबूओ की कला बाजियां, जिसके चलते क़षि विकास के जो सपने देखे जाते है, वह ध्‍वस्‍त होने लगते है। मध्‍यप्रदेश में यह आलम अरसे से चला आ रहा है, यही वजह है कि क़षि क्षेत्र में आज भी किसान, परेशान और बेहाल है और आत्‍महत्‍या को विवश हो रहा है। मध्‍यप्रदेश में पहली बार निराश किसानों ने मौत को गले लगाया। इससे पहले कभी किसानों ने आत्‍महत्‍या नहीं की है। किसानों की आत्‍महत्‍या पर खूब राजनीति हुई और सत्‍ता और विपक्ष उन किसान परिवारों को भूल गये, जो कि अब फिर से अपनी परेशानियों से जूझ रहे है। निश्चित रूप से मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मंशा खेती को लाभ का धंधा बनाने की है। इस दिशा में उन्‍होंने कई फैसले लिये है, पर अभी भी किसान को उसकी लाभ मूल्‍य की कीमत बाजार में नहीं मिल रही है, वहीं बिजली का संकट रोजाना बना हुआ है, सिंचाई की सुविधाएं बेहतर नहीं है, खाद बीज नकली मिल रहा है। अब मुख्‍यमंत्री ने क़षि कैबिनेट बनाई है, जो बारह विभागों को लेकर एक समिति है, जिसमें किसानों की जिंदगी में खुशहाली लाने पर विचार विमर्श किया जायेगा। क़षि से जुडे 12 विभागों का बजट अभी भी 32 प्रतिशत क‍़षि पर खर्च हो रहा है। अगले वर्ष 2012 से क़षि का अलग से बजट बनाने का सरकार विचार कर रही है। प्रदेश का कुल बजट 65845.63 करोउ है, जबकि क़षि समूह में सम्मिलित बजट 21617.41 करोड है। इसी राशि में से क़षि क्षेत्र में कार्य होना है। क़षि के जानकार सोमपाल शास्‍त्री को आशंका है कि क़षि को लेकर जो कवायद की जा रही है, कहीं वे रस्‍म अदायगी बनकर न रह जाये। यह सच है कि मध्‍यप्रदेश में लुभावने सपने दिखाने की कला में राजनेता माहिर है, ऐसे नेताओं की बेहद कमी है, जो कि सपने तो सुंदर देखते है, पर उन्‍हें साकार करने में उनकी कोई दिलचस्‍पी नहीं होती है। इसी के चलते किसान दिन प्रतिदिन अपनी दशा पर आंसू बहाता रहता है और राजनेता वोट के हिसाब से किसानो का इस्‍तेमाल करता रहा है। पर अब स्थितियां बदल रही है, किसानों के बीच स्‍वयंसेवी संगठन पहुंच रहे है, जो कि लगातार सरकार और उनकी जिंदगी से जुडे पहलुओं को बता रहे है। यह अपने आप में एक शुभ संकेत है, इससे न सिर्फ खेती का भला होगा, बल्कि किसान भी जागरूक होगा और सरकार पर लगाम भी लग सकेगी। जय हो मध्‍यप्रदेश की । 

सोमवार, 13 जून 2011

पुराना मध्‍यप्रदेश 1956 से पहले और वर्तमान राज्‍य : एक नजर में

           वर्ष 1956 से पहले मध्‍यप्रदेश चार अलग-अलग हिस्‍सों और राज्‍या में विभाजित था। इन अलग-अलग राज्‍यों को मिलाकर मध्‍यप्रदेश की स्‍थापना 1 नवंबर, 1956 को की गई। यही वजह है कि मध्‍यप्रदेश्‍ा में अलग-अलग भाषा का आज भी वर्चस्‍व है, क्‍योंकि तब लोग अन्‍य प्रांतों से आकर यहां बस गये थे और फिर मध्‍यप्रदेश को अपना सरजमी मान लिया। यह प्रस्‍तुत है पुराने राज्‍य के इलाकों की एक झलक : 
  • महाकौशल -  बालाघाट, छिंदवाडा, सिवनी, मंडला, नरसिंहपुर, जबलपुर, सागर, दमोह, होशंगाबाद, बैतूल,    खण्‍डवा
  • पूर्व भोपाल राज्‍य - भोपाल, सीहोर, रायसेन 
  • विन्‍ध्‍यप्रदेश - रीवा, सतना, सीधी, शहडोल, टीकमगढ, छतरपुर, पन्‍ना, दतिया 
  • मध्‍य भारत - भिण्‍ड, मुरैना, ग्‍वालियर,गुना, शिवपुरी, राजगढ, विदिशा, शाजापुर, देवास, उज्‍जैन, इंदौर, रतलाम 
वर्तमान में मध्‍यप्रदेश : 1 नवम्‍बर, 1956 को नवगठित राज्‍य मध्‍यप्रदेश अब चार हिस्‍सों में अपनी पहचान को समेटे हुए है। अलग-अलग बोली, संस्‍क़ति, खान-पान, रहन-सहन और  पहनावा  होने के बाद भी मध्‍यप्रदेश अब एक बडे राज्‍य के रूप में पहचान बना रहा है। वैसे तो वर्ष 2000 मे राज्‍य का एक विभाजन हो चुका है और छत्‍तीसगढ राज्‍य प़थक बन चुका है। इसके बाद भी मध्‍यप्रदेश में प्राक़तिक संपदा, मानव संसाधन, उद्योग आदि का जाल फैला है। आज भी मध्‍यप्रदेश को बुंदेलखण्‍ड, विंध्‍य, महाकौशल और मध्‍यभारत से जाना जाता है। ये इलाके भले ही  अलग-अलग जिलों का प्रतिनिधित्‍व करते हो, पर सबका स्‍वर एक ही है। मध्‍यप्रदेश को तोडने की साजिश राजनेताओं ने एक बार फिर शुरू कर दी है और प़थक बुंदेलखण्‍ड बनाने की बात हो रही है, लेकिन उन राजनेताओं को छत्‍तीसगढ के राजनेताओं से जरूर विचार विमर्श करना चाहिए कि वह आज मध्‍यप्रदेश से विभाजित होने के बाद पश्‍चाताप कर रहे हैं। आज मध्‍यप्रदेश को विभाजित करने की वजह और ताकतवर बनाने की आवश्‍यकता है, ताकि राज्‍य अपनी एक अलग पहचान कायम कर सके। इसके लिए अभी और लंबी यात्रा तय करनी है, क्‍योंकि राज्‍य से गरीबी, पिछडापन, अशिक्षा, कुपोषण, पक्षपात, धर्मान्‍धता,कटटरता, बेरोजगारी और पांव पसरते अपराध जैसी समस्‍याएं यथावत हैं। इनसे लडने के लिए राजनेताओं को ही आगे आना होगा तभी राज्‍य सम़द्व होगा। 

फिर दिग्विजय और उमा आमने-सामने



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